76 सीटों की जुगाड़ है गंगा एक्सप्रेस वे

उत्तर प्रदेश लेख

अजय भट्टाचार्य
किसान
आंदोलन के संभाव्य फलित से सहमी भारतीय जनता पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत बनाये रखने के लिए ‘काम न कर काम का जिक्र कर, मालिक के सामने काम की फ़िक्र कर’ की नीति पर अमल करना शुरू कर दिया है। उप्र में चुनाव दस्तक दे रहे हैं इसलिये पार्टी काम करते हुए दिखना चाहती है। इसलिये जितने भी लंबित काम हैं धड़ाधड़ उनका शिलान्यास कर काम करते हुए दिखाया जा रहा है। सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ रोज गिना रहे हैं कि इतनी नौकरियां बाँट दीं जबकि शिक्षकों के स्थाई होने का मसला अब भी कायम है। दिल्ली वाले बाबाजी के भाषणों में मंदिर, मस्जिद, नेहरू तो हैं मगर उप्र में बने स्मार्ट सिटी गायब हैं। विकास के अजेंडे से अतीत के कथित अपमान, अत्याचार की डोली पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को ढोया जा रहा है। शुक्रवार को जिस गंगा एक्सप्रेस वे का शिलान्यास किया गया है उसके पीछे सूबे की 76 विधानसभा सीटों को साधने की रणनीति है। खासतौर से उन विधानसभा क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया जाना है, जहां 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला था। गंगा एक्सप्रेस-वे 12 जिलों की 76 विधानसभा सीट से होकर गुजरेगा। इन 76 सीटों में से 55 पर भाजपा का कब्जा है, जबकि 9 पर सपा और 4 सीटें बसपा के पास हैं. 3 कांग्रेस और 5 अन्य के पास हैं। इन सीटों को अपने पाले में करने की कोशिश के तहत ही भाजपा विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से कुछ ही दिन पहले गंगा एक्सप्रेस-वे का शिलान्यास प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी से करवाकर बढ़ रही है। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेस-वे का उद्घघाटन कराने की भी तैयारी है। पूरे सडक निर्माण को तीन खंडो में विभाजित किया गया है। इन तीनों खंडों को जल्द से जल्द तैयार करने के लिए कंपनियों से कहा गया है। निर्माण करने वाली अडानी समूह की कंपनी भी है.जिससे तीनों का अलग-अलग हिस्सों में चुनाव लोकसभा चुनाव से पहले उद्घघाटन किया जा सके।

किसान आंदोलन के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा बैकफुट पर है। तीनों कृषि कानून वापस लेकर केंद्र सरकार ने सियासी समीकरण को साधने की कोशिश जरूर की है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके बाद भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 136 सीटों में से 60 से ज्यादा सीटों पर असर पड़ेगा। ऐसे में गंगा एक्सप्रेस के सहारे पश्चिम की इन विधानसभा क्षेत्रों के मतदाताओं को साधने की कोशिश है। राज्य की सत्ता तक पहुंचने के लिए भाजपा की कोशिश है कि बरेली मंडल की सभी 25 सीटों में से अधिक से अधिक सीट पर जीत दर्ज की जाए। इस मंडल की 25 सीटों में से भाजपा ने 2017.के चुनाव में 23 सीटों पर जीत दर्ज की थी। बदायूं की सहसवान और शाहजहांपुर की जलालाबाद सीट पर जीत नहीं मिली थी, जबकि अवध की 25 में से 22 सीट पर जीत दर्ज की थी। यहां की सीतापुर के महमूदाबाद और हरदोई की हरदोई शहर सीट सपा के खाते में चली गई थी। जबकि सीतापुर की सिंधौलि सीट पर बसपा का कब्जा है। इस एक्सप्रेस वे से फर्रुखाबाद को अलग-थलग कर दिया गया है जिससे वहां के मतदाता में नाराजगी है। इस जिले में कुल चार विधान सभा सीटें हैं जो फ़िलहाल भाजपा के पास हैं। प्रदेश की राजनीति में फर्रुखाबाद का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह समाजवाद के नायक डॉ. राममनोहर लोहिया की कर्मस्थली रही है। फर्रुखाबाद विधानसभा सीट पर 1951 से लेकर अब तक अधिकांश बार इस सीट पर कांग्रेस ने ही जीत दर्ज की है। यहां कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से रहा है। लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस कमजोर पड़ी और सपा मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। 2017 के चुनाव में इस सीट पर भाजपा के मेजर सुनील दत्त द्विवेदी ने बसपा के मो. उमर खान को 45427 वोट से हरा दिया. वहीं 2012 के चुनाव में निर्दल प्रत्याशी विजय सिंह ने भाजपा के मेजर सुनील दत्त को मात्र 147 वोट से हराया था। विजय सिंह मेजर सुनीलदत्त के पिता ब्रह्मदत्त की हत्या के आरोपी भी रहे हैं। पिछले दिनों गंगा एक्सप्रेस वे में फर्रुखाबाद को भी शामिल करने के लिए स्थानीय युवाओं ने भईयन मिश्रा के नेतृत्व में आन्दोलन भी किया था। अब चूँकि इसका शिलान्यास हो चुका है और फर्रुखाबाद को घंटा टिका दिया गया गया है, इसकी प्रतिध्वनि आगामी विधानसभा चुनाव में सुनी व देखी जाएगी। क्योंकि 2017 से पहले यहाँ की चारों सीटें सपा और निर्दलीय के पास थीं। अब गंगा एक्सप्रेस वे भाजपा के लिए चुनावी वैतरिणी बनता है या मुक्तिदाता, यह समय ही बतायेगा।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published.