Gurugram: मुसलमान के भूदान पर बना काली मंदिर

फीचर

अजय भट्टाचार्य
हरियाणा
के गुरुग्राम स्थित गुरूद्वारे का संदेश साफ है कि देश में धार्मिक उन्माद और कथित हिंदुत्व के नाम पर गुंडागर्दी अमान्य है। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में इससे पहले ही यह संदेश दिया जा चुका है कि धर्म के नाम पर देश के नागरिक से नागरिक के बीच बैर करने/कराने की कोशिशें भारत को मान्य नहीं हैं। इसका सबूत है पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक विभाजन की कोशिशों के साथ हुए विधानसभा चुनावों के छह महीने बाद, एक गरीब मुस्लिम किसान ने नदिया जिले में काली मंदिर के निर्माण के लिए अपनी जमीन का एक हिस्सा दान कर दिया है। भीमपुर गांव में करीब 450 परिवार हैं, जिनमें से 150 मुसलमान हैं। यह गांव भारत-बांग्लादेश सीमा की बाड़ के बगल में स्थित है। हिंदू ग्रामीण काली पूजा के लिए सीमा सड़क के किनारे एक खाली भूखंड का उपयोग करते हैं, लेकिन उन्हें हर साल बीएसएफ से अनुमति लेनी पड़ती है। इस साल, बीएसएफ शुरू में अनुमति देने के लिए तैयार नहीं था जिसने हन्नान मंडल को छुआ और उसने इस मुद्दे को स्थायी रूप से हल करने का फैसला किया। छोटे किसान ने स्थायी काली मंदिर बनाने के लिए अपनी जमीन का एक हिस्सा ग्रामीणों को दान कर दिया। विधानसभा चुनावों से पहले यह जिला भाजपा के बड़े नेताओं की सूची में था, क्योंकि इसमें मतुआ लोगों का वर्चस्व है, जो एक हिंदू धार्मिक संप्रदाय है जो बांग्लादेश से पलायन कर गया था। चुनाव प्रचार के दौरान, भाजपा नेताओं ने बांग्लादेश में मुसलमानों द्वारा कथित अत्याचारों के बारे में बात करके हिंदू शरणार्थी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की और बताया कि विभाजन के दौरान मतुआ को देश से पलायन क्यों करना पड़ा। इसी क्रम में बांग्लादेश की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 मार्च को दो दिनों की बांग्लादेश यात्रा पर गये थे। यात्रा के दूसरे दिन 27 मार्च को मोदी गोपालगंज में मतुआ समुदाय के धर्मगुरु हरिचंद्र ठाकुर की जन्‍मस्‍थली और ओराकंडी में इस समुदाय के तीर्थ स्‍थल पर गये थे। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 1.84 करोड़ है और इसमें 50 फीसदी मतुआ संप्रदाय के लोग हैं। करीब 70 सीटों पर उनका प्रभाव है। मोदी ने 2019 में लोकसभा चुनाव के समय पश्चिम बंगाल में प्रचार की शुरुआत करते हुए मतुआ संप्रदाय के 100 साल पुराने मठ में बोरो मां का आशीर्वाद लेने गए थे। चुनाव खत्म होने के साथ ही मतुआ प्रेम भी स्वाहा हो गया। मगर हन्नान मंडल से अपने हिंदू मतुआ लोगों की परेशानी नहीं देखी गई। काली पूजा समिति के अध्यक्ष बिमल सरकार के मुताबिक यही यह भारत का असली रंग है। बंगाल हमेशा अपने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए प्रसिद्ध रहा है और सांप्रदायिक कलह का यहां कोई स्थान नहीं है। हम सभी भाईचारे की मिसाल कायम करने के लिए हन्नान के आभारी हैं। हन्नान ने समिति को लगभग 460 वर्ग फुट तक की भूमि का एक टुकड़ा दान किया। हन्नान का कहना है कि हर साल, ग्रामीण पूजा के आयोजन के लिए बीएसएफ की हरी झंडी के बारे में चिंतित रहते थे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि इस भूमि की समस्या के कारण पूजा नहीं होगी। मैंने भूखंड दान करने का फैसला किया ताकि वहां एक स्थाई मंदिर का निर्माण किया जा सके, जहां हर साल काली पूजा का आयोजन किया जाएगा। हन्नान के फैसले का स्वागत करते हुए भीमपुर के हिंदू ग्रामीणों ने कहा कि राजनीतिक दल, जो इस साल की शुरुआत में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक कार्ड खेलने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें एक गरीब आदमी के इस इशारे से सबक लेना चाहिए। विधानसभा चुनाव से पहले हमने मतदाताओं को धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश कभी नहीं देखी। हन्नान का भूदान यह स्पष्ट करता है कि बंगाल में इस तरह की राजनीति काम नहीं करेगी।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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