गुलाम नबी (कितने) आजाद…..!

राजनीति समाचार

अजय भट्टाचार्य
कांग्रेस
के असंतुष्ट धड़े जी-23 के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने संकेत दिए हैं कि वे सक्रिय राजनीति से दूर होकर ‘समाजसेवा’ में जुटना चाहते हैं। राजनीति को असीमित संभावनाओं का खेल कहा जाता है। बीते दो साल से आजाद के सुर भले खुलकर कांग्रेस के खिलाफ न उठे हों मगर उनसे कांग्रेस का नुकसान ही हुआ है। बीते दिनों कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी से मुलाकात के बाद नेतृत्व पर सवाल न उठाने की कहकर एकबारगी लगा कि कम से कम सोनिया से उनके मतभेद नहीं हैं। इसके बाद अपने गृह राज्य में एक सभा में उन्होंने देश में बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर अफसोस जताया और धर्मनिरपेक्षता के सही अर्थ के बारे में बात की। उन्हों ने इस बात पर भी जोर दिया कि कश्मीर में उग्रवाद ने सभी के जीवन को समान रूप से नष्ट कर दिया है, चाहे वह कश्मीरी पंडित हों या कश्मीरी मुसलमान। आजाद के मुताबिक भारत में राजनीति इतनी बदसूरत हो गई है कि कभी-कभी संदेह करना पड़ता है कि हम इंसान हैं या नहीं।
महात्मा गांधी सबसे बड़े हिंदू और धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े अनुयायी थे, इसलिए जो कोई भी वास्तव में धर्म का पालन करता है वह वास्तव में धर्मनिरपेक्ष है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म के विवाद पर उन्होंने जोर देकर कहा कि हम सभी पहले इंसान हैं, हिंदू और मुसलमान बाद में। आतंकवाद ने जम्मू और कश्मीर में जीवन को नष्ट कर दिया है, जिसमें पाकिस्तान एक बड़ी भूमिका निभा रहा है। आतंकवादियों ने सुरक्षा कर्मियों और पुलिसवालों की हत्या की है। उनके घरों को तबाह कर दिया है। चाहे वह कश्मीरी पंडित हों या कश्मीरी मुसलमान, आतंकियों ने किसी को नहीं बख्सा है। 90 प्रतिशत बुराइयां उन राजनेताओं के कारण हैं जो लोगों को उनके वोट बैंक के लिए बांटते हैं, और उन्होंने संदेह व्यक्त किया कि क्या कोई राजनीतिक बदलाव ला सकता है। अगर गुलामनबी के भाषण का विश्लेषण करें तो उन्होंने कश्मीर फाइल्स नामक फिल्म की ‘वास्तविक’ कथा वस्तु को नकार दिया है और सही भी यही है कि कश्मीर में 1990 में हिंदुओं के पलायन का कारण पाक प्रायोजित आतंकवाद था, न कि कश्मीरी मुस्लिम। जबकि फिल्म का पूरा जोर इस बात पर है कि एक धर्म विशेष के लोग कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुए अत्याचार के लिए दोषी हैं। बहरहाल वापस गुलामनबी आजाद के ही बयान पर लौटते हैं जब उन्होंने नागरिक समाज से नेतृत्व करने और लोगों को अन्याय या उत्पीड़न के खिलाफ लामबंद करने के लिए कहा। आज़ाद ने कहा यह सुझाव देने से पहले कि समाज में बदलाव होना चाहिए। कभी-कभी मुझे लगता है, और यह कोई बड़ी बात नहीं है कि अचानक आपको पता चले कि मैं सेवानिवृत्त हो गया हूं और समाज सेवा करना शुरू कर दिया है। बस यह सेवानिवृत्ति अचानक होगी या ठोस जमीन बनाने के बाद? इस पर आजाद मौन हैं। जैसी कि मीडिया में खबरें हैं कि कश्मीर सहित कुछ मसलों पर केंद्र सरकार पर्दे के पीछे से आजाद को आगे कर काम कर रही है। केंद्र शासित प्रदेश घोषित होने के बाद वहां पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग उठ रही है। अलबत्ता अधिकांश कश्मीरी राजनीतिक दल विभाजन के ही खिलाफ हैं। आजाद जिस धुन में गा रहे हैं वह निकट भविष्य में उनके किसी राज्य के राजभवन तक पहुँचने की भूमिका लगती है ठीक वैसे ही आरिफ मोहम्मद खान केरल के राजभवन में बैठे हैं। पिछले कुछ समय से गुलाम नबी की जिस तरह केन्द्रीय सत्ता प्रतिष्ठान से नजदीकियां बढ़ी हैं उसके संकेत ही उन्हें सेवानिवृत्ति से समाजसेवा की ओर ले जाने का मार्ग बना रही हैं। राजभवन में बैठकर समाजसेवा ही तो होती हैं!

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