Bihar: पेट के दांत ने काट दी आंत

राजनीति समाचार

अजय भट्टाचार्य
लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार को लेकर कहा था कि “उनके (नीतीश के) दांत पेट में हैं।“ मतलब नीतीश कब कौन सी चाल चलें पता नहीं लगने देते। बीते एक हफ्ते में जिस तेजी से बिहार की राजनीति बदली, भाजपा को पता ही नहीं चला कि खेल कब, कहां और कैसे तय हुआ। यह अलग बात है कि भाजपा ने अपनी तरफ से नीतीश का नंबर खेल बिगाड़ने की पूरी कोशिश की मगर नीतीश ने समय ही नहीं दिया कि भाजपा का खेमा कुछ कर सके।
जब जद (यू) और राजद ने सोमवार को अपना पहला कदम उठाया, तब केवल 24 घंटों के भीतर ही विधानसभाध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा कोविड-पॉजिटिव से कोरोना-निगेटिव हो गये, क्योंकि सत्ता का पासा लुढ़क गया था। आनन-फानन में कोविड से ठीक होने के बाद सोमवार की रात सिन्हा जिन लोगो से सबसे पहले मिले वे भाजपा नेता राम नारायण मंडल की अध्यक्षता वाली विधानसभा की आचार समिति के सदस्य थे। इस मुलाकात का ब्यौरा देने से मंडल ने इनकार कर दिया लेकिन भीतरखाने की खबर यह है कि मार्च 2021 में जब राजद विधायकों ने अध्यक्ष को “बंधक” बना लिया था और विधानसभा में पुलिस बुलानी पड़ी थी, उससे संबंधित रिपोर्ट मंडल ने सिन्हा को दी। रिपोर्ट में 18 विधायकों के बारे में संकेत दिया गया था। प्रक्रिया के अनुसार इन विधायकों को अध्यक्ष की सलाह पर एक नोटिस दिया जाना था, जो आगे की कार्रवाई में इन विधायकों की अयोग्यता का आदेश भी दे सकते थे। 79 विधायकों के साथ राजद विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है। संख्या में कोई भी बदलाव, निश्चित रूप से उन नतीजों पर पड़ता जिन पर सत्ता टिकती। 23 मार्च, 2021 को जब विधानसभा ने विशेष सशस्त्र पुलिस अधिनियम पारित किया था, जिसमें विपक्षी विधायकों के विरोध के बीच पुलिस को बिना वारंट के लोगों की तलाशी लेने और गिरफ्तारी करने का अधिकार दिया गया था। राजद विधायक अध्यक्ष की कुर्सी पर पहुंचे, कागज फाड़े और उनके कक्ष को घेर लिया। विरोध करने वाले विधायकों को हटाने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी, उनमें से कई को खींचकर स्ट्रेचर पर ले जाया गया था। मंडल की रिपोर्ट पर सिन्हा को मंगलवार को कार्यवाही शुरू करनी थी मगर उससे पहले ही नीतीश ने राजग से अलग होने का ऐलान कर दिया। नतीजा यह रहा कि सिन्हा राजद विधायकों को भेजे जाने वाले नोटिस थामे टापते रह गये। अब चूँकि नई सरकार बन चुकी है और अध्यक्ष की कुर्सी भी सिन्हा के नीचे से खिसक चुकी है। लिहाजा मंडल की रिपोर्ट का बंडल बंद हो गया है।
जहां तक बिहार की सियासत की बात है तो पिछले दो दशक से वहां त्रिकोणीय राजनीति चलती है। जो दो कोण साथ होते हैं वे सत्ता में आते हैं। इसका एक परिणाम यह भी देखने को मिलता है कि तीसरे का वजूद ही खतरे में पड़ जाता है। बिहार की राजनीति जदयू, राजद और भाजपा के इर्द-गिर्द ही घूमती है। सत्ता में काबिज होने के लिए दो को हाथ मिलाना ही पड़ता है। अब जदयू और राजद का साथ आना निश्चित ही भाजपा को कमजोर करेगा। शह और मात के इस खेल में भाजपा ने खूब चालें चलीं लेकिन उसके मोहरे नीतीश कुमार के सामने चल नहीं पाए। उसके दो–दो उपमुख्यमंत्री तथा संजय जायसवाल व नित्यानंद राय जैसे नेता नीतीश कुमार के सामने टिक नहीं पाये। इसके बाद नीतीश कुमार की पार्टी से ही पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को भाजपा बिहार का एकनाथ शिंदे बनाना चाहती थी। यह चाल बिहार भाजपा के ताबूत में आखिरी कील साबित हुई। नीतीश कुमार को यह एहसास हो गया कि महाराष्ट्र के बाद भाजपा बिहार में पूरी झोंकेगी तो उनका पेट का दांत काम कर गया। राजग की आंत ही काट दी।

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