श्रीलंका क्रांति के नायक बनकर उभरे गुणरत्नम

दुनिया राजनीति

अजय भट्टाचार्य
श्रीलंका
की संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को अपना राष्ट्रपति चुन लिया है, जिसका विरोध हो रहा है। पिछले लंबे समय से श्रीलंका में चल रहे असंतोष का यह अल्प विराम मात्र है। मगर द्वीप राष्ट्र में स्थापित सत्ता के खिलाफ इतने बड़े जनांदोलन का ही नतीजा है कि गोटाबाया बाद में राष्ट्रपति बने और जनता ने देश का सबसे बुरा आर्थिक संकट देखा, और पिछले हफ्ते तात्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को इस्तीफे से पहले देश छोड़ कर भागना पड़ा। इस पूरे जनांदोलन का सबसे निर्णायक क्षण वह था जब श्रीलंका के आधिकारिक राष्ट्रपति आवास पर हजारों प्रदर्शनकारियों ने धावा बोला था जिनकी फैसले लेने में मदद प्रेमकुमार गुणरत्नम ने की। दरअसल गुणरत्नम एक ऐसा नाम है जिसे गोटाबाया चाहकर भी खत्म नहीं कर पाये थे। श्रीलंका के सुरक्षा बल उस समय गोटाबाया राजपक्षे के नियंत्रण में काम करते थे। तब सरकारी सेनाओं की तरफ से सिविल वॉर के आखिरी दिनों में किए गए अत्याचारों की हालांकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर खूब आलोचना हुई थी। श्रीलंका की सेना और अन्य एजेंसियों ने उन्हें अगवा किया था और वे गुणरत्नम को जान से मारना चाहते थे।

लेकिन एक मुस्कान के साथ गुणरत्नम कहते हैं कि यह निजी मामला नहीं है। स्थानीय मीडिया ने एक्टिवस्ट गुणरत्नम को “प्रदर्शनकारियों के एक प्रमुख” के तौर पर बताया है जिन्होंने नेतृत्व विहीन तौर से महीनों तक विरोध प्रदर्शन किए। आर्थिक संकट से उपजा और गुस्सा इसके कारण एक राजनैतिक क्रांति में परिवर्तित हुआ। इसके कारण श्रीलंका में उस राजनैतिक घराने का पतन हुआ जिसे देश में दशकों पुराने गृह युद्ध को खत्म करने के लिए प्रशंसा मिली थी। गुणरत्नम को कोलंबो के पास उनके घर से उठाकर एक सफेद वैन में ढूंस कर एक गुप्त स्थान पर ले जाया गया। जहां उन्हें नंगा बांधकर यातनाएं दी गईं। श्रीलंका के सुरक्षा बलों को आदेश देने वाले ने उन्हें मौत के लिए चुना था। उनके अपहरण का ज़िम्मेदार बाद में राष्ट्रपति बन गया लेकिन कार्यकर्ता ने इस नेता के पतन में अहम भूमिका निभाई है। सादे कपड़ों में बैठकर बिना नंबर वाली गाड़ियों ने दर्जनों असंतुष्टों, पत्रकारों और विरोधी नेताओं का 2012 में अपहरण किया गया। कईयों को फिर दोबारा नहीं देखा गया। गुणरत्नम अपनी एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने वाले थे। वे उन कुछ सौभाग्यशाली लोगों में थे था जिन्हें अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते चार दिन बाद अप्रत्याशित तौर से छोड़ा गया। राजपक्षे ने 2019 में स्थानीय मीडिया के सामने सफेद वैन में अपहरण के प्रचलन की बात मानी थी लेकिन साथ ही उन्होंने कहा था कि यह उनके श्रीलंका के रक्षामंत्री बनने से पहले की बात है और इसे लेकर उन पर “निशाना साधना” गलत होगा। गुणरत्नम के साथ ऐसा होने से पहले उनके करीबी दो कॉमरेड गायब हो गए थे और फिर उन्हें दोबारा नहीं देखा गया। अपनी राजनैतिक गतिविधियों का बदला लिए जाने के डर से देश से भागने के बाद गुणरत्नम को ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता मिली। वह अपनी जान बचाने के लिए कैनबरा के राजदूत को धन्यवाद देते हैं। काफी पहले सशस्त्र संघर्ष छोड़ चुके गुणरत्नम कहते हैं कि सड़कों पर आंदोलन को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि समग्र राजनैतिक सुधार हो सके। हम शासकों से लोकतंत्र की उम्मीद नहीं कर सकते। इसी कारण जनता को सड़कों पर आना पड़ा और दिखाना पड़ा कि लोकतंत्र क्या है। राजपक्षे का देश से भागना और फिर जल्दबाजी में सिंगापुर की फ्लाइट लेना लोकतंत्र की जीत थी। लेकिन उन्होंने साथ ही कहा कि प्रदर्शनकारियों का मिशन तब तक अधूरा रहेगा जब तक गोटाबाया राजपक्षे को श्रीलंका की अदालत में कानून का सामना करने के लिए वापस नहीं लौटते। वह अपहरणों और लोगों के गायब होने के पीछे प्रमुख जिम्मेदार लोगों में से एक है। और वो युद्द के दौरान हुए अपराधों के लिए भी ज़िम्मेदार लोगों में से भी एक हैं।

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