Bulldozer Politics: सरकारी सनक का बुलडोजर मॉडल

फीचर राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
जब
बुलडोजर को कानून का समानांतर दर्जा देने की कोशिशें हों तब लंगड़े-लूले, अस्पताल में भर्ती और जेल में बंद लोग भी पत्थरबाजी कर सकते हैं। मध्यप्रदेश के खरगौन से लेकर दिल्ली की जहांगीरपुरी तक किरदार भले अलग हों पर बुलडोजर समान रूप से विद्यमान है। हद तो यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत के स्थगन आदेश के बावजूद दिल्ली में बुलडोजर ब्रांड कानून काम करता रहा।
हिंसाग्रस्त जहांगीरपुरी में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद चल रहे बुलडोज़र आखिरकार थम गए. बता दें कि
हिंसा के बाद सामान्य होते हालात के बीच कल यानि बुधवार को उत्तरी दिल्ली नगर निगम की तरफ से जहांगीरपुरी में अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया जाने वाला था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। इसके बावजूद जहांगीरपुरी में कुछ देर के लिए बुलडोज़र चले। बाद में दिल्ली नगर निगम ने तोड़फोड़ की कार्रवाई बन्द कर दी। अब मलबे को हटाने का काम जारी है। दिल्ली पुलिस को सुप्रीम कोर्ट का आदेश मिलने के बाद कार्रवाई रोक दी गई।
लेकिन तब तक जहांगीरपुरी की मस्जिद के बाहर बना चबूतरा शहीद किया जा चुका था। बुलडोजर मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने स्थानीय निकाय के इस कदम को असंवैधानिक, अनैतिक और गैर कानूनी व मनमाना बताते हुए इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की थी। दवे के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी बुलडोजर नहीं रोका गया। ये पूरी तरह गलत बात है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की जानकारी एजेंसी को तुरंत देने के आदेश दिए थे। इधर दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने कहा है कि दंगाइयों ने शांतिपूर्ण चल रहे यात्रा पर पथराव किया, दिल्ली पुलिस पर गोली भी चलाई। दंगाइयों पर दिल्ली पुलिस ने तुरंत कारवाई की है। निगम के मेयर और कमिश्नर को पत्र लिखा था कि वहां अवैध निर्माण और कब्जे पर कारवाई होनी चाहिए। वहां आम आदमी पार्टी के विधायक और पार्षद हैं जिनका संरक्षण दंगाइयों को है।
देश भर में कई राज्यों में चलाए जा रहे बुलडोजर की कार्रवाई को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर शीघ्र सुनवाई के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश की अदालत में जिक्र किया। अब कोर्ट दोनों मामलों पर गुरुवार को सुनवाई करेगा।
दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के खरगोन में मुस्लिम घरों को तोड़े जाने की घटना में राज्य सरकार के उस दावे की धज्जियाँ उड़ा दी हैं जिसमें कहा गया/जा रहा था कि अनधिकृत निर्माणों पर ही कार्रवाई की गई। साकेत गोखले को आरटीआई के जवाब में मिले तथ्यों के अनुसार खरगोन में सरकार द्वारा “पत्थरबाजी के आरोपियों” के घर होने के आरोप में मुस्लिम घरों को तोड़े जाने की घटना में जिला मजिस्ट्रेट खरगोन ने बताया है कि, उनके कार्यालय द्वारा कोई ध्वस्तीकरण आदेश जारी नहीं किया गया था। डीएम का यह भी दावा है कि ध्वस्तीकरण अभियान केवल “अनधिकृत अतिक्रमण” के लिए था, जो कि सच नहीं है। सच तो यह है कि, खरगोन में घरों को भूमि राजस्व अधिनियम, 1959 के तहत ध्वस्त किया गया है। डीएम भू-राजस्व मामलों के प्रभारी अधिकारी होते हैं। यदि, डीएम ने यह आदेश जारी नहीं किये हैं तो फिर यह आदेश किसने जारी किया है? सूबे के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने दावा किया था कि कथित “पत्थरबाजी के आरोपियों” के घरों को ध्वस्त कर दिया गया है। अब डीएम, इस पर यू-टर्न ले रहे हैं और कहते हैं कि केवल “अनधिकृत घरों” को तोड़ा गया। लेकिन डीएम का यह भी दावा है कि जिला प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया गया था। मुस्लिम घरों का यह ध्वस्तीकरण, स्पष्ट रूप से अवैध और कानून के प्रविधानों के विपरीत किया गया कार्य था और सरकार अब, आलोचना और कानूनी रूप से घिरने के बाद, बकवास कर रही है और वह, स्पष्ट रूप से कानून के खिलाफ कार्रवाई करते हुए पाई गई है। अब साकेत इस मसले को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। ‘त्वरित न्याय’ का यह बुलडोजर मॉडल संबंधित सरकारों की सनक की उपज है, विधि सम्मत नहीं।

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