‘अहीर रेजिमेंट’ के लिए लोकसभा में उठी आवाज़

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Ahir Regiment: अहीर रेजिमेंट के लिए देश भर में वर्षों से उठ रही आवाज अब भारत की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा तक पहुंच गई है। यादवों की मांग है कि, भारतीय सेना में अहीर रेजिमेंट का गठन किया जाय। यादव समाज आदिकाल से अपने साहस और पराक्रम के लिए पहचाना जाता है। अब इस आवाज को संसद तक पहुंचाया है आजमगढ़ के भाजपा सांसद दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने।
दिनेशलाल यादव 15 दिसंबर 2022 यानी गुरुवार को लोकसभा में शून्यकाल के दौरान कहा कि, सेना में जल्द से जल्द अहीर रेजिमेंट का गठन किया जाए। जिस दिन इस रेजिमेंट का गठन होगा, उस दिन चीन की रूह कांप जाएगी। इसकी वजह ये है कि 1962 में रिझांग ला चौकी पर 123 अहीर जवानों ने 3,000 चीनी सैनिकों को मार भगाया था।
दरअसल दिनेश लाल यादव ने चुनाव के दौरान अपने चुनावी घोषणा पत्र में अहीर रेजिमेंट का वादा किया था। उस वादे को याद दिलाने के लिए शाहजहांपुर निवासी अभिषेक ने अपने खून से सांसद को पत्र लिखा था। इसी के बाद संसद में निरहुआ ने ये मुद्दा उठाया है।
इस मुद्दे को अखिल भारत वर्षीय यादव महासभा समेत देश के तमाम यादव संगठन आवाज उठाते रहे हैं। देश की सेना के प्रति यादव समाज लगाव और प्रेम का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि, सेना में भर्ती के लिए यादवों का निवेदन लाखों की संख्या में होती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, पंजाब जैसे राज्यों में आज भी यादव बस्तियों में सुबह सुबह युवकों को दौड़ते और व्यायाम करते देखा जा सकता है। इन्हे प्राथमिक प्रशिक्षण देने के लिए कई इलाकों में सेना के रिटायर्ड जवान संस्थाएं भी खोल रखें हैं, जो इन्हे सेना के नियम कानून और शिष्टाचार से अवगत कराते हैं।
निरहुआ ने पहली बार अहीर रेजिमेंट की मांग नहीं की है, बल्कि इससे पहले भी रोहतक से कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने संसद में ये मांग उठा चुके हैं।
हुड्डा ने कहा था, ‘जब-जब देश पर आक्रमण हुआ, तब-तब जय यादव-जय माधव के नारे की गूंज के साथ अहीर भाइयों ने अपना बलिदान दिया। अब समय आ गया है कि भारतीय फौज में अहीर रेजिमेंट की स्थापना की जाए।’
2018 में इसी मांग को लेकर संयुक्त अहीर रेजिमेंट मोर्चा ने 9 दिनों तक भूख हड़ताल की थी।

रेजांगला में यादवों का क्या था पराक्रम?

बात नवंबर 1962 की बात है। जब 3 हजार चीनी सेना को करीब 123 अहीरों के एक रेजीमेंट ने मार भगाया था। हालांकि इसमें कुमाऊं रेजिमेंट के 123 जवान शहीद हो गए थे। चीन से जंग खत्म होने के कुछ दिनों बाद एक गड़रिया भटकता हुआ चुशूल से रिझांग ला पहुंच गया। उसने देखा कि वहां बर्फ के बीच सैकड़ों लाशें पड़ी थीं। इसके बाद वह भागते हुए नीचे गया और उसने सेना की एक दूसरी चौकी पर इसकी जानकारी दी। जब उस चौकी से जवान रिझांग ला चौकी के पास पहुंचे तो उन्होंने वहां 13 कुमाऊं रेजिमेंट के 123 जवानों की लाशें देखीं। ये सभी जवान नवंबर 1962 में मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में ‘रिझांग ला’ चौकी पर तैनात थे।
इनमें ज्यादातर जवान अहीर थे। 18 नवंबर को चीनी सेना के 3,000 से ज्यादा जवानों ने अचानक से इस चौकी पर हमला कर दिया। इसके बाद दोनों ओर से भयानक गोलीबारी हुई। चौकी पर तैनात सभी जवानों ने आखिरी गोली तक चीनी सैनिकों का सामना किया।
इस जंग में 123 भारतीय जवान शहीद हुए, जबकि 1200 चीनी सैनिक मारे गए।

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