बंगाल में अंतरकलह से जूझती तृणमूल और भाजपा

राजनीति लेख

अजय भट्टाचार्य
कोलकाता
व हावड़ा नगर निगम के चुनाव दहलीज पर हैं और चुनावी जंग से पहले तृणमूल कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी अपने भीतरी संघर्ष से परेशान है। विधानसभा चुनाव में तृणमूल की तीसरी जीत की राह इतनी आसान नहीं थी जितना माना जा रहा था। कारण भाजपा जो पूरी शक्ति के साथ चुनावी दंगल में उतरी थी तथा अपना दमखम दिखाने के लिए भाजपा ने साम-दाम-दंड-भेद की नीति तक अपनायी। भाजपा की इन्हीं नीतियों में से एक खास नीति तृणमूल को तोड़ना था जिसके तहत कई तृणमूल के नेताओं को भाजपा में शामिल करवाया गया। अब जब राज्य में ममता सरकार बन चुकी है और घर के गये सदस्यों के हाथ कुछ नहीं आया तो लाजमी है वे निराश होकर घर वापसी की ही राह पकड़ेंगे। इस कड़ी में कुछ नेताओं ने घर वापसी भी की तो कुछ अभी भी कतार में इंतजार कर रहे हैं। कुर्सी की चाहत ने पार्टी बदलने पर तो विवश कर दिया लेकिन हार की शिकस्त ने घर वापसी करवाने के बाद नये-पुराने का मेल तृणमूल में ही आपसी बैर बढ़ा रहा है। इसकी कुछ झलकियां हाल में देखने भी मिली हैं।
राजीव बनर्जी ने विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली मुख्यालय में जाकर भाजपा का दामन थामा था। पार्टी ने टिकट भी दिया लेकिन जनता ने साथ देने से मना कर दिया। राजीव हार गये और तैयारी में जुट गये कि कैसे घर वापसी हो। लंबी जद्दोजहद के बाद त्रिपुरा में तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बंद्योपाध्याय की अगुवाई में राजीव बनर्जी ने पुरानी पार्टी में वापसी की । राजीव की वापसी के कुछ दिन बाद ही हावड़ा में तृणमूल सांसद प्रसून बनर्जी न सिर्फ मुखर हुए बल्कि सरेआम धमकी तक दे डाली कि राजीव बनर्जी हावड़ा में पैर रखने की गलती न करें वरना अंजाम बुरा होगा। इसके पहले श्रीरामपुर के सांसद कल्याण बनर्जी भी राजीव को लेकर लगातार अपनी नाराजगी जाहिर करते आये हैं। इधर तृणमूल के विधायक रह चुके प्रबीर घोषाल भी रुठ कर भाजपा के खेमे में गये तो थे लेकिन वहां अपनी ही सीट पार्टी बदलने के बाद बचा न पाएं। अब उनका मन भाजपा से ऊब चुका है। अपनी नाराजगी उन्होंने तृणमूल के मुखपत्र तक में जग-जाहिर कर दी और भाजपा की तमाम गलतियों को गिना दिया। प्रबीर ने कहा कि मन से वे भाजपा के नहीं हैं। वे तृणमूल में आना चाहते हैं लेकिन औपचारिक रूप से उनकी वापसी के आसार फिलहाल दिख नहीं रहे हैं। हालांकि घर वापसी से पहले ही उनके क्षेत्र उत्तरपाड़ा में तृणमूल के कुछ नेता उनकी वापसी नहीं चाहते हैं क्योंकि वे उन्हें गद्दार मानते हैं।

दूसरी तरफ नगर निगम चुनाव के लिए भाजपा ने चुनावी प्रबंधन समिति बनते ही पार्टी में विवाद भी शुरू हो गया है। भाजपा नेताओं के एक वर्ग का कहना है कि इस बार भी भाजपा ने पुरानी गलती दोहरायी और नयी कमेटी में पुराने लोगों को हटाकर नये लोगों को अधिक अहमियत दी गयी। कोलकाता में चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी पूर्व केंद्रीय मंत्री व तृणमूल से भाजपा में आये दिनेश त्रिवेदी को दी गयी है। इसी तरह सह प्रभारियों में भी तृणमूल से आये वैशाली डालमिया और रुद्रनील घोष जैसे नाम हैं। इसके अलावा सजल घोष, सुब्रत ठाकुर, बंकिम घोष, सुशांत घोष को भी शामिल किया गया है जो तृणमूल, माकपा या कांग्रेस से भाजपा में आये थे। हावड़ा में भी चुनाव प्रबंधन का जिम्मा रथिन चक्रवर्ती को दिया गया है जो हावड़ा नगर निगम के मेयर रह चुके हैं। उनके अलावा मनोज पाण्डेय व सुप्रीति चटर्जी सह प्रभारी बनाये गये हैं जो कांग्रेस व तृणमूल से भाजपा में आये थे। वहीं जटू लाहिड़ी, बानी सिंघा राय, शीतल सरदार, सुदीप मुखर्जी जैसे नेता प्रचारक सदस्यों में शामिल किये गये हैं जो तृणमूल या दूसरी पार्टियों से भाजपा में आये थे।
बड़े नाम संजय सिंह और सायंतन बसु का है जो पिछले काफी समय से भाजपा से जुड़े हुए हैं। इस बारे में पूछे जाने पर कुछ भाजपा नेताओं ने तर्क दिया कि पदाधिकारियों को कमेटी में शामिल नहीं किया गया है जबकि प्रदेश उपाध्यक्ष राजू बनर्जी, प्रदेश महासचिव ज्योतिर्मय सिंह महतो जैसे नाम कमेटी में रखे गये हैं। भाजपा के कद्दावर नेता और हावड़ा के वार्ड नं. 18 से पार्टी का झण्डा हमेशा ऊंचा रखने वाले प्रदेश भाजपा के महासचिव संजय सिंह का नाम क्यों कमेटी में शामिल नहीं किया गया, इसे लेकर पार्टी के ही कई नेता व कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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