समानांतर विपक्षी गठबंधन फासीवाद की मजबूती

फीचर राजनीति

अजय भट्टाचार्य
शिवसेना
के मुखपत्र सामना में शनिवार का संपादकीय और रविवार को अख़बार के कार्यकारी संपादक संजय राउत का स्तंभ रोख-ठोक पढने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस गैर कांग्रेसी विपक्षी मोर्चे को गढने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जुटी हुई हैं वह बिना कांग्रेस के संभव नहीं है। मतलब यह है कि शिवसेना के अनुसार भव्य पुरानी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति से दूर रखना और बिना यूपीए के समानांतर विपक्षी गठबंधन बनाना यह सत्तारूढ़ भाजपा और “फासीवादी” ताकतों को मजबूत करने जैसा है।

‘सामना’ संपादकीय के अनुसार जो लोग कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को नहीं चाहते हैं, उन्हें पीठ पीछे बात करके भ्रम पैदा करने के बजाय सार्वजनिक रूप से अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। अगर भाजपा से लड़ने वाले लोगों को भी लगता है कि कांग्रेस का अस्तित्व समाप्त हो जाना चाहिए, तो यह रवैया “सबसे बड़ा खतरा” है। अगर विपक्षी दलों के बीच एकता नहीं है, तो भाजपा का राजनीतिक विकल्प बनाने की बात बंद कर देना चाहिए। शिवसेना की टिप्पणी ममता बनर्जी की हालिया मुंबई यात्रा के मद्देनजर आई है, जिसमें उन्होंने एक बयान दिया था कि ‘अब कोई यूपीए नहीं है’। इसी क्रम में तृणमूल के मुखपत्र जागो बांग्ला में कांग्रेस पर एक नया हमला करते हुए कहा गया था कि यह “डीप फ्रीजर” में चली गई है। ‘जागो बांग्ला’ ने यह भी दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी नहीं बल्कि ममता बनर्जी विपक्ष के चेहरे के रूप में उभरी हैं। यह सही है कि भाजपा का एक मजबूत विकल्प बनाने पर आम सहमति है। मगर ममता बनर्जी जिस तरह खुद को सबसे बड़े योद्धा के रूप में स्थापित करना चाहती हैं, क्या वह संभव है, यह प्रश्न भी विचारणीय है। खासकर तब जब महाराष्ट्र जैसा प्रान्त जहाँ उत्तर प्रदेश के बाद लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें हैं, वह बंगाल को अपने सिर पर क्यों बिठाएगा? नेतृत्व एक माध्यमिक मुद्दा है, लेकिन कम से कम एक साथ आने पर निर्णय होना चाहिए। अगर तीस साल पहले लौटें तो घोर राजनीतिक विरोध के बावजूद भाजपा कांग्रेस विरोधी मोर्चे में शामिल न होकर भी जनता दल सरकार का समर्थन कर रही थी। कांग्रेस का विरोध करने में भाजपा ने वामो से भी मित्रता करने में संकोच नहीं किया। फिर ममता भाजपा और मोदी विरोधी विपक्ष की जिस कांग्रेस विहीन गठबंधन की संरचना की आपाधापी में जुटी हैं, वह कितनी सार्थक होगी इस पर संदेह होता है।
चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के हालिया ट्वीट का भी उल्लेख यहाँ करना जरूरी है जिसमें कहा गया था कि कांग्रेस का नेतृत्व किसी व्यक्ति का “दिव्य अधिकार” नहीं है, खासकर जब पार्टी “पिछले 10 वर्षों में 90 प्रतिशत से अधिक चुनाव हार गई है। किशोर और उनकी आई-पैक टीम पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से तृणमूल के लिए काम कर रही है और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के विस्तार के लिए रणनीति तैयार करने पर काम कर रही है। लेकिन प्रशांत किशोर को यह भी पता होना चाहिये कि पहले भाजपा का यह कहकर उपहास उड़ाया जाता था कि वह विपक्षी बेंच पर स्थायी रूप से बैठने के लिए पैदा हुई थी, लेकिन आलोचना के बावजूद पार्टी ने अब नई ऊंचाइयों को छुआ है। संसदीय लोकतंत्र में ठहराव जड़ता पैदा करता है और कांग्रेस इसी जड़ता का शिकार भी हुई है। आज भाजपा भी 2050 तक राज करने की गर्वोक्ति का उच्चारण कर उसी जड़ता को पोषित करने में लगी है। जहाँ तक भाजपा की नीतियों के विरुद्ध खड़े होने की बात है तो कांग्रेस नेतृत्व तमाम कपोलकल्पित चरित्र हनन की भाजपाई चुनौतियों और उपहास का सामना करते हुए अपनी और जनता की बात करता दिख तो रहा है। जिन्हें नहीं दिख रहा है उन्हें भी तब साफ दिखेगा जब उनके बच्चे हाथ में तलवार लिए कथित धर्मरक्षा की वेदी पर सिर काट और कटा रहे होंगे। कांग्रेस का दुर्भाग्य यह है कि जो लोग उस पार्टी के कारण राजनीतिक रूप से विकसित हुए, वे अब इसे दबाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर ममता की बात मैन भी ली जाये कि यूपीए नहीं है, तो एनडीए भी कहाँ है? आज भले भाजपा को एनडीए की जरूरत न हो मगर यह भी सही है कि मजबूत विपक्षी गठबंधन भी बिना कांग्रेस के संभव नहीं है और अगर ऐसा है तो यूपीए भी अस्तित्व में है। और इसीलिए सामना के संपादकीय में उठाया गया सवाल अभी तक अनुत्तरित है कि जो लोग कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए नहीं चाहते हैं उन्हें अपना रुख सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए और पीठ पीछे बात करके भ्रम पैदा नहीं करना चाहिए।

विपक्षी दलों को यूपीए की जरूरत है। यूपीए के समानांतर गठबंधन बनाना का अर्थ भाजपा को मजबूत करना है। यह ममता को चुनना होगा। सोनिया गांधी और राहुल को यह भी बोलना चाहिए कि वे यूपीए के साथ क्या करने की योजना बना रहे हैं। जो लोग विपक्षी दलों का मजबूत गठबंधन चाहते हैं, उन्हें यूपीए को मजबूत करने के लिए पहल करनी चाहिए। भले ही कांग्रेस के साथ मतभेद हो, यूपीए अभी भी साकार हो सकता है। जो लोग चाहते हैं कि देश में एक मजबूत विपक्षी मोर्चा उभरे, उन्हें कांग्रेस को साथ लेकर यूपीए को मजबूत करने के लिए आगे आना चाहिए।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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