चुनाव आते ही इन नेताओं को याद आए मुंबई के उत्तर भारतीय

मुंबई राजनीति

– विजय यादव 

मुंबई। लगता है मुंबई में फिर कोई चुनाव है। तभी तो इन्हे उत्तर भारतीयों की याद आई है। हिंदी भाषी वोट की खेती करने वाले इन नेताओं को तब कभी उत्तर भारतीयों की याद नहीं आती जब सड़क किनारे से उसके खोमचे फेंक दिए जाते हैं, लॉक डाउन के समय जब वह मुंबई से सैकड़ो किलोमीटर दूर पैदल यूपी, बिहार, झारखंड जाने के लिए मजबूर हो जाता है। तब भी यह अनजान रहते हैं जब फुटपाथ पर सब्जी बेजने वाला हिंदी भाषी किसी गुंडे, मवाली का शिकार बन जाता है।

चुनाव आते ही इन्हे इनका परिश्रम दिखने लगता है। और यहीं से उत्तर भारतीयों को दुलारने पुचकारने का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह सब वह लोग कर रहे होते हैं जो हिंदी भाषियों के वोट बैंक की ठेकेदारी कर सरकार मे मंत्री बन जाते हैं। ऐसे ही नेताओं की एक सभा शनिवार को मुंबई के अंधेरी में हुई। सभा का उद्देश्य था उत्तर भारतीयों को एक करना और किसी उत्तर भारतीय को शहर का अगला मेयर बनाना। इनकी ऐसी ही मांगो से मुंबई में भाषावाद का जहर निर्माण होता है, जो आगे चलकर उत्तर भारतीयों के साथ मार पिटाई तक पहुंच जाता है।

अब बात करते हैं शनिवार की परिश्रम सभा का। इसके मुख्य अगुवा रहे राज्य के पूर्व गृह राज्यमंत्री कृपाशंकर सिंह। इनके साथ रमेश दुबे, चंद्रकांत त्रिपाठी और कभी मुंबई की राजनीति को नमस्कार कर उत्तर प्रदेश की राजनीति करने वाले रंगनाथ मिश्रा। यह वह नाम हैं जिन्हें उत्तर भारतीयों ने हमेशा शीर्ष पर बैठाया है। इनके पीछे उत्तर भारतीयों की ही ताकत थी जो पार्टी में पूछ परख होती थी। यहां कुछ और बताने से पहले एक छोटी सी कहानी बताता चलूं। किसी राजा ने प्रजा का हालचाल जानने के लिए एक नाई को जिम्मेदारी सौंपी थी। राजा का मानना था कि नाई का राज्य की प्रजा के साथ सीधा संपर्क होता है, वह कुशल क्षेम अच्छे से राज भवन तक पहुंचा सकता है। इस काम के बदले राजा ने कुछ गाय दे दी थी, जिससे वह दूध, दही, घी खूब खा सके। राजा जब भी नाई से प्रजा जा हाल पूछता, नाई का जवाब होता प्रजा दूध – भात खा रही है। कुछ दिनों बाद राज्य में अकाल पड़ा प्रजा दाने – दाने के लिए मोहताज हो गई। सारी प्रजा राजा के महल पहुंच गई। राजा ने मंत्री से कहा कि नाई तो बता रहा था जनता दूध भात खा रही है। मंत्री ने जवाब दिया राजा साहब अपनी दी हुई सारी गईया मंगा लीजिए। इसके बाद उससे पूछिए। राजा ने पहले तो प्रजा को अनाज देकर विदा किया। इसके बाद सभी गाय मंगा ली। फिर नाई से पूछा प्रजा का क्या हाल है? नाई ने कहा प्रजा बहुत दुखी है। दूध भात के लिए तरस रही है।  कहने का तात्पर्य यह कि जब तक इन्हे पार्टी से सब कुछ मिलता रहा तब तक उत्तर भारतीय संगठित और सुखी था। जब सत्ता सुख से वंचित हो गए तो उत्तर भारतीय असंगठित हो गया, उसके साथ अन्याय हो रहा है आदि – आदि। 

नेता यदुवंशम अजय यादव का कहना है कि चुनाव करीब आते ही इन्हे उत्तर भारतीय याद आने लगते हैं। इनके मेयर बनाने की मांग मुंबई मे अशांति पैदा करेगी। ऐसी ही गलती कुछ साल पहले सपा नेता अबू आसिम आजमी ने कांदिवली मे की थी। एक सभा में उत्तर भारतीयों को लाठी बांटने की बात कर विवाद पैदा कर दिया था। नतीजतन बड़ी संख्या में गरीब उत्तर भारतीयों को एक दल का शिकार बनना पड़ा था। अजय यादव ने आरोप लगाया है कि यह सब भाजपा के इशारे पर किया जा रहा है। ज्ञात हो कि पिछले विधानसभा चुनाव में कृपाशंकर सिंह भाजपा उम्मीदवार का प्रचार कर रहे थे। कांग्रेस से दूरी बना कर भाजपा में शामिल हुए बगैर भाजपा की रणनीति पर काम कर रहे हैं। पिछले चुनाव से बड़ी संख्या में उत्तर भारतीयों का लगाव शिवसेना से बढ़ा है। आज बड़ी संख्या में मुंबई के हिंदी भाषी मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और शिवसेना की विचारधारा से जुड़ रहे हैं। इनसे यही देखा नहीं जा रहा है। यह चाहते हैं कि उत्तर भारतीय मेयर को लेकर एक दल से विवाद हो और शिवसेना को बदनाम करने का मौका मिले और उत्तर भारतीयों को गुमराह कर भाजपा के साथ जोड़ा जा सके। मुंबई का हिंदी भाषी इनकी नीति को समझ रहा है। अब कोई इनके झांसे मे आनेवाला नहीं है। सुपारीबाज नेताओं को उत्तर भारतीय समाज ने पहचान लिया है। 

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