लोगों को अपना दीवाना बना लिया आखरी तक़रीर में हज़रत मोहम्मद

इस्लाम के पन्ने से

दस हिजरी में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज का इरादा फ़रमाया और हर तरफ़ इत्तिला भेज दी गयी कि नबी सल्ल० हज के लिए तशरीफ़ ले जाने वाले हैं । इस इत्तिला के बाद गिरोह गिरोह करके लोग मदीना में जमा होने लगे । इस में हर दर्जे और हर तबके के लोग थे। जुल हुलैफ़ा में नबी सल्ल० ने एहराम बांधा और यहीं से ‘लब्बैक अल्लाहुम – म लब्बैक ला शरीक लक लब्बैक इन्नलहमद वन्निअ – म – तव ल – कलमुल क ला शरीक लक ‘ का तराना बुलन्द किया और मक्का मुअज्जमा को एहराम के साथ रवाना हो गये।

इस मुकद्दस कारवां के साथ रास्ते में हर – हर जगह से जत्थे के जत्थे लोग शामिल हो जाते थे। नबी सल्ल ० का राह में जब किसी टीले से गुजर होता था , तीन – तीन बार तक्बीर ऊंची आवाज से कहते थे ।

जब मक्का के करीब पहुंचे , तो जीतुवा में थोड़ी देर के लिए ठहरे और फिर मक्का के ऊपरी हिस्से से इंसानों की इस भीड़ को लेकर मक्का में दाखिल हुए और दिन के उजाले में काबे का तवाफ़ किया ।

काबे की जियारत से फ़ारिग होने के बाद सफ़ा और मरवा पहाड़ों पर तशरीफ़ ले गये , उन की चोटियों पर चढ़ कर और काबे की तरफ रुख कर के तक्वीर कही और ‘लाइला – ह इल्लल्लाहु वह्दहू लाशरी – क लहू – लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु व हु – व अला कुल्लि शैइन क़दीर ० लाइला – ह इल्लल्लाहु वहदहू अंज ज बअद – हू व न – स – र अब्दहू व ह – ज – मल अहज़ा – ब वहदहू’ के तराने गाए ।

आठवीं जिलहिज्जा को मक्का की कयामगाह से रवाना हो कर मिना ठहरे । जुहर , अस्र , मगरिब , इशा , सुबह की नमाजें मिना में फ़रमायीं ।

नवीं जिलहिज्जा को आंहजरत सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सूरज निकलने के बाद नमरा की घाटी में आकर उतरे । उस घाटी के एक तरक अरफ़ात में तशरीफ़ लाये , जो तमाम आदमियों से भरा हुआ था और हर शख्स तक्बीर व तहलील , तहमीद व तकदीस में लगा हुआ था । उस वक़्त एक लाख चवालीस हज़ार ( या चौबीस हजार ) का मज्मा अल्लाह के हुक्मों को पूरा करने के लिए हाजिर था। नबी स० ने पहाड़ी पर चढ़ कर और क़सवा पर सवार हो कर खुत्बा फ़रमाया –

लोगो ! मैं ख्याल करता हूं कि मैं और तुम फिर कभी इस मज्लिस में इकट्ठा नहीं होंगे।

लोगो ! तुम्हारे खून , तुम्हारे माल और तुम्हारी इज्जतें एक दूसरे पर ऐसी ही हराम हैं , जैसा कि तुम आज के दिन की इस शहर की , इस महीने की हुरमत करते हो ।

लोगो ! तुम्हें बहुत जल्द खुदा के सामने हाजिर होना है , और वह तुम से तुम्हारे आमाल के बारे में सवाल फ़रमाएगा ।

लोगो ! जाहिलियत की हर एक बात मैं अपने क़दमों के नीचे पामाल करता हूं । जाहिलियत के क़त्लों के तमाम झगड़े मिटाता हूं । पहला खून , जो मेरे खानदान का है यानी इब्ने रबीआ बिन हारिस का खून , जो बनी साद में दूध पीता था और हुजेल ने उसे मार डाला था , मैं छोड़ता हूं । जाहिलियत के ज़माने का सूद मिटा दिया गया । पहला सूद अपने खानदान का , जो मैं मिटाता हूं , वह अब्बास बिन अब्दुल मूत्तलिब का सूद है , वह सारे का सारा छोड़ दिया गया ।

लोगो ! अपनी बीवियों के बारे में अल्लाह से डरते रहो । खुदा के नाम की जिम्मेदारी से तुम ने उनको बीवी बनाया और खुदा के कलाम से तुम ने उनका जिस्म अपने लिए हलाल बनाया है । तुम्हारा हक़ औरतों पर इतना है कि वह तुम्हारे बिस्तर पर किसी गैर को ( कि उस का आना तुम को नागवार है ) न आने दें , लेकिन अगर ये ऐसा करें तो उन को ऐसी मार मारो जो जाहिर न हो। औरतों का हक़ तुम पर यह है कि तुम उन को अच्छी तरह खिलाओ , अच्छी तरह पहनाओ ।

लोगो ! मैं तुम में वह चीज़ छोड़ चला हूं कि अगर उसे मजबूत कर लोगे , तो कभी गुमराह न होगे । वह क़ुरआन अल्लाह की किताब है ।

लोगो ! न तो मेरे बाद कोई पैग़म्बर है और न कोई नयी उम्मत पैदा होनी वाली है । खूब सुन लो कि अपने परवरदिगार की इबादत करो और पांच वक्त की नमाज अदा करो । साल भर में एक महीना रमजान के रोजे रखो , अपने मालों की जकात निहायत खुशदिली के साथ दिया करो । खाना – ए- खुदा का हज करो और अपने जिम्मेदारों और हाकिमों की इताअत करो , जिस का बदला यह है कि तुम लोग यह पूरा करके परवरदिगार की जन्नत – फ़िरदौस में दाखिल होगे ।

लोगो ! क़ियामत के दिन तुम से मेरे बारे में भी पूछा जाएगा । मुझे जरा बता दो कि तुम क्या जवाब दोगे ?

सब ने कहा , हम इस की गवाही देते हैं कि आप ने अल्लाह के हुक्म हम को पहुंचा दिए । आप ने रिसालत व नुबूवत का हक़ अदा कर दिया ।

आप ने हम को खोटे – खरे के बारे में अच्छी तरह बता दिया । ( उस वक्त ) नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शहादत की उंगली को उठाया । आसमान की तरफ़ उंगली को उठाते थे और फिर लोगों की तरफ़ झुकाते थे । ( फ़रमाते थे ) ऐ खुदा ! सुन ले , ( तेरे बन्दे क्या कह रहे हैं ) ऐ खुदा गवाह रहना कि ( ये लोग क्या गवाही दे रहे हैं ) ऐ खुदा ! गवाह रह ( कि ये सब कैसा साफ़ इक़रार कर रहे हैं )

देखो , जो लोग मौजूद हैं , वे उन लोगों को जो मौजूद नहीं हैं , उनकी तब्लीग़ करते रहें , मुम्किन है कि कुछ सुनने वालों से वे लोग ज्यादा उस कलाम को याद रखने और हिफाजत करने वाले हों , जिन पर तब्लीग की जाए ।

प्रस्तुतकर्ता – रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब – तारीखे इस्लाम

लेखक – अकबर शाह नजीबाबादी

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