आगामी मनपा चुनाव मे क्या कांग्रेस की रणनीति भाजपा का द्वार वेध बनेगी ?

राजनीति

विजय यादव/न्यूज़ स्टैंड18


मुंबई। आगामी मुंबई महानगर पालिका चुनाव को लेकर कांग्रेस अभी से रणनीति बनानी शुरू कर दी है। पार्टी ने निर्णय लिया है कि वह सभी 227 सीटों पर अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। मंगलवार को कांग्रेस कार्यालय में महाराष्ट्र अध्यक्ष नाना पटोले की उपस्थिति में यह निश्चय किया गया कि कांग्रेस सभी सीटों पर लड़ने के लिए सक्षम है। नाना पटोले ने कहा कि कांग्रेस 227 सीटों पर खुद की ताकत पर लड़ने के लिए तैयार है।


लंबे समय बाद यह पहला अवसर है जब कांग्रेस किसी चुनाव को लेकर एक साल पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी है। इसे प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले व मुंबई अध्यक्ष भाई जगताप के बीच एक अच्छे सामंजस्य के रूप में देखा जा सकता है। कुछ दिनों पहले यह अटकलें लगाई जा रही थी कि कांग्रेस शिवसेना के साथ मिलकर मनपा चुनाव लड़ेगी। लेकिन कांग्रेस नेताओं के इस नए बयान से यह साफ हो गया है कि कांग्रेस अकेले ही मैदान में उतरेगी।
मुंबई में कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक हिंदी भाषी समाज है। यह वर्ग पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के साथ विभाजित हो गया है। यही वजह है कि मुंबई में कांग्रेस कमजोर हुई है। इसके साथ ही कांग्रेस का अंतर्कलह भी एक कारण रहा। भाई जगताप के अध्यक्ष बनने के बाद कुछ हद तक गुटबाजी ने कमी आई है।
अब बात करते हैं कांग्रेस के अकेले लड़ने से उसे होने वाले फायदे और नुकसान के बारे में। अगर कांग्रेस शिवसेना या राकांपा के साथ मिलकर मनपा चुनाव लड़ती है तो उसका बचाखुचा वोट बैंक भी भाजपा की ओर खिसक जाएगा। अकेले लड़ने पर उत्तर भारतीयों का साथ मिलने के साथ – साथ वार्ड स्तर पर संगठन भी मजबूत होगा।

एक कहावत तो आपने सुनी होगी चित भी अपना पट भी अपना। अगर इस चुनाव में कांग्रेस मनपा में बहुमत नहीं भी हासिल करती है तब भी वह विपक्ष में बैठने की स्थिति में जरूर रहेगी। इस तरह मुंबई मनपा में दोनों मित्र पक्ष का वर्चस्व बना रहेगा। एक पक्ष में तो दूसरा विपक्ष में। इस नीति से शिवसेना कांग्रेस मिलकर भाजपा को विपक्ष की कुर्सी से भी बाहर रखने में सफल रहेंगे।


इन तीन दलों के आलावा शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना भी अपना अहम रोल निभाएंगे। यह भी कवायद चल रही है कि भाजपा संभवतः मनसे के साथ गठबंधन कर सकती है। अगर ऐसा हुआ तो 2014 से भाजपा के जिस उत्तर भारतीय वोट में इजाफा हुआ है वह खिसक कर शून्य पर भी आ सकता है। इसका सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस को होगा। हालांकि भाजपा पिछले कुछ वर्षों में राजनीति के खेल में एक अच्छे और सधे हुए खिलाड़ी की भूमिका निभा रही है। हो सकता है ऐसी गलती भाजपा नहीं भी करे।
बात करते हैं मनसे की। क्या मनसे मुंबई में मराठी मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में सफल होगी? अगर ऐसा हुआ तो शिवसेना का नुकसान होगा और इसका सीधा लाभ अलग – अलग सीटों पर भाजपा – कांग्रेस को हो सकता है। मराठी वोट बंटने से इन पार्टियों को मुंबई की कुछ सीटों पर लाभ होगा। हालांकि मराठी मतदाता को सबसे समझदार माना जाता है। वह भाजपा को रोकने के लिए शिवसेना को अपना भरपूर समर्थन दे सकता है।

भाजपा मराठी मतों को अपनी तरफ खींचने के लिए नारायण राणे का भरपूर उपयोग कर सकती है। मुंबई में कोकण, सिंधुदुर्ग, रत्नागिरी का अच्छा वर्चस्व है। अगर यह वोट राणे के साथ भाजपा की ओर डायवर्ट हुआ तब भी शिवसेना के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है। हालांकि शिवसेना मराठी वोटों की भरपाई के लिए गुजराती समाज को जोड़ने का अभियान अभी से चला रही है।

माना जाता है कि गुजराती वोट नरेंद्र मोदी का साथ नहीं छोड़ सकता। लेकिन इधर कुछ समय से लगातार बढ़ती मंहगाई ने उन्हें भी आहत किया है। पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों से गुजराती वर्ग भी भाजपा से नाराज़ चल रहा है। यही वजह है कि गुजराती धीरे-धीरे भाजपा से खिसक रहा है। इसका असर भाजपा के मराठी मतदाताओं पर भी देखा जा सकता है। कुछ साल पहले भाजपा की बैठकों और सभाओं मे मराठी मतदाताओं की जो भीड़ देखी जाती थी अब नदारत है। आने वाला समय बताएगा कि कांग्रेस अपनी रणनीति में कितना सफल होती है।

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