Bihar News: सत्ता के हठयोगी का अभिवादनासन

राजनीति राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
बिहार
के मुख्यमंत्री का लखनऊ में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री शपथग्रहण समारोह में जाना और बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने नतमस्तक होना बिहार में चर्चा का विषय बना हुआ है। राजद ने तो बिहार कि सड़कों पर पोस्टरबाजी कर यह दिखाने की कोशिश की है कि तमाम सरकारी एजेंसियों के हमले होने के बावजूद राजद सुप्रीमो दिल्ली शाही के सामने नहीं झुके। यहाँ तक कि उन्हें जेल भी हो गई फिर भी उन्होंने कथित बिहारी स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया। जबकि वर्षों पुराने हत्या के एक मुकदमे की केन्द्रीय एजेंसी से जाँच की धमकी भर से नीतीश कुमार झुकने की सभी हदें पार कर गये हैं। सबसे ज्यादा ऐतराज इस बात को लेकर है कि किसी समय जिस व्यक्ति को नीतीश के बराबर बैठने तक की इजाजत नहीं मिलती थी आज नीतीश उसी के सामने झुक गये। कभी सार्वजनिक मंच से नीतीश कुमार ने घोषणा की थी कि -“मिट्टी में मिल जाऊँगा,भाजपा में नहीं जाऊँगा।” अब इसी को आधार बनाकर विपक्ष नीतीश पर हमलावर है। इस बीच विभेश त्रिवेदी का एक व्यंग्य सोशल मीडिया पर चस्पां हुआ जिसे लोगों ने जमकर वायरल कर दिया।
लखनऊ में राजतिलक के मंच पर चाचा कमर के बल क्या झुके, उनके डीएनए पर सवाल उठाया जा रहा है। पत्रकारों की क्या मजाल, सोशल मीडिया वाले हाय-तौबा मचा रखे हैं। कोई कह रहा है कि डीएनए में गड़बड़ी की वजह से चाचा जरूरत से कहीं ज्यादा झुक गए। कोई कह रहा है कि उम्र का तकाजा है। चाचा अभिनय नहीं कर रहे, इस उम्र में नहीं चाहते हुए भी झुकना पड़ता है। अपना मानना है कि यह सब योगा का कमाल है।
चाचा का योग बाबा के योग से अलग है। बाबा तो सुस्ती दूर करने और सेहत में सुधार के लिए तरह-तरह के योगासन कराते हैं। उससे इतर हमारे चाचा सत्ता के हठयोगी हैं। हठयोगी भी एक तरह के संन्यासी होते हैं। कसमों-वादों जैसी सांसारिकता से ऊपर की चीज होते हैं। अपने किसी प्रण के पीछे लकीर के फकीर बने नहीं फिरते हैं। हठयोगी मिट्टी में मिल जाना पसंद करते हैं, लेकिन किसी के सामने झुकते नहीं हैं। हां, वक्त और हालात का तकाजा समझते हुए झुकने की एक्टिंग करते हैं। बस सामने वाले योगी को भ्रम होता है कि हठयोगी उनके सामने झुक रहा है, लेकिन चाचा सब के सामने नतमस्तक नहीं होते हैं।
वे सिर्फ उनके सामने झुकते हैं, जिनसे आंखें मिलाने की हैसियत नहीं रही। वैसे हठयोगी किसी के नहीं हो सकते। ऐसा कोई सगा नहीं, जिसे चाचा ने ठगा नहीं। आने वाला वक्त एक बार फिर गवाही देगा कि हठयोगी पत्ता बिछाकर उठाना जानते हैं। भरोसा रखिये कि हठयोगी दाढ़ी वाले साधु के सामने झुकने का अभिनय करते हुए एक बार फिर गच्चा देंगे। राजनीति में मान-सम्मान और स्वाभिमान जैसी फालतू चीजों के लिए जगह नहीं होती है। आप झुकना सीख गए तो अधिक दिनों तक सत्ता के शिखर पर चिपके रह सकते हैं। उनके लिए कुर्सी अजर-अमर हो जाती है। अकरब मरे न छुतहर फूटे। सत्ता की हांडी फूटने का नाम नहीं लेती है।
लखनऊ में बिहारी कमर इस तरह झुक गई कि दिल बाग-बाग हो गया। बिहार के लोग भाग्यशाली हैं। उन्होंने लखनऊ के मंच पर बिहारी स्वाभिमान को मिट्टी में मिलते देखने का सुख पाया है। राष्ट्रपति की कुर्सी मिले न मिले, हमें राष्ट्रवाद की बेदी पर झुकने से कौन रोक सकता है। वह तो एक परम वैभव का क्षण था। हमारे चाचा के हृदय में एक गीत तरंगित हो उठा-तेरी मिट्टी में मिल जावां/गुल बनके मैं खिल जावां/इतनी सी है दिल की आरजू!
इस राज पर पर्दा डाले रखिए। किसी को कानो कान खबर नहीं होनी चाहिए कि हठयोगी रंग बदलने में गिरगिट के भी नाना है। उनकी माया अपरम्पार है। कोई माई का लाल भविष्यवाणी नहीं कर सकता है कि हठयोगी कब किसके सामने से भोज का पत्ता उठा लेंगे और कब किसके कदमों में पलकें बिछा देंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published.