क्या अब तिरंगे का अपमान नहीं हुआ ?

फीचर

अजय भट्टाचार्य/ वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

इस साल का गणतंत्र दिवस याद कीजिये और लाल किले पर हुए तमाशे को भी। किसान आन्दोलन को बदनाम करने के लिए रचे गये प्रहसन में राष्ट्रध्वज के अपमान की बात उछालकर केंद्र में सत्तारूढ़ दल और गोदी मीडिया किसानों को देशद्रोही साबित करने में लग गया था। लालकिले में तिरंगे के बगल में एक अन्य झंडा फहरा दिया गया था और फिर इसे तिरंगे का अपमान कहकर चैनलिया चतुर हाहाकार कर उठे थे।

अब यह चित्र देखिये। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यपाल कल्याण सिंह की पार्थिव देह पर तिरंगे ध्वज के ऊपर भाजपा का झंडा रखा गया है मगर किसी को भी तिरंगे के अपमान की बात नजर नहीं आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में राष्ट्रीय ध्वज के साथ यह व्यवहार हुआ है जो कि स्पष्ट तौर पर ध्वज संहिता का उल्लंघन है। वहां पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौज़ूद थे। ध्वज संहिता की धारा 4 के अनुसार राष्ट्रीय ध्वज के ऊपर या समानांतर ऊंचाई पर कोई भी ध्वज नहीं फहराया जा सकता। कल्याण सिंह के शव पर तो राष्ट्रीय ध्वज के ऊपर पार्टी का झंडा रखवा दिया गया जिससे अशोक चक्र तक ढंक गया। वहां मौज़ूद किसी अधिकारी तक ने इस पर आपत्ति नहीं की जबकि राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि के लिये हर तरह के प्रोटोकॉल का ध्यान रखा जाता है। डॉ. प्रकाश पाठक ने एक फेसबुक पोस्ट में यह मुद्दा उठाते हुए कहा है कि वास्तविकता यह है कि भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तिरंगे को शुरू से ही स्वीकार नहीं करता। उसका आदर्श तो भगवा ध्वज है।

संघ के दूसरे सर संघ चालक माधवराव सदाशिवराव गोलवरकर ‘गुरुजी’ ने ‘आर्गनाइज़र’ में 14 अगस्त, 1947 को लिखा था कि “यह तिरंगा कभी भी हिंदुओं के द्वारा न अपनाया जायेगा और न ही सम्मानित होगा।” तीन’ का शब्द तो अपने आप में ही अशुभ है और तीन रंगों का ध्वज निश्चय ही बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा और देश के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा।” हिन्दू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर ने कहा था कि “हिंदू किसी भी कीमत पर वफादारी के साथ अखिल हिंदू ध्वज के सिवा किसी और ध्वज को सलाम नहीं कर सकते।” ऐतिहासिक तथ्य है भी है कि गांधी जी की हत्या के बाद संघ कार्यकर्ताओं ने देश भर में तिरंगे को पैरों तले कुचला और आग लगाई थी। इस बारे में तब अख़बारों में ख़बरें भी छपी थीं। यह भी याद रखिये कि संघ मुख्यालय में 2002 तक कभी तिरंगा नहीं फहराया गया। विडंबना यह है कि कठुआ में गैंगरेप के आरोपियों के पक्ष में तिरंगा यात्रा निकाली गई थी। इस यात्रा में हिन्दू संगठनों ने खुल कर बलात्कार के आरोपियों के हक़ में आवाज़ उठाई थी। इस तिरंगा यात्रा में तत्कालीन जम्मू कश्मीर सरकार के दो भाजपाई मंत्री भी शामिल हुए थे। बाद में इन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था। उत्तर प्रदेश में मॉब लिंचिंग के आरोपी के शव पर तिरंगा ध्वज लपेट कर अंतिम संस्कार के लिये ले जाया गया था। इसमें भी इसी कुनबे के लोग शामिल थे। पूर्व आईपीएस अधिकारी विजय शंकर सिंह ने भी इस मुद्दे लिखा है कि भारतीय ध्वज संहिता 2002 में राष्ट्रीय ध्वज को फहराने व प्रयोग करने के बारे में तरह तरह के निर्देश दिए गए हैं। इस ध्वज संहिता में सभी नियमों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक संहिताबद्ध किया गया है और इस ध्वज को 26 जनवरी 2002 से लागू किया गया है। संहिता के अनुसार, “किसी दूसरे ध्वज या पताका को राष्ट्रीय ध्वज से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा। ध्वज पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।”

धवज संहिता के खंड चार (3.16) में कहा गया है कि कोई भी अन्य ध्वज या ध्वज पट्ट राष्ट्रध्वज से ऊँचा या उससे ऊपर या इसके बाद राष्ट्र ध्वज के साथ प्रदान किए गए स्थान के अलावा, ऊपर या ऊपर नहीं रखा जाएगा; न ही फूल या माला या प्रतीक सहित कोई वस्तु ध्वज मस्तूल पर या उसके ऊपर रखी जाएगी जिससे झंडा फहराया जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.