नफरत के अँधेरे को चीरती एक किरण

फीचर राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
बुजुर्ग
कहते हैं कि अँधेरे से लड़ने के लिए सूरज का इंतजार मत करो, एक दीपक जलाओ और अँधेरे को हारते हुए देखो। देश में बढ़ते धार्मिक नफरत के अँधेरे को चीरती एक दिये की लौ राजस्थान के करौली में भी दिखाई पड़ी है। हफ्ते भर से ज्यादा समय से सोशल मीडिया मधूलिका सिंह के साहस की कहानी से गुलजार था तब कहीं गोदी मीडिया सहित तमाम मीडिया को लगा कि मधूलिका की कहानी बतानी चाहिए। बहरहाल करौली में हुए दंगा फसाद और सियासत के गंदे ‘खेल’ से हटकर इंसानियत की मिसाल बनकर मधूलिका सिंह और मिथिलेश सोनी उभरी हैं। जब दंगा भड़क रहा था पीड़ितों की मदद के लिए सामने आए लोग बेशक साधारण थे लेकिन मदद का उनका जज्बा बहुत बड़ा था। इन साधारण लोगों में मधूलिका और मिथिलेश भी शामिल हैं। मधुलिका और उनके भाई संजय ने अपने परिवार की परवाह किए बिना करीब 15 मुस्लिमों को घर में शरण दी और इनकी जान बचाने के लिए निडर हो कर दंगाइयों का सामना किया। इसी तरह ब्यूटी पार्लर चलाने वाली मिथिलेश सोनी ने तीन महिलाओं के साथ बाल्टी भर-भरकर आस-पास की दुकानों में लगी आग को बुझाने का प्रयास किया। मधूलिका सिंह जादौन करौली के सांप्रदायिक तनाव के बीच में लोगों के लिए मददगार बनीं। इस अकेली महिला ने ने दंगाइयों का सामना करते हुए करीब 15 लोगों की जान बचाई। उनकी बाजार में कपड़े की दुकान है। गुड़ी पड़वा को जुलस जब इस बाजार से गुज़र रहा था तो दंगा भड़क गया। मधूलिका ने तोड़फोड़ और आगजनी की आवाज के बीच देखा कि लोग दुकानें बंद करके भाग रहे हैं। सामने से उग्र भीड़ आ रही थी,ऐसे में मधूलिका डरी नहीं। उन्‍होंने दंगे में फंसे लोगों को अंदर बुलाकर अपने घर में शरण दी। ये लोग उनके घर में करीब दो घंटे तक रहे। मधूलिका बताती हैं, ‘” मैं बाहर आई और पूछा कि शटर क्यों डाउन कर रहे हो तो उन्होंने जवाब दिया कि दंगा हो गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मैंने उन्‍हें अपने घर में शरण देकर दरवाजे पर ताला जड़ दिया। मैंने उनको इंसानियत के नाते से बचाया है। अफरातफरी का माहौल था। भीड़ दुकानों में तोड़-फोड़ कर रही थी और आग भी लगा रही थी।“ उनके भाई संजय सिंह के अनुसार लगभग 16-17 लोग थे, जिनमें 12-13 मुस्लिम थे और बाकी लोग हिन्दू। हमने उन सबसे कहा कि आप घबराये नहीं, आप लोग यहां सुरक्षित है।

आसपास दुकानों में आग लग रही थी। तब मॉल में ब्यूटी पार्लर चलने वाली मिथिलेश सोनी ने तीन महिलाओं के साथ मिलकर बाल्टियों से आग बुझाने की कोशिश की। इस दौरान उन्होंने यह नहीं पूछा कि दुकानें किसकी है और उनका धर्म क्या है? मिथिलेश ने मुस्लिम बच्चों को बाहर नहीं निकलने दिया क्योंकि बाहर लोग हिंसा पर उतारू थे। फिर उन्होंने देखा कि दुकानों में आग लगाई जा रही है। उन्होंने बाल्टियों टंकी से भर-भरकर पानी डाला। करौली के इस मुख्य बाजार में सालों से दोनों संप्रदाय के लोग अपना धंधा करते है. जिन मुस्लिम समुदाय के लोगों की जान मधूलिका और संजय ने बचाई, वे कहते हैं कि वे जिंदगीभर इनके अहसानमंद रहेंगे। दंगे का शिकार दुकानदार मोहम्मद तालिब खान के मुताबिक “बाहर भगदड़ मच गई। पत्थरबाजी हो रही थी और लोग डंडे लेकर घूम रहे थे। दीदी ने हमें बुलाया कि कोई टेंशन नहीं है। लोग दुकान लूट रहे थे, लेकिन दीदी ने हमें बचाया।” करौली का दंगा अब राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। भाजपा के उत्साही सांसद व युवा मोर्च मुखिया तेजस्वी सूर्या अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने भी गये मगर प्रशासन ने य्न्हें करौली जाने की इजाजत नहीं दी। लेकिन यहां के लोग कहते हैं कि शान्ति और सद्भाव के साथ रहना चाहते हैं। बाजार कमेटी सदर बाजार व्‍यापार संघ के अध्यक्ष राजेंद्र शर्मा बताते हैं,”हमारे बाजार में हर जाति और हर वर्ग का व्यापारी हैं। करीब 50 दुकान मुसलमान भाइयों की हैं। ऐसी स्थिति कभी नहीं रही कि दरारें पड़ें। हम चाहते है भाईचारा कायम रहे। काश वोटों के सौदागर शर्माजी की बात सुनें।

मध्यप्रदेश के बड़वानी (Barwani) में पुलिस ने 10 अप्रैल को शहर में हुई सांप्रदायिक झड़पों के दौरान दंगे और आगजनी के आरोप में 11 मार्च से जेल में बंद तीन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है. दरअसल शहर में सांप्रदायिक दंगों के बाद 10 अप्रैल को दो मोटरसाइकिलों को आग लगाने के आरोप में जिन तीनों पर मामला दर्ज किया गया है, उनकी पहचान शहबाज़, फकरू और रऊफ के रूप में हुई है. तीनों पांच मार्च से आईपीसी की धारा 307 के तहत हत्या के प्रयास के मामले में जेल में बंद हैं.

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बड़वानी पुलिस ने रामनवमी (Ramnavmi) के जुलूस में पथराव और हिंसा के बाद लगभग 1 दर्जन एफआईआर दर्ज की थी ये उनमें से हैरत की बात ये है कि जिस थाने में हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया गया था, उसी थाने में दंगा करने का मामला दर्ज किया गया है. बड़वानी जिले के एसपी ने 11 मार्च को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया था कि 11 मार्च को सिकंदर अली पर फायरिंग के लिए धारा 307 के तहत शहबाज़, फकरू और रऊफ पर मामला दर्ज किया गया था, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था. तब से तीनों जेल में हैं.

बड़वानी पुलिस के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि पहले से ही जेल में बंद तीनों दंगा और आगजनी कैसे कर सकते हैं. सेंधवा एसडीओपी मनोहर सिंह ने इस मामले में कहा कि “हम मामले की जांच करेंगे विवेचना में जेल अधीक्षक से उनकी जानकारी लेंगे, अभी जो मामला दर्ज किया गया है वो फरियादी के आरोपों के आधार पर दर्ज किया गया है.

शहबाज़ की मां सकीना ने आरोप लगाया है कि सांप्रदायिक झड़पों के बाद उनके घर को तोड़ दिया गया था और उन्हें कोई नोटिस दिया गया था. ” यहां पुलिस आई मेरा बेटा डेढ़ महीने से अंदर है उसको आपसी झगड़े में अंदर कर दिया था यहां पुलिस आकर हमें बाहर कर दिया बोला आपका घर तोड़ना है, हमारा सामान भी तितर-बितर कर दिया मेरे बच्चे का कहीं से कुछ था ही नहीं वो तो जेल में था वो तो पुलिस को पूछना चाहिये उसपर क्यों एफआईआर दर्ज की.

उसको पुलिस ने भेजा किस वजह से उसका नाम आया. मुझे पुलिस से पूछना है किसने उसको बाहर किया, हमने पुलिसवालों को बताया लेकिन हमारी कोई सुनने को तैयार ही नहीं था. हमने हाथ जोड़ा, माफी मांगी. छोटे बेटे का नाम ही नहीं था उसको भी उठाकर लेकर गये. शाहबाज़ आदतन अपराधी है उसके खिलाफ महाराष्ट्र के अकोला में हत्या और मध्यप्रदेश के सेंधवा में 5 से ज्यादा मामले दर्ज हैं, फखरू के खिलाफ 2 और रऊफ के खिलाफ 4 से अधिक मामले दर्ज हैं.

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