गवर्नर आये कर्जा करवाये

राजनीति लेख

अजय भट्टाचार्य
चार
महीने पहले यह तस्वीर उस समय की है जब मध्यप्रदेश में विदिशा ज़िले के घाटखेड़ी गांव में रहने वाले बुद्धराम आदिवासी को प्रधानमंत्री आवास के तहत मकान मिला और 24 अगस्त के दिन सूबे के राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने उसके घर की चाबी सौंपी थी। गरीब नवाज दिखने/दिखाने के लिए उसके यहाँ खाना भी खाया। बुद्धराम सहित पूरा गाँव गद्गद था कि सरकार बहादुर के चरण कुटिया में पड़े। लेकिनअब ये वीआईपी दौरा गरीब बुद्धराम आदिवासी को बहुत महंगा पड़ रहा है। एक निजी खबरिया चैनल की खबर के अनुसार महामहिम आए थे इसलिये दिखावे का दस्तूर निभाया गया। पंखा, भारी-भरकम गेट लगवाया गया। राज्यपाल के विदा होने के अगले ही दिन पंखा निकाल लिया गया और गेट के प्लाइबोर्ड के दरवाजे के लिये बुद्धराम से 14 हजार रूपये मांगे जा रहे हैं। बुद्धि राम बताता है कि यहाँ आये अफसरों ने कहा था कुटी में खाना खाएंगे, मजदूर भी लगाए जो आए थे। श्रीमान राज्यपाल जी ने खाना खाया, पंखा लगा दिया। बाद में सरपंच साहब बोले पंखा हमारा है। दरवाजा लगवा दिया। सरपंच साहब बोले सेठ के पास चलो जाओ दरवाजा लगवा लो। सेठजी ने सरपंच से कहा पैसे नहीं आए। मेरे पास पैसा नहीं है। मुझे पता रहता इतने का दरवाजा है तो मैं नहीं लगवाता। उनकी रिश्तेदार गोपीबाई ने कहा राज्यपाल साहब आए, कर्जा में करवा गये। दरवाजा लगवाये तो मेहनत करके पूर्ति करेंगे, पंखा भी निकाल ले गये! क्या सुविधा मिली? कुछ नहीं!


इस एक घर में दो योजनाओं का हाल भी दिख गया। उज्जवला का गैस सिलेंडर और चूल्हा भी उसी दिन मिला था, जिस दिन राज्यपाल आए थे। लेकिन उसका उपयोग भी नहीं हो रहा है। छह सदस्यीय परिवार को पलने के लिए बुद्धराम दिहाड़ी पर काम कर रहे हैं। अब भी अपने पुराने झोपड़े में ही रहते हैं। क्योंकि घर बाहर से तो पूरा बना नजर आता है मगर, अंदर से अधूरा है। जब सरकार तक बुद्धराम की कहानी पहुंचाई गई तो मंत्रीजी ने इसे गलत बताया और कहा कार्रवाई होगी। कांग्रेस का आरोप है कि दिखावे के लिये सरकार ऐसे काम करती है, जिसका खामियाजा गरीबों को भुगतना पड़ता है। नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेन्द्र सिंह कहते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिये। ऐसा कोई घटनाक्रम हुआ है तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। क्या सिर्फ प्रतीक था कि घर पहला सजा दिया गया बाद में सब निकाल लिया के सवाल पर उन्होंने कहा कि स्वाभाविक रूप से हमारे यहां परंपरा है कि जब कोई अतिथि आता है तो सफाई पुताई होती है।

कुछ दिनों पहले डिंडौरी जिले में भी प्रधानमंत्री आवास योजना में दर्जनों कच्चे और झोपड़ीनुमा मकान बना दिए गए हैं, इसके लिये भी रिश्वत में रूपये और मुर्गे की मांग की गई। फ़िलहाल दो छोटे अधिकारियों पर कार्रवाई की रस्म अदा हो गई। 4 लाख मकानों के लिये राज्य सरकार ने अपना अंशदान नहीं दिया जिसकी वजह से केन्द्र ने 640 करोड़ की राशि रोक ली है, लिहाजा विधानसभा के शीतकालीन सत्र में अनुपूरक बजट में सरकार ने प्रधानमंत्री आवास के लिए दो हजार करोड़ रुपये का प्रावधान कर दिया है।

विकास की इस वास्तविक तस्वीर का सबसे बड़ा मजाक यह है कि लगभग सवा लाख रुपयों के घर में ब्रांडिंग के लिये नेताजी घर में खाना खा आते हैं। अखबार में सुर्खियां बन जाती हैं फिर कहानी बुद्धराम जैसी होती है एक नहीं कई हितग्राहियों के साथ कि चमकधमक में सिर्फ दरवाजों के 14 हजार उसे चुकाना होता है। मप्र में प्रधानमंत्री आवास ग्रामीण में 40 प्रतिशत तो शहरी में करीब 50 फीसदी घर बनने हैं, ऐसे में 2022 तक सबको आवास का सपना कैसे पूरा होगा यह समझना मुश्किल है।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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