घाटी में कांग्रेस का ‘आजाद’ चेहरा

राजनीति लेख

अजय भट्टाचार्य
जम्मू-कश्मीर
में कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद की सक्रियता के राजनीतिक गुणा-भाग के बीच आजाद का यह बयान महत्वपूर्ण है कि वे कांग्रेस नहीं छोड़ रहे हैं। अलबत्ता वे ऐसा कोई मौका भी नहीं चूकते जिसमें कांग्रेस नेतृत्व की आलोचना न हो। मतलब असंतुष्ट हैं और नहीं भी। जी-23 गुट के खास चेहरों में एक गुलाम नबी आजाद जब राज्य सभा से विदा हुए थे तब उनकी शान में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कशीदे पढ़े थे। तभी यह अनुमान लगाया जाने लगा था कि देर-सबेर आजाद भी भाजपा की गोदी में बैठे नजर आएंगे।

फ़िलहाल उनके अनुसार वे नई पार्टी नहीं बना रहे हैं लेकिन साथ ही यह भी जोड़ना कि कौन जानता है कि भविष्य में क्या हो? साफ इशारा करता है कि घाटी की राजनीति में कोई नई खिचड़ी जरूर पक रहीहै जिसमें आजाद कश्मीरी मिर्च के तड़के जैसा काम करेंगे। ठीक वैसा ही जैसा इस समय पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह कर रहे है। खुद को कांग्रेसी दिखाते हुए वे भी गठबंधन की गली पकडकर भाजपा के दफ्तर तक पहुँच चुके हैं और पंजाब में नये मोर्चे की तरह उभर रहे हैं। इसलिये आजाद कांग्रेस को घेरते कहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व आलोचना सुनने के लिए तैयार नहीं है।

इंदिरा और राजीव गांधी तो आलोचना करने के लिए प्रोत्साहित भी करते थे। आजाद ने याद दिलाया कि जब उन्होंने दो महासचिवों को युवा कांग्रेस में नियुक्त करने से इनकार किया था तो इंदिरा गांधी ने कहा था, कीप इट अप। लेकिन आज कोई ना नहीं सुनना चाहता। खुद को जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस प्रमुख को हटाने की मांग मुहिम का हिस्सा नहीं बताते हैं यह अलग बात है कि जिन 20 लोगों ने इस मुद्दे पर इस्तीफे उछाले हैं वे सभी आजाद के ही समर्थक हैं। ऐसे प्रयोग संयोग से कांग्रेस में भी हो रहे हैं जसका श्रेय आजाद को ही देना चाहिये जिसे लेने से वे लगातार इंकार कर रहे हैं। वे कहते है कि ये रैलियां जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियों को दोबारा शुरू करने के लिए की जा रही हैं।

अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य का दर्जा खत्म करने के बाद जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियां ठंडे बस्ते में चली गई हैं। पिछले दो सालों में नेतृत्व और लोगों के बीच संपर्क टूट सा गया था, जब 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाने के साथ राज्य का दर्जा खत्म कर दिया गया था। मुझे एक राजनीतिक रास्ता दिखा और गतिविधियां शुरू की हैं। अन्य पार्टियां भी यही कर रही हैं। बहरहाल अपनी रैलियों में वे जिहाद से लेकर देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक टिप्पणियां करना भी नही भूलते। जिहाद के हवाले से वे कहते हैं असली ‘जिहाद’ किसी भी नेता, पार्टी या धर्म के खिलाफ लड़ने के बजाय गरीबी और बेरोजगारी से लड़ना है, जो हमारी सबसे बड़ी दुश्मन है। विधानसभा चुनावों से पहले जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल किए जाने की मांग करते हुए यह भी कहते हैं कि लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में नौकरशाही का लोकप्रिय शासन से कोई मुकाबला नहीं है।

किसी भी नेता या पार्टी को अपना दुश्मन नहीं मानते हैं। ईंधन और सब्जियों तथा दालों समेत अन्य दैनिक सामान की कीमतें बढ़ गयी है। घरेलू गैस कांग्रेस शासन में लोगों के लिए 400 रुपये में उपलब्ध थी, लेकिन अब कीमत तकरीबन तीन गुना बढ़ गयी है जिससे आम आदमी की परेशानियां बढ़ गयी है। ‘आजाद का दावा है कि मौजूदा सरकार सभी के साथ समान व्यवहार नहीं कर रही है और दशकों से रह रहे लोगों को उनकी जमीन से हटाने जैसे ‘जनविरोधी’ कदम उठा रही है। जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि आजाद बहुत सावधानी से खुद को राज्य कांग्रेस में मजबूत कर रहे हैं और जब भी चुनाव हुए, उनकी मर्जी न चली तो कांग्रेस को रक और सीमान्त राज्य में नया अमरिंदर सिंह मिल सकता है। फ़िलहाल गुलाम नबी घाटी में कांग्रेस का ‘आजाद’ चेहरा हैं जो कांग्रेस में रहकर कांग्रेस नेतृत्व से सवाल पूछ रहे हैं। कांग्रेस आलाकमान भी उनकी राजनीति को समझकर मौन है क्योंकि आजाद कि निकालने से कांग्रेस को ज्यादा नुकसान हो सकता है बनिस्बत इसके कि आजाद खुद आजाद हो जाएँ मतलब कांग्रेस छोड़ दें।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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