मुंबई अध्यक्ष को लेकर नींद मे है कांग्रेस

मुंबई

विपक्ष का मुकाबला करना है तो किसी उत्तर भारतीय को बनाये अध्यक्ष

विजय यादव/ न्यूज़ स्टैंड18
मुंबई। कांग्रेस को राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ लगातार उनकी राज्य सरकारों के लिए संकट पैदा कर विपक्ष इस तरह घेरती जा रही है कि कांग्रेस के पास मुंबई अध्यक्ष घोषित करने के लिए समय नहीं मिल रहा है। अगर स्थिति यही रही तो देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से कांग्रेस की बची साख भी उखड जायेगी। कांग्रेस जहाँ मुंबई अध्यक्ष को लेकर अभी भी नींद में है वहीँ भाजपा ने अपनी नई टीम की घोषणा के साथ 2022 के मनपा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा ने अपना अध्यक्ष बनाते समय वर्षों पहले कांग्रेस के फार्मूले को कॉपी किया है। भाजपा ने राजस्थानी मूल के मंगल प्रभात लोढ़ा को दूसरी बार मुंबई की कमाना सौंपा है।
इस नियुक्ति को कांग्रेस की कॉपी इसलिए कहा जा सकता है कि कभी मुंबई में कांग्रेस के लम्बे समय तक मुखिया मुरली देवड़ा रहे। मुरली 22 सालों तक मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। इसके साथ ही दक्षिण मुंबई से 4 बार सांसद चुने गए।
देवड़ा के कार्यकाल में कांग्रेस के साथ खासकर उत्तर भारतीय समाज खूब मजबूती से जुड़ा था। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उस समय यूथ का अध्यक्ष उत्तर भारतीय था। यह समय वर्ष 1980- 83 के मध्य का था, जब यूथ अध्यक्ष मधुकांत शुक्ला थे। उस समय कांग्रेस में यूथ की तूती बोलती थी। मुंबई के लाखों उत्तर भारतीयों मधुकांत शुक्ला के रूप मे एक मजबूत नेतृत्व मिला हुआ था। उन्होने मुंबई मे राजीव गांधी पद यात्रा भी आयोजन किया था। राजीव गाँधी के युवा प्रोत्साहन का असर इतना था कि किसी भी आंदोलन में यूथ सबसे आगे रहता था। धारावी से घाटकोपर तक राजीव गांधी के साथ मधुकांत की पद यात्रा को आज भी संगठन में याद किया जाता है। इस यात्रा में लाखों की संख्या में लोग शामिल हुए थे। बताया जाता है कि 14 किलोमीटर की यात्रा मे सिर्फ मानव ही मानव दिखाई दे रहा था। मानव की आड़ मे सारे मकान ढक गये थे। इसके बाद राजीव गांधी ने धारावी के विकास के लिये 100 करोड़ रुपया दिया था। आगे चलकर धीरे-धीरे यूथ कांग्रेस कमजोर पड़ता गया और युवाओं रुझान भी कांग्रेस से काम होने लगा। कांग्रेस की इस कमजोरी को भाजपा ने खूब भुनाया।
वर्ष 2014 में भाजपा ने युवाओं के साथ-साथ उत्तर भारतीय मतदाओं को भी कांग्रेस से छीन ले गई। नतीजा यह रहा कि मुंबई की सभी 6 सीटों पर भाजपा-सेना का कब्जा हो गया। कभी कांग्रेस का गढ़ कहा जाने वाला दक्षिण मुंबई भी भाजपा-शिवसेना गठबंधन को चला गया। सुनील दत्त की पुत्री प्रिया दत्त भी अपनी पुस्तैनी सीट नहीं बचा पाई।
मुरली देवरा के बाद कृपाशंकर सिंह को भी उत्तर भारतीय नेता के रूप में अध्यक्ष बनाया गया था। कृपाशंकर उत्तर भारतीय कोटे से गृह राज्य मंत्री भी रहे। इसके बाद कांग्रेस ने मुंबई में कई प्रयोग किये। मराठी भाषा के साथ दलित चहरे को भी कमान सौंपी गई, लेकिन कांग्रेस से खिसक चुका उत्तर भारतीय लौटकर नहीं आया।
अब बात करते हैं वर्त्तमान गणित और भावी अध्यक्षों की। मुंबई अध्यक्ष की रेस में तो ऐसे कई नेता हैं लेकिन इनमे जो नाम सबसे चर्चे में है। वह है अमरजीत मनहास, चरण सिंह सप्रा, अध्यक्ष अंतरिम अध्यक्ष एकनाथ गायकवाड़, भाई जगताप और मधुकांत शुक्ला।
अब बात करते हैं इनके प्रभाव और मत प्रतिशत की। अमरजीत मनहास और चरणसिंह सप्रा पंजाब के सिख समाज से है। मुंबई के लगभग कुल 81 लाख 34 हजार मतदाताओं मे 2 प्रतिशत वोट सिख समाज का है। इस समाज पर भाजपा के सरदार तारा सिंह का सबसे ज्यादा प्रभाव है। मुंबई की राजनीति मे मना जाता है कि सिख समाज का सबसे ज्यादा वोट सरदार तारा सिंह के प्रभाव मे रहता है। इसके आलावा इन लोगों का अन्य समाज पर पकड़ नही के बराबर है। इसलिये इनसे बहुत लाभ पार्टी को मुंबई मे नही मिल सकता।
इसी तरह एकनाथ गायकवाड़ और भाई जगताप कांग्रेस मे मराठी भाषी नेता माने जाते हैं। मुंबई मे करीब 48 प्रतिशत मराठी वोटर हैं। इस मराठी मतदाताओं के तीन बड़े दावेदार हैं। शिवसेना, मनसे और राकांपा। इसके आलावा भाजपा और कांग्रेस भी सोशल इन्जीनियरिंग के सहारे कुछ प्रतिशत तोड़ने मे जरूर सफल रहती है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि मराठी वोट अन्य लोगों की अपेक्षा ज्यादा बटा हुआ है। इसके साथ ही उत्तर भारतीय मत करीब 33 प्रतिशत है। यह वोट वर्तमान समय मे कांग्रेस और भाजपा के साथ ही जाता है। यहां यही कहा जा सकता है कि इनके बीच विभाजन कम है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर भारतीयों का एक बड़ा तबका भाजपा के साथ चला गया। जो मुंबई मे कांग्रेस की गिरावट का बड़ा कारण है।
आगे बात करते हैं मधुकांत शुक्ला की। मधुकांत शुक्ला उत्तर भारतीय नेता होने के साथ-साथ ब्राह्मण समाज से हैं। उत्तर भारतीय मतदाताओं मे ब्राहमण वोट सबसे ज्यादा है। जातिय गणित मे ब्राहमण के बाद मुंबई मे यादव मतदाताओं की संख्या दुसरे स्थान पर है। यादव वोट बैंक मे धीरे-धीरे शिवसेना ने सेंध लगाना शुरु कर दिया है। अब इन्हे भी जातिय गणित समझ मे आने लगा है। हम बात करते हैं ब्राहमण लीडर की। उत्तर भारत की तमाम जातियों मे सिर्फ ब्राह्मण एक ऐसा वर्ग है जो अन्य जातियों को साथ मे लेकर चलने की काबिलियत रखता है। इसका सबसे बड़ा कारण वहां की संसकृति और सभ्यता है। ब्राह्मण का सभी जातियों के साथ धार्मिक लगाव है। यही वजह है कि इनकी कन्वेसिंग पॉवर सबसे अधिक होती है। इसका प्रमाण वर्तमान परिदृश्य मे भाजपा है।अगर कांग्रेस यह निर्णय लेने मे सफल हो जाती है कि मुंबई का अध्यक्ष कोई जाना पहचाना ब्राह्मण चेहरा हो तो इसके लिये मधुकांत शुक्ला कांग्रेस के लिये फायदे का सौदा हो सकता है। 2022 के मनपा चुनाव के साथ-साथ कांग्रेस को इस समीकरण का लाभ उत्तर प्रदेश मे भी हो सकता है। उत्तर प्रदेश के लगभग हर परिवार से 4-6 सदस्य मुंबई मे रहते हैं। गांव मे रहने वाले अन्य सदस्यों के आय का सबसे बड़ा स्त्रोत यही है। कहने का मतलब कांग्रेस मुंबई मे उत्तर भारतीय होने के साथ-साथ ब्राह्मण चेहरा को नेतृत्व देकर उत्तर प्रदेश मे खुद को मजबूत करने का काम कर सकती है।

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