सियासत की हांडी में गोविंदा तड़का !

मुंबई लेख

अजय भट्टाचार्य
श्रीकृष्ण
जन्मोत्सव के पर्व दही-हांडी के बहाने मुंबई व महाराष्ट्र में नई सियासी हांडी पकाने में महाराष्ट्र की ईडी (एकनाथ शिंदे-देवेंद्र फड़णवीस) सरकार ने एक और चिंगारी फूंकी है। मुख्यमंत्री की दही हांडी को साहसिक खेल का दर्जा देने की घोषणा इस सियासी हांडी का तड़का है। इसे बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव के मद्देनजर उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना के आधार को कमजोर करने की कवायद समझा जा रहा है। दही हांडी को खेल का दर्जा दिए जाने से इसमें भाग लेने वाले ‘गोविंदा’ कोटे के तहत सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन कर पाएंगे। कार्यकर्ताओं और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने इस कदम की आलोचना की है जबकि राजनीतिक दलों ने इस पर चुप्पी साध रखी है। इस फैसले ने शिवसेना के ठाकरे गुट को असमंजस में डाल दिया है क्योंकि गोविंदा की टोली में मुख्य रूप से निम्न मध्यम वर्ग के मराठी भाषी युवा होते हैं और यह समुदाय पार्टी के समर्थन का पारंपरिक आधार रहा है। देश के सबसे अमीर नगर निगम मुंबई मनपा का आगामी चुनाव उद्धव ठाकरे नीत गुट के लिए ‘करो या मरो’ का मुकाबला होगा। शिवसेना कई वर्षों से मनपा में सत्ता में हैं। राजनीतिक जानकारों की नजर में गोविंदा किसी इलाके में अपना प्रभाव जमाने के लिए किसी भी राजनीतिक दल के लिए एक संपत्ति है। आर्थिक रूप से, किसी भी नेता या पार्टी के लिए उन्हें निधि देना कोई महंगा सौदा नहीं है। वे चुनाव के वक्त उनके काम आते हैं। लंबे समय से शिवसेना ने अपनी विश्वसनीयता बरकरार रखी है और इसलिए गली-कूचों की राजनीति में उसका वर्चस्व बरकरार है। गोविंदाओं की टोलियों और गणेश मंडलों के एक व्यापक नेटवर्क ने शिवसेना को मुंबई तथा ठाणे में अपना असर बनाए रखने में मदद की है। इसे देखते हुए मुख्यमंत्री शिंदे की गोविंदाओं को लुभाने की कोशिश ने उद्धव ठाकरे गुट के लिए खतरा पैदा कर दिया है। शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के मुंबई से एक विधायक ने कहा, ‘‘उन्हें चिकित्सा (बीमा) सुरक्षा मिल रही है और खेल कोटे के जरिए सरकारी नौकरियों का प्रलोभन भी उन्हें दिया जा रहा है।’’ उन्होंने कहा कि बीएमसी चुनावों के दौरान इसका असर पड़ेगा।
ठाकरे गुट के शिवसेना नेता सुनील प्रभु ने विधानसभा में शिंदे के फैसले की तारीफ की लेकिन साथ ही कहा कि लंबे समय से हमारी मांग रही है कि गोविंदा की टोलियों को चिकित्सकीय सुरक्षा दी जाए और दही हांडी को खेल के तौर पर मान्यता दी जाए। उधर भाजपा का कहना है कि भाजपा का मध्यम और उच्च मध्यम वर्गों में हमेशा मजबूत आधार रहा है लेकिन निम्न मध्यम वर्ग पर उसकी कोई खास पकड़ नहीं रही। निम्न आय समूह में आम तौर पर वे लोग शामिल होते हैं जिनके पास मुंबई में मकान नहीं है, जो छोटी-मोटी नौकरियां करते हैं और ज्यादा पढ़ाई भी नहीं करते हैं। ये लोग शिवसेना का आधार हैं। शिवसेना की नब्ज पहचानने वाले शिंदे का पाला बदलना भाजपा के लिए पूरा खेल बदलने वाला साबित होगा। दही हांडी घोषणा भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार मनपा चुनावों में मुकाबला शिवसेना बनाम सेना के बीच होगा। इससे निश्चित तौर पर पांरपरिक रूप से शिवसेना के साथ रहे मुंबई के गोविंदाओं की कई टोलियां पाला बदल सकती हैं। दूसरी तरफ इस घोषणा ने सरकारी नौकरियों के लिए महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं दे रहे अभ्यर्थियों को भी नाराज कर दिया है। इस बारे में भाजपा यह तो मानती है कि यह फैसला एमपीएससी अभ्यर्थियों के अनुकूल नहीं है। लेकिन पार्टी को इस बारे में फिक्र करने की जरूरत नहीं है। पहले ही बहुत कम सरकारी नौकरियां बची हैं और चयन प्रक्रिया मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि गोविंदाओं को कोई खास सुविधा मिलेगी। खेल कोटे में भी कड़ा मुकाबला होगा।

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