क्यों बदले ममता के सुर

राजनीति लेख

अजय भट्टाचार्य
तृणमूल
कांग्रेस कि मुखिया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री वर्तमान केंद्रीय सत्ता प्रतिष्ठान के बरक्स विकल्प का चेहरा बनने की दौड़ में कुलाचें भर्ती दीख रही हैं। इसी सिलसिले में उनकी मुंबई यात्रा और शरद पवार आदि से मिलने की श्रंखला जारी रही। इस दरम्यान जिस ढंग से ममता ने यूपीए के अस्तित्व पर सवाल उठाये हैं उससे सबको यह लगता है कि ममता कांग्रेस की जगह लेना चाहती हैं। उनकी पार्टी के मुखपत्र जागो बांग्ला में तो इस विषय पर एक लंबा लेख भी छप चुका है जिसमें तृणमूल को ही ‘असोल (असली) कांग्रेस’ साबित करने की कोशिश की गई है।

मगर बंगाल विधान सभा जीतने के बाद पहली दिल्ली यात्रा में सोनिया से मिलने वाली ममता के तेवर अगर बदले हैं तो क्यों? ममता ने अपने भवानीपुर उपचुनाव अभियान के लिए अपने सार्वजनिक संबोधन में कांग्रेस पर दो बार हमला किया। कोलिन स्ट्रीट और शेक्सपियर सरानी में अपने भाषणों में ममता ने कांग्रेस पर भाजपा द्वारा उत्पीड़न के डर के आगे घुटने टेकने और समय-समय पर गुप्त सौदे करने का आरोप लगाया। जागो बांग्ला के संपादकीय में लिखा गया: “कांग्रेस विरासत का झंडा आज तृणमूल के हाथ में है। यह शोमुद्रो (समुद्र) है। पावचाडोबा (सड़ा हुआ छोटा तालाब) आज अप्रासंगिक है। अधिकांश कांग्रेस समर्थकों ने महसूस किया है कि तृणमूल बंगाल में असली कांग्रेस है। राजीव गांधी को इसी ममता बनर्जी से लगाव था, आज की कांग्रेस असफल, भटकी हुई है। इतिहास की शान पर टिके रहने के दिन खत्म हो गए हैं। पवित्र युद्ध अब जमीन पर प्रदर्शन के आधार पर है। जो अभी भी कांग्रेस में है, उसका तृणमूल में स्वागत है।

यहां तक कि दिल्ली के मामले में भी यही प्रवृत्ति है।” अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि तीन महीने में ऐसा क्या हो गया जो अब ममता को कांग्रेस अच्छी नहीं लग रही है। सोशल मीडिया पर एक तस्वीर साझा हुई है गौतम अडानी और ममता बनर्जी की भेंट की। यह फोटो ही ममता बनर्जी के ‘असोल कांग्रेस’ की महत्वाकांक्षा का दिखावटी दस्तावेज है। यह फोटो 2 दिसंबर को शाम 7:38 बजे अडानी ने खुद ट्वीटर पर साझा की है। दरअसल एक लाख करोड़ के शारदा चिटफंड, नारदा स्टिंग, 500 करोड़ के बंगाल मेट्रो डेयरी और ग्रुप सी व डी बंगाल सरकारी भर्ती घोटालों की फाइलें अभी बंद नहीं हुई हैं। इसमें भी महत्वपूर्ण यह है कि इन सभी मामलों को कांग्रेस ने ही उठाया है।

बंगाल कांग्रेस के नेता अब्दुल मन्नान साहब द्वारा 2016 में शारदा चिटफंड मामला उठाया गया जिसकी जाँच सीबीआई कर रही है। अदालत में यह मामला एक मुकाम तक पहुंच चुका है और उम्मीद है कि 2024 तक निचली अदालत का फैसला 4-6 मंत्रियों के खिलाफ आ जाएगा। अगर ऐसा होता है तो तृणमूल की नींव हिल जाएगी। कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने मेट्रो डेयरी के 500 करोड़ रुपयों से ज्यादा के शेयर मार्केट रेट से कम दाम पर एक व्यावसायिक संस्थान को बेचे जाने की शिकायत की थी जिसकी जाँच सीबीआई और ईडी कर रही है जिसके तार सीधे सीधा ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी तक जुड़े हैं। सरकारी भर्ती में धांधली का मामला भी कांग्रेस के एक वकील का किया हुआ है। अदालत ने सैंकड़ो फर्जी भर्ती पकड़ कर उनकी तनख्वाह बन्द कर दी है। इसकी भी सीबीआई जांच के आदेश दिए जा सकते हैं। ममता बनर्जी अच्छी तरह जानती हैं कि इन मामलों के चलते उनका राजनीतिक साम्राज्य खत्म हो सकता है इसलिये खुद के बचाव की तकनीक पर बहुत चतुराई से काम कर रही है। ममता भली भांति जानती है कि अडानी से विकास का कोई रिश्ता नही है।

भारत मे बहुत लोग ये मानते है कि अडानी मोदी की सोच है। तो जब अडानी दीदी की मीटिंग हुई है तो “सोच में समझौता” होना लाजिमी है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यह मीटिंग दिल्ली में ममता की प्रधानसेवक से हुई मुलाकात के बाद हुई है। तो क्या यह समझा जाये कि बंगाल हमारा, देश तुम्हारा ! और इसमें जो सबसे बड़ा रोड़ा है उसका नाम कांग्रेस है, मोदी से युद्धविराम और निशाने पर कांग्रेस।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published.