दुःख और ख़ुशी के बीच लौटता किसान

फीचर राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
एक
साल से ज्यादा चला किसान आन्दोलन समाप्त हो गया है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 19 नवंबर को की गई घोषणा कि केंद्र इसी महीने के अंत में शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए आवश्यक विधेयक लाएगा, के बाद लोकसभा और राज्यसभा दोनों ने 29 नवंबर को शीतकालीन सत्र के पहले दिन ही कृषि कानून वापसी बिल को पारित कर दिया गया था। किसानों ने 11 दिसंबर घर लौटने का फैसला किया और धीरे-धीरे दिल्ली की सीमा पर डटे किसान वापस लौटना शुरू भी हो चुका है। मगर इस आन्दोलन से जुडी कई अनसुनी, अनकही कहानियां भी है जिनका इस आन्दोलन में खास योगदान रहा। इस कहानियों में वे लोग भी शामिल हैं जो किसानों की जीत पर तो खुश हैं मगर इस आन्दोलन को जिंदा रखने के संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति को देने वाले परिजनों की याद में दुखी भी हैं।

घरों की ओर लौट रहे किसानों की खबर के बीच सिंघू सीमा पर किसानों के लिए एक साल तक लंगर चलाने वाले एक रेस्टोरेंट के मालिक सुर्खियों में हैं। आंदोलन के दौरान हजारों किसानों को मुफ्त में भोजन कराने वाले गोल्डन हट के मालिक राम सिंह राणा भी यह आन्दोलन समाप्त होने के बाद खुश नजर आ रहे हैं। उनकी सेवाओं के लिए संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उनका शुक्रिया भी अदा किया। बकौल राणा रामपाल सिंह ने उनकी खुशी का मुख्य कारण यह है कि किसान जीत गए हैं। वे कहते हैं कि किसान मेरा परिवार है। ये लंगर तब तक चलेगा, जब तक की हर एक किसान अपने घर नहीं चला जाता। राणा रामपाल सिंह रोजाना करीब 4 लाख रुपये खर्च कर किसानों के लिए लंगर चला रहे थे। किसान आंदोलन के दौरान रेस्टोरेंट बंद हो गया था। अब आंदोलन खत्म होने के बाद फिर से अपना रेस्टोरेंट खोलने की तैयारी में हैं।

दूसरी तरफ किसान आंदोलन के दौरान शहीद हुए किसान जसवंत सिंह के बेटे मनप्रीत सिंह के पिता 24 मई को आंदोलन में आए थे और 31 मई तक यहां रहे जब अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें इमरजेंसी में अस्पताल में करवाया गया जहां उनकी मौत हो गई। इससे पहले भी वे छह सात बार इस आंदोलन में आ चुके थे। मनप्रीत कहता है,, “हम जीत कर वापस जा रहे हैं, पापा भी होते तो अपने साथियों के साथ वापस जाते, लेकिन पापा तो अब कभी वापस नहीं आएंगे। पापा की बहुत याद आती है। मां बाप के बिना दुनिया में कुछ नहीं है. वो साथ थे तो कोई टेंशन नहीं थी। मौत तो सबकी आनी है, लेकिन मुझे गर्व है कि मेरे पापा इस आंदोलन में शहीद हुए हैं। जब मैं घर नहीं होता तो मेरी मां घर में अकेली रोती रहती है। उन्हें भी पापा पर मान है और मुझे हिम्मत देती हैं।” इस आंदोलन में हिस्सा लेने आए जसवंत सिह के एक साथी का कहना है कि दुख होता है कि हमारे काफिले से दो साथी बिछड़ गए, वे कभी वापस नहीं आएंगे। हम सब लोग तब से ही साथ थे जब से इन कानूनों के खिलाफ और सरकार के खिलाफ अलग अलग तरीके से आंदोलन शुरू किया था। हम मोगा जिले से हैं, हमारे वो दोनों साथी जीत सिंह और जसवंत सिंह दिन रात हमारे साथ रहते थे। मोगा स्टेशन पर भी हमने 56 दिन आंदोलन किया था। तब भी वो हमारे साथ ही रहते थे।”

जाहिर है जसवंत जैसे सात सौ परिवार ऐसे हैं जिन्होंने इस आन्दोलन में अपनों को खोया है। सरकार कह रही है कि उसकी पुलिस की कार्रवाई में किसी किसान कि मौत नही हुई है जो सही भी है। अच्छा होता सरकार सरकार यह भी बता देती कि किसकी जिद और अड़ियल रवैये के कारण यह आन्दोलन इतना लंबा चला।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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