बिट्टा कराटे फाइल्स फिर खुलेंगी !

लेख समाचार

अजय भट्टाचार्य
फारूक अहमद डार उर्फ़ बिट्टा कराटे की फाइल फिर खुल गई है। जम्मू कश्मीर में हत्याओं के आरोपी रहे बिट्टा कराटे पर दर्ज केस को फिर से खोलने की याचिका पर कल यानी बुधवार को जम्मू कश्मीर कोर्ट में सुनवाई हुई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पीड़ित सतीश टिक्कू के परिवार से याचिका की हार्ड कॉपी कोर्ट में जमा करने को कहा है। अब इस मामले में 16 अप्रैल को दोबारा सुनवाई होगी। इन दिनों वः जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का मुखिया है।

बिट्टा कराटे पर 90 के दशक में अपने दोस्त टिक्कू सहित कई कश्‍मीरी पंडितों की हत्या का आरोप है। हत्याकांड के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया था, लंबे समय तक वो जेल में बंद था। 2006 में उसे जमानत पर रिहा किया गया था। कराटे का जानकार होने के कारण लोग उसके नाम के आगे कराटे लगाने लगे थे। 1987-1988 में नियन्त्रण रेखा पार करके वह पाकिस्तान पहुंचा था। वहां उसने 32 दिन तक पाकिस्तान की सेना से ट्रेनिंग ली और पोस्टर बॉय बनकर वापिस हिंदुस्तान आया। यह वह समय था जब पाकिस्तान ने कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए कश्मीरी मुस्लिम युवाओं को गुमराह करना शुरू किया। कश्मीर की आजादी की जंग के नाम पर उनके हाथों में हथियार थमा दिए। बिट्टा और उसके साथ पाकिस्तान जाकर ट्रेनिंग लेने वाले कश्मीरी युवकों का ये पहला जत्था था।
90 के दशक में विट्टा कराटे पर कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या का आरोप लगा था। उस पर आरोप है कि, 31 साल पहले उसने सतीश टिक्कू की हत्या की, उसके बाद उसने कई और कश्‍मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया था। एक टीवी कार्यक्रम में उसने खुद हत्या की बात कबूली थी। उस पर 19 से ज्यादा मामलों दर्ज किए गए थे।
2006 में जमानत पर रिहा होने के बाद 2008 में अमरनाथ विवाद के दौरान भी वह चर्चा में आया था और तब उसे गिरफ्तार कर लिया गया था।हाल में ही बनी फिल्म कश्मीर फाइल के बाद से बिट्टा कराटे एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। जम्मू-कश्मीर हत्याकांड के 31 साल बाद सतीश टिक्‍कू के परिवार ने सोशल एक्‍ट‍िविस्‍ट विकास राणा के सहयोग से बिट्टा कराटे के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
23 अक्टूबर 2006 को, जम्मू में आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (टाडा) को लागू करने वाली एक अदालत ने डार को जमानत दे दी और 25 अक्टूबर 2006 को उसे उसके परिवार को सौंप दिया गया। उसे शुरू में चार महीने के लिए जमानत बांड और 1 लाख की व्यक्तिगत बांड पर जमानत दी गई थी। डार 16 साल जेल में बिताने के बाद रिहा हुआ था। सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत उनकी नजरबंदी को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जेल से रिहा होने से पहले रद्द कर दिया था। उनकी रिहाई की कई कश्मीरी पंडित संगठनों ने निंदा की थी। डार का कश्मीर में उनके समर्थकों ने गर्मजोशी से स्वागत किया। उनके घर पर बड़ी संख्या में समर्थक जमा हो गए जहां उन पर फूलों की पंखुड़ियां और कंफ़ेद्दी बरसाई गईं। फिर, डार को एक जुलूस में निकाल कर ईदगाह ले जाया गया जहां नमाज अदा की गई। डार की जमानत पर फैसला सुनाते हुए, टाडा अदालत के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति वानी की टिप्पणी गौर करने लायक थी/है- अदालत इस तथ्य से अवगत है कि अभियुक्तों के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और इसमें मौत की सजा या आजीवन कारावास की सजा है, लेकिन तथ्य यह है कि अभियोजन पक्ष ने मामले में बहस करने में पूरी तरह से उदासीनता दिखाई है। इधर 2019 में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने उसे आतंकवादी धनशोधन के मामले में फिर गिरफ्तार के सीखंचों के पीछे डाल दिया। इस मामले में एनआईए ने बिट्टा के साथी और हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद सलाहुद्दीन को भी आरोपी बनाया है।

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