उत्तर प्रदेश चुनाव में बड़े दलों पर भारी पड़ेंगे छोटे दल

उत्तर प्रदेश राजनीति

न्यूज़ स्टैंड18 डेस्क
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा छोटे दलों का बड़ी पार्टियों पर दबाव अभी से देखा जा रहा है। इन दलों से जुड़ी विभिन्न जातियों का काफी दबदबा होने के कारण बड़े दलों को इनके सामने बड़े दलों का झुकना स्वाभाविक है। यह छोटे दल आगामी चुनाव में बड़ा रोल निभा सकते हैं। चुनाव से पहले ही भाजपा और समाजवादी पार्टी जैसी मुख्य पार्टियों के साथ इनकी सौदेबाजी हो सकती है।
जाति-केंद्रित दल चुनाव में भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों को काफी बल देते हैं, क्योंकि कुछ हज़ार वोट भी उम्मीदवारों की जीत की संभावना बना सकते हैं।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2017 के राज्य चुनावों में विभिन्न दलों के आठ उम्मीदवारों ने 1000 से कम मतों के अंतर से जीत हासिल की थी। डूमरियागंज में सबसे कम जीत का अंतर 171 वोटों का था, जहां भाजपा के राघवेंद्र सिंह ने बसपा उम्मीदवार सैयदा खुटन को हराया था।
समाजवादी पार्टी ने जहां कहा है कि छोटे दलों के लिए उसके दरवाजे खुले हैं, वहीं बीजेपी भी उनके साथ अपना गठबंधन बरकरार रखने की कोशिश कर रही है। वहीं कांग्रेस नेताओं को लगता है कि अकेले मैदान ने उतरने से पार्टी संगठन को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
अपना दल (सोनेलाल) के अलावा भाजपा की निषाद पार्टी, जद (यू), आरपीआई और बिहार की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) सहित अन्य पर गठबंधन के लिए नजर है। हालांकि अभी किसी दल ने सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप नहीं दिया है।
जबकि निषाद पार्टी के ‘निषाद’ (मछुआरे) समुदाय के सदस्यों में काफी संख्या है। जो राज्य के लगभग छह लोकसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में हैं। अनुप्रिया पटेल के अपना दल (एस) का ओबीसी कुर्मी समुदाय के बीच प्रभाव है।
2018 में सपा ने गोरखपुर लोकसभा सीट से संजय निषाद के बेटे प्रवीण को अपना उम्मीदवार बनाया था और उपचुनावों में भाजपा को चौंका दिया था। इसी सीट से पांच बार के सांसद योगी आदित्यनाथ ने संवैधानिक नियमों को ध्यान में रखते हुए एमएलसी बनने पर इसे खाली कर दिया था।
भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों में निषाद पार्टी को अपने पक्ष में कर लिया, संत कबीर नगर से अपने चिन्ह पर प्रवीण निषाद को मैदान में उतारा। वह जीते और वर्तमान में भाजपा के सांसद हैं।
2017 में भाजपा ने अपना दल (एस) और शुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के साथ ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व में क्रमशः कुर्मियों और अत्यंत पिछड़े वर्गों के बीच उनके दबदबे को ध्यान में रखते हुए गठबंधन किया था।
एसबीएसपी ने 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में चार सीटें जीती थीं। तब उसने बीजेपी के सहयोगी के रूप में चुनाव लड़ा था।
इसी तरह राजभर समाज पूर्वांचल की आबादी का 20 प्रतिशत है और पूर्वी यूपी में यादवों के बाद दूसरा सबसे प्रभावशाली समुदाय माना जाता है। राजभर ने हाल ही में संकल्प मोर्चा का गठन किया है, जिसमें असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी एक हिस्सा है और 2022 के विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा करते हुए कहा कि मोर्चा के दरवाजे सपा, बसपा और कांग्रेस के लिए खुले हैं।
एआईएमआईएम ने हाल ही में घोषणा की थी कि वह राजभर के नेतृत्व वाले एसबीएसपी और 10 छोटे दलों के मोर्चे के साथ गठबंधन में राज्य की 100 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा को क्रमश: 21.82 फीसदी और 22.23 फीसदी वोट मिले थे।
दोनों पार्टियों को मिलाकर 44.05 फीसदी वोट मिले थे, जो बीजेपी के 39.67 फीसदी से ज्यादा है। हालांकि बीजेपी ने राज्य विधानसभा की कुल 403 सीटों में से 312 सीटों पर जीत हासिल की।
सपा, कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी थी और 47 सीटें ही जीत सकी, जबकि बसपा 19 सीटों पर कब्जा करने में सफल रही थी।
कांग्रेस ने जिन 105 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से सिर्फ सात सीटों पर ही सफलता मिली।
2012 के विधानसभा चुनावों में 200 से अधिक पंजीकृत दलों ने अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, जबकि 2017 में देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में 290 दलों ने चुनावी लड़ाई में छलांग लगाई थी। 2017 के आंकड़ों के अनुसार, एसबीएसपी ने आठ सीटों पर चुनाव लड़ा था और चार सीटों पर जीत हासिल की थी। उसे लड़ी गई कुल सीटों पर 34.14 फीसदी और कुल सीटों पर 0.70 फीसदी वोट मिले। इसी तरह अपना दल (एस) ने 11 सीटों पर चुनाव लड़ा और लड़ी गई सीटों पर 39.21 फीसदी और कुल मिलाकर 0.98 फीसदी हासिल किया। पीस पार्टी ने 68 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन जीत दर्ज नहीं की। उसे चुनाव लड़ी गई सीटों पर 1.56 फीसदी और कुल सीटों पर 0.26 फीसदी वोट मिले।
समाजवादी पार्टी के पास पहले से ही राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), महान दल और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी और कुछ अन्य छोटे दल हैं।
महान दल जिसका शाक्य, सैनी, मौर्य और कुशवाहा समुदायों के बीच एक मजबूत आधार है।
संजय सिंह चौहान की जनवादी सोशलिस्ट पार्टी को बिंद और कश्यप समुदायों के सदस्यों से भी ताकत मिलती है, जो एक दर्जन से अधिक जिलों में बड़ी संख्या में हैं।
महान दल और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी दोनों ने अखिलेश यादव को अगला मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प लेकर राज्य में क्रमश: बलिया और पीलीभीत से अलग-अलग यात्राएं निकाली हैं।
शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) भी राज्य में गैर-भाजपा गठबंधन बनाने की कोशिश में है। पार्टी प्रवक्ता दीपक मिश्रा ने कहा, ‘हम विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं।’ “हम अभी इसका खुलासा नहीं कर सकते क्योंकि चीजें पाइपलाइन में हैं। गठबंधन के लिए सीटों के बंटवारे सहित बहुत कुछ तय करना होगा। आप जल्द ही हमारी तरफ से कुछ सुन सकते हैं, ”उन्होंने कहा, कई पार्टियों के साथ बातचीत चल रही है। सपा के साथ गठबंधन की संभावना के बारे में पूछे जाने पर मिश्रा ने कहा कि उसने (सपा) हमें ना नहीं कहा है। उन्होंने कहा, “हम ‘गैर-भजपावाद’ (गैर-भाजपा) स्टैंड पर भरोसा करेंगे।”
उनके अलावा, चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) भी चुनावी मैदान में उतर रही है और कई छोटे दलों के साथ बातचीत कर रही है। 2017 में 32 छोटे दलों ने 5,000 और 50,000 के बीच वोट हासिल किया था। छह छोटी पार्टियों को 50,000 से अधिक वोट मिले और छह अन्य को 1,00,000 से अधिक वोट मिले।
इन दलों के प्रभाव ने 2017 के विधानसभा चुनाव, 2014 के लोकसभा चुनाव और 2012 के विधानसभा चुनावों में क्रमश: 56, सात और 231 निर्वाचन क्षेत्रों में मुख्यधारा की पार्टियों की जीत की संभावना को खराब कर दिया था।

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