आखिर इस्लाम पूरी दुनिया में इतनी तेजी से क्यों फैला , जानिए पैगंबर की रणनीति और नज़रिया

इस्लाम के पन्ने से

मदनी दौर ( मदीना ) में इस्लाम के काम को तीन मरहलों में बांटा जा सकता है। पहला मरहला इस्लामी समाज की बुनियाद रखने का मरहला , जिसमें फ़ित्ने पैदा किए गए परेशानियां बढ़ाई गई , अन्दर से रुकावटें खड़ी की गईं और बाहर से दुश्मनों ने मदीना को नेस्त व नाबूद करने के लिए चढ़ाइयां की । यह मरहला मुसलमानों के ग़लबे और स्थिति पर काबू पाने के साथ ही हुदैबिया समझौते पर ( ज़ीकादा सन् 06 हि ० ) ख़त्म हो जाता है। दूसरा मरहला जिसमे मक्का विजय रमज़ान सन् 08 हिजरी पर खत्म होता है । तीसरा मरहला जिसमें मदीने में क़ौमों और क़बीलों के प्रतिनिधिमंडलों के आने का मरहला है । यह मरहला अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मुबारक ज़िंदगी के आखिर तक यानी रबीउल अव्वल सन् 11 हिजरी तक फैला हुआ है ।

लड़ाई की इजाजत मिलने के बाद पहले मरहले में क़ुरैश को युद्ध का आरंभ करने वाला समझा गया , क्योंकि उन्होंने ज़ुल्म की शुरुआत की थी , इसलिए मुसलमानों का हक़ पहुंचता था कि उनसे लड़ें और उनके माल ज़ब्त कर लें , लेकिन अरब के दूसरे मुशरिकों के साथ यह बात सही न थी । दूसरे मरहला में ग़ैर – क़ुरैश में से हर वह फ़रीक़ जिसने कुरैश का साथ दिया और उससे हाथ मिलाया या जिसने स्वतः मुसलमानों पर ज़ुल्म किया , उनसे लड़ना । तीसरे मरहले में जिन यहूदियों के साथ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अहद व पैमान था , मगर उन्होंने खियानत की और मुशरिकों का साथ दिया , ऐसे यहूदियों के अहद व पैमान को उनके मुंह पर दे मारकर उनसे लड़ाई लड़ी जाए जाए।और चौथे मरहले में अहले किताब , जैसे ईसाइयों में से , जिन्होंने मुसलमानों के साथ दुश्मनी की शुरुआत की और मुक़ाबले में आ गए , उनसे लड़ा जाए । पांचवें मरहले में जो इस्लाम में दाखिल हो जाए उससे हाथ रोक लेना , भले ही वह मुशरिक रहा हो , या यहूदी या ईसाई या कुछ और ।

बद्र की लड़ाई मुसलमानों और मुशरिकों का सबसे पहला सशस्त्र टकराव और निर्णायक लड़ाई थी , जिसमें मुसलमानों को खुली जीत मिली और उसे सारे अरब ने देखा । इस लड़ाई के नतीजों को सबसे ज़्यादा उन्हीं लोगों को भुगतना पड़ा था . जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से यह हानि सहनी पड़ी , यानी मुशरिक या उन लोगों को जो मुसलमानों के ग़लबा और सरबुलन्दी को अपने धार्मिक और आर्थिक अस्तित्व के लिए खतरा महसूस करते थे , यानी यहूदी । चुनांचे जब से मुसलमानों ने बद्र की लड़ाई जीती थी , ये दोनों गिरोह मुसलमानों के खिलाफ़ ग़म – गुस्सा , दुख – अफ़सोस से जल – भुन रहे थे , जैसा कि इर्शाद है ” तुम ईमान वालों का सबसे बड़ा दुश्मन यहूदियों को पाओगे और मुशरिकों को । ‘ ( 5:82 ) मदीने में कुछ लोग इन दोनों गिरोहों की हां में हां मिलाने वाले और साथ देने वाले मौजूद थे । उन्होंने जब देखा कि अपनी प्रतिष्ठा बाक़ी रखने का अब कोई रास्ता बाक़ी नहीं रह गया है , तो ऊपरी तौर पर इस्लाम में दाखिल हो गए । ” यह अब्दुल्लाह बिन उबई और उसके साथियों का गिरोह था । यह भी मुसलमानों के खिलाफ़ यहूदियों और मुशरिकों से कम ग़म व गुस्सा न रखता था । इनके अलावा एक चौथा गिरोह भी था । यानी वे बद्दू जो मदीना के बाहरी हिस्से में रहते – सहते थे , उन्हें कुफ्र व इस्लाम से कोई दिलचस्पी न थी , लेकिन ये लुटेरे और डाकू थे , इसलिए बद्र की कामयाबी से इन्हें भी दुख और बेचैनी थी । इन्हें खतरा था कि मदीने में एक ताक़तवर हुकूमत क़ायम हो गई , तो इनकी लूट – खसूट का रास्ता बन्द हो जाएगा , इसलिए इनके दिलों में भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ कीना जाग उठा और ये भी मुसलमानों के दुश्मन हो गए।

जंगे उहुद के अंजाम के बारे में बड़ी लम्बी – चौड़ी बहसें की गई हैं कि क्या इसे मुसलमानों की हार माना जाए या नहीं ? जहां तक तथ्यों का ताल्लुक़ है , तो इसमें शक नहीं कि लड़ाई के दूसरे राउंड में मुशरिकों को श्रेष्ठता प्राप्त थी और लड़ाई का मैदान उन्हीं के हाथ में था । नुक़सान भी मुसलमानों का ही ज़्यादा हुआ और बड़े भयानक रूप में हुआ । मुसलमानों का एक गिरोह तो यक़ीनन हार खा कर भागा । लेकिन मैदान छोड़कर चले जाने से मुशरिकों को जीत का दर्जा हासिल नहीं हो सका। इसके साथ जंगे खंदक , जंगे खैबर समेत हुदैबिया समझौता मुसलमानों के पक्ष में रहे।

इसके बाद मक्का फतह मुसलमानों की ऐसी जीत थी जिसकी न कोई मिसाल पहले से थी और न कयामत तक मुमकिन है। हर विजेता युद्ध में अपने विरोधियों से बदला जरूर लेता है लेकिन नबी हज़रत मोहम्मद स० ने उस दिन उस जंग में आम माफी का ऐलान कर दिया जिससे लोगों का कोई जानी माली नुकसान नहीं हुआ। और फैसले के कारण ज्यादातर मक्केवासी इस्लाम में दाखिल हो गए।

मक्का की विजय के बारे में इमाम इब्ने क़य्यिम लिखते हैं कि यह वह महान विजय है जिसके ज़रिए अल्लाह ने अपने दीन को , अपने रसूल को अपनी सेना को और अपने अमानतदार गिरोह को सम्मान दिया और अपने शहर को अपने घर को , जिसे दुनिया वालों के लिए हिदायत का ज़रिया बनाया , कुफ़्फ़ार और मुश्रिक के हाथों से छुटकारा दिलाया । इस विजय से आसमान वालों में खुशी की लहर दौड़ गई , इसकी वजह से लोग अल्लाह के दीन में जत्था के जत्था दाखिल हुए और धरती का चेहरा रोशनी और चमक – दमक से जगमगा उठा ।

नबी सल्ल ० की जंगों और फ़ौजी मुहिमों पर एक नज़र डालने के बाद कोई भी व्यक्ति जो लड़ाई के माहौल , पृष्ठभूमि , और नतीजों का ज्ञान रखता हो , यह स्वीकार किए बिना नहीं रह सकता कि नबी सल्ल ० दुनिया के सबसे बड़े और कमाल वाले फ़ौजी कमांडर थे । आपकी सूझ – बूझ सबसे ज़्यादा दुरुस्त और आपकी समझ सबसे ज़्यादा गहरी थी ।

आप जिस तरह नुबूवत व रिसालत के गुणों की दृष्टि से रसूलों के सरदार और नबियों में बड़े थे , उसी तरह फ़ौजी नेतृत्व के गुणों में भी आप अद्वितीय और अपूर्व थे । चुनांचे आपने जो भी लड़ाई लड़ी , उसके लिए ऐसी परिस्थितियों को चुना जो सूझ – बूझ , विवेक और वीरता के ठीक अनुसार थीं । किसी लड़ाई में विवेक , फ़ौज की तर्तीब और भावुक केन्द्रों पर उसकी तैनाती , लड़ाई के सबसे ज़्यादा उचित जगह के चुनाव और जंगी प्लानिंग वगैरह में आपसे कभी कोई चूक नहीं हुई और इसीलिए इस बुनियाद पर आपको कोई परेशानी नहीं उठानी पड़ी , बल्कि तमाम जंगी मामलों और मसलों के सिलसिले में आपने अपने अमली क़दमों से साबित कर दिया कि दुनिया , अपने बड़े – बड़े कमांडरों के ताल्लुक़ से जिस तरह के नेतृत्व का ज्ञान रखती है , आप इससे बहुत कुछ भिन्न एक निराली ही क़िस्म की कमांडराना क्षमता के मालिक थे , जिसके साथ हार का कोई सवाल ही न था ।

इस मौक़े पर यह अर्ज़ कर देना भी ज़रूरी है कि उहुद और हुनैन में जो कुछ पेश आया , उसकी वजह अल्लाह के रसूल सल्ल ० की स्ट्रेटजी की कोई खराबी व्यक्तियों की कुछ कमजोरियां न थी , बल्कि उसके पीछे हुनैन और उहुद में आपकी बड़ी महत्वपूर्ण रणनीति और अनिवार्य हिदायतों को बड़े ही निर्णायक क्षणों में नज़रंदाज़ कर दिया गया था । फिर इन दोनों लड़ाइयों में जब मुसलमानों के परेशान होने की नौबत आई तो आपने जिस बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया , वह भी अपूर्व था । आप दुश्मन मुक़ाबले में डटे रहे और अपनी अनुपम रणनीति से उसे या तो उसके मक़सद में नाकाम बना दिया , जैसा कि उहुद में हुआ , या लड़ाई का पांसा इस तरह पलट दिया कि मुसलमानों की हार जीत में बदल गई , जैसा कि हुनैन में हुआ ।

बाक़ी रहे दूसरे पहलू , तो वे भी बड़े महत्वपूर्ण हैं । आपने इन ग़ज़वों के ज़रिए अम्न व अमान कायम किया , फ़ितने की आग बुझाई , इस्लाम और बुतपरस्ती के संघर्ष में शत्रु का दबदबा और उसकी शान तोड़कर रख दिया और उन्हें इस्लामी दावत व तब्लीग़ की राह आज़ाद छोड़ने और समझौता करने पर मजबूर किया ।

इस तरह आपने इन लड़ाइयों की वजह से यह भी मालूम कर लिया कि आपका साथ देनेवालों में कौन से लोग निष्ठावान हैं और कौन से लोग मुनाफ़िक़ ( कपटाचारी ) , जो मन के भीतर धोखादेही , और बेईमानी की भावनाएं छिपाए हुए हैं ? फिर आपने मोर्चाबन्दी के व्यावहारिक आदर्शों के ज़रिए मुसलमान कमांडरों की एक ज़बरदस्त जमाअत भी तैयार कर दी , जिन्होंने आपके बाद इराक़ और शाम के मैदानों में फ़ारस और रूम से टक्कर ली और जंगी प्लानिंग और तकनीक में उनके बड़े – बड़े कमांडरों को मात देकर उन्हें उनके मकान और भूभाग में , मालों और बाग़ों से , चश्मों और खेतों से , आरामदेह और इज़्ज़तदार जगहों से और मज़ेदार नेमतों से निकाल बाहर किया ।

इसी तरह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन ग़ज़वों की वजह से मुसलमानों के लिए रिहाइश , खेती , पेशे और काम का इन्तिज़ाम फ़रमाया । बेघर और मुहताज पनाह लेनेवालों के मसले हल फ़रमाए । हथियार , घोड़े , साज़ व सामान और लड़ाई के खर्च जुटाए और वह सब कुछ अल्लाह के बन्दों पर ज़र्रा बराबर जुल्म व ज़्यादती और जौर व जफ़ा के बिना हासिल किया । आपने इन कारणों और उद्देश्यों को भी तब्दील कर डाला , जिनके लिए जाहिलियत के दौर में लड़ाई के शोले भड़का करते थे , यानी जाहिलियत के ज़माने में लड़ाई नाम थी लूट – मार , क़त्ल और ग़ारतगरी का , ज़ुल्म व ज़्यादती और बदला लेने और हिंसा करने का , कमज़ोरों को कुचलने , आबादियां वीरान करने और इमारतें ढाने का , औरतों की बेइज्जती करने और बूढ़ों – बच्चों और बच्चियों के साथ पत्थर दिल से पेश आने का , खेती – बाड़ी और जानवरों को हलाक करने और ज़मीन में तबाही और फ़साद मचाने का , मगर इस्लाम ने इस लड़ाई की रूह को बदलकर उसे एक पवित्र जिहाद में बदल दिया , जिसे बहुत मुनासिब और उचित कारणों के तहत शुरू किया जाता है और उसके ज़रिए ऐसे मानवतापूर्ण उद्देश्य और ऊंचे मक्सदों को हासिल किया जाता है , जिन्हें हर ज़माने में लूट का माल मुरदार से ज्यादा हलाल नहीं ।

इसी तरह आपने खेती – बाड़ी तबाह करने , जानवर हलाक करने और पेड़ काटने से मना फ़रमाया , सिवा इस शक्ल के कि उसकी सख्त ज़रूरत आ पड़े और पेड़ काटे बिना कोई रास्ता न हो । मक्का विजय के मौके पर आपने यह भी फ़रमाया , किसी घायल पर हमला न करो , किसी भागने वाले का पीछा न करो और किसी क़ैदी को क़त्ल न करो । आपने यह चलन भी चलाया कि दूत की हत्या न की जाए । साथ ही आपने ग़ैर – मुस्लिम नागरिकों के क़त्ल से भी बड़ी कड़ाई से रोका , यहां तक कि फ़रमाया कि जो व्यक्ति किसी गैर – मुस्लिम को क़त्ल करेगा , वह जन्नत की खुशबू नहीं पाएगा , हालांकि उसकी खुशबू चालीस साल की दूरी से पाई जाती है । ये और इस तरह के दूसरे ऊंचे दर्जे के नियम व विधान थे जिनके कारण लड़ाई का काम जाहिलियत की गन्दगियों से पाक व साफ़ होकर पवित्र जिहाद में बदल गया ।

अल्लाह के रसूल सल्ल ० की पैग़म्बराना जिंदगी का आखिरी मरहला है जो आपकी इस्लामी दावत के उन नतीजों की नुमाइन्दगी करता है जिन्हें आपने लगभग 23 साल की लम्बी जद्दोजेहद , कठिनाइयों , परेशानियों , हंगामों और फ़ितनों , दंगों और जंगों और ख़ूनी लड़ाइयों के बाद प्राप्त किया था । इस लम्बी मुद्दत में मक्का विजय सबसे महत्वपूर्ण सफल थी , जो मुसलमानों ने प्राप्त की । इसकी वजह से हालात का धारा बदल गया और अरब में क्रान्ति आ गई । यह विजय वास्तव में अपने पहले और बाद के दोनों युगों के बीच एक रेखा खींच देती है । चूंकि कुरैश , अरब वालों की नज़र में दीन की हिफ़ाज़त करने वाले और मददगार थे और पूरा अरब इस बारे में उनके आधीन था , इसलिए कुरैश के हथियार डालने का मतलब यह था कि पूरे अरब प्रायद्वीप में बुतपरस्ती वाले दीन का काम ख़त्म हो गया ।

प्रस्तुतकर्ता- रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब – अर- रहीकुल मख़तूम

लेखक- मौलाना सफ़ीउर रहमान मुबारकपुरी

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