इतिहास दोहरा रही है द्रविड़ राजनीति

राजनीति राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
अपनी
स्वर्ण जयंती मनाने से तकरीबन तीन महीने पहले अखिल भारतीय अन्ना द्रमुक मुनेत्र कझगम (अद्रमुक) में वही इतिहास दोहराया गया है जो अद्रमुक की स्थापना के समय घटित हुआ था। द्रमुक मुनेत्र कझगम (द्रमुक) नेता व तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करूणानिधि ने एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) को निलंबित कर दिया। एमजीआर ख्यात अभिनेता थे जिसके बूते उन्होंने 17 अक्टूबर 1972 की अद्रमुक की स्थापना कर द्रविड़ राजनीति में दूसरे ध्रुव का आरंभ किया। पचास साल बाद एमजीआर की पार्टी में एक और निष्कासन देखने को मिला। जब ई पलानीस्वामी ने ओ पनीरसेल्वम को अलग किया तो सड़कों पर संघर्ष देखने को मिला। तमिलनाडु की राजनीति में पिछले पांच दशक से इन्हीं दोनों पार्टी के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही है।
अद्रमुक नेता ई पलानीस्वामी को अंतरिम सचिव बनाए जाने के बाद ओ पन्नीरसेल्वम को पार्टी के पद से हटा दिया गया । पन्नीरसेल्वम समर्थक जेसीडी प्रभाकर, आर वैथलिंगम और पीएच मनोज पांडियन को भी पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया है। बर्खास्तगी के बाद पन्नीरसेल्वम ने पलानीस्वामी को पार्टी से निकाल दिया। पन्नीरसेल्वम इस लड़ाई को अदालत तक ले जायेंगे। उनका दावा है कि वे पार्टी के डेढ़ करोड़ कैडर्स की तरफ से समन्वयक नियुक्त किए गए थे। पन्नीरसेल्वम समर्थकों ने पोस्टर लगाकर दावा किया कि उनके आदमी को अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जे जयललिता ने चुना था। जयललिता की मृत्यु के बाद महासचिव का पद समाप्त कर दिया गया था – पन्नीरसेल्वम को समन्वयक और पलनीस्वामी को संयुक्त समन्वयक नामित किया गया था। आरोप है कि पलानीस्वामी ने एक-एक कर अपने सभी विरोधियों को किनारे लगाना शुरू किया। द्रविड़ राजनीति के जानकार बताते हैं कि ये दो गुटों गौंडर थेवर की लड़ाई है। पलानीस्वामी गौंडर हैं और पनीरसेल्नम थेवर जाति से आते हैं। जयललिता की पकड़ पार्टी काडर पर इतनी मजबूत थी कि कभी भी गुटबाजी नहीं हो पाई। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद से ही ये विवाद खुलकर सामने आ गया। सत्ता में द्रमुक की वापसी और उसमें के अधिकांश मंत्रियों की पृष्ठभूमि अद्रमुक की है। कहा जा रहा है कि उन्ही की तरफ से इस भिड़ंत को हवा दी जा रही है। ताकी 2026 के चुनाव में अद्रमुक की फूट का फायदा स्टालिन की पार्टी को मिले और चुनाव में जीत हासिल हो। जयललिता की बदौलत पार्टी ने पहले 2011 फिर 2016 के चुनाव में जीत दर्ज की। लेकिन जयललिता के निधन के बाद से ही पार्टी में खींचतान लगातार देखने को मिली। कई सारे धड़े शशिकला, पनीरसेल्वम, पलानीस्वामी उत्पन्न हो गए। जिसकी वजह से विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी शिकस्त हुई। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को केवल एक सीट नसीब हुई। जिसकी सबसे बड़ी वजह अंदरूनी लड़ाई है। जिसे पार्टी के नेता खत्म करना चाहते हैं। अद्रमुक की इस सरफुटव्वल पर भाजपा फूंक फूंक कर कदम रख रही है और पन्नीरसेल्वम को अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है लेकिन पलानीस्वामी को भी नाराज नहीं करना चाहती है। जयललिता के निधन के बाद भाजपा ने पार्टी को एकजुट करने में कड़ी का काम किया। पन्नीरसेल्वम ने कहा भी था कि वे प्रधानमंत्री मोदी के कहने पर ही अगस्त 2016 में अपने गुट को पलानीस्वामी के धड़े में विलय को राजी हुए थे और राज्य में उप मुख्यमंत्री का पद भी स्वीकार किया था। मोदी ने हाल ही में ‘हिंदी थोपने’ पर चल रही बहस को खत्म करने की भी कोशिश की थी। माना जाता है कि कैडर भाजपा के साथ गठबंधन के खिलाफ हैं। अद्रमुक के संगठन सचिव सी पोन्नईयन ने हाल ही में भाजपा नीत केंद्र सरकार पर खुलेआम आरोप लगाए थे। फ़िलहाल अद्रमुक संकट का जल्द ही कोई अंत नहीं दिख रहा है।

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