असम में फिर अफ्स्पा लागू

लेख समाचार

अजय भट्टाचार्य
विवादास्पद
सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (अफ्स्पा), 1958 को लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में खास बेचैनी रहती है। मणिपुर चुनावों का एक मुद्दा अफ्स्पा के निरस्तीकरण का भी रहा है और भाजपा समेत कमोबेस हर पार्टी या गठबंधन ने राज्य में अफ्स्पा कानून हटाने की बात कही। असम चुनाव में भी यही मुद्दा था और भाजपा कहती थी कि असम में अफ्स्पा खत्म कर देंगे। इस कानून के विरोध कि वजह यह है कि इसके तहत सुरक्षा बलों को जो विशेषाधिकार मिले है, कभी-कभी वे मानवाधिकारों पर भी हमला कर देते हैं। यह अधिनियम सुरक्षा बलों को कहीं भी अभियान चलाने और बिना किसी पूर्व वारंट के किसी को भी गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। यह एक ऑपरेशन के गलत होने की स्थिति में सुरक्षा बलों को एक निश्चित स्तर की प्रतिरक्षा भी देता है। कहने को तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सुरक्षाबलों को और इस अधिनियम के जरिये अधिक अधिकार संपन्न बनाया गया मगर दूसरी ओर इस अधिनियम की आड़ में जो ज्यादतियां हुई हैं वे किसी से छिपी नहीं हैं। यह कानून तब और परेशान करने वाला हो सकता है जब सत्ता के विरोध को ही देशद्रोह मानने की परंपरा शुरू की जा चुकी हो।

ताजा खबर यह है कि असम में विवादास्पद सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 को 28 फरवरी से छह महीने के लिए और बढ़ा दिया गया है। असम सरकार की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि, “पिछले छह महीनों में असम में कानून और व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा करने के बाद, राज्य सरकार ने पूरे असम राज्य को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित किया है। 28/02/2022 से 6 (छह) महीने तक, जब तक कि पहले वापस नहीं लिया जाता।”
सरकार ने पिछले साल 28 अगस्त से राज्य के “अशांत क्षेत्र” की स्थिति को और छह महीने के लिए बढ़ा दिया था, जिससे अफस्पा जारी रहा। नवंबर 1990 में असम में अफ्स्पा लगाया गया था और तब से राज्य सरकार द्वारा समीक्षा के बाद इसे हर छह महीने में बढ़ाया गया है।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इसी एक जनवरी को कहा था कि पांच-छह जिलों को छोड़कर, असम से सेना को वस्तुतः वापस ले लिया गया था और जब अफस्पा का नवीनीकरण होगा, तो राज्य सरकार “कुछ व्यावहारिक निर्णय” लेगी। जहां तक अफस्पा का सवाल है, असम 2022 में कुछ युक्तिसंगत होगा… हम कैसे और कब नहीं जानते। लेकिन मैं एक आशावादी व्यक्ति हूं। हम 2022 को आशा के वर्ष के रूप में देख रहे हैं। अफ्स्पा के संबंध में कुछ सकारात्मक क्षण होंगे। नागरिक समाज समूह और अधिकार कार्यकर्ता सशस्त्र बलों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन का दावा करते हुए उत्तर पूर्व से “कठोर कानून” को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
पिछले साल 4 दिसंबर को नागालैंड के मोन जिले में एक असफल उग्रवाद-विरोधी अभियान और जवाबी हिंसा में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 14 नागरिकों की मौत के बाद अधिनियम को निरस्त करने की मांग ने नए सिरे से गति पकड़ी थी। अब केंद्र के बडबोले नेताओं के बयानों पर भी गौर करिये जो चुनाव अभियान के दौरान दागे गये। उत्तर प्रदेश में तो युक्रेन-रूस युद्ध की आड़ में देश में एक ‘मजबूत सरकार’ का राग छेड़ा गया था। संयोग से असम में भी डबल इंजन की सरकार है और 56 इंच के सीने की गर्वोक्ति वाली सरकार पिछले सात साल से असम को अशांत क्षेत्र के दर्जे से बाहर नहीं निकाल पाई। उस पर तुर्रा यह है कि यह नया भारत है। असम सरकार की अधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति डबल इंजन के दावों की हवा निकाल रही है।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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