सत्ता की भूख ने बदले सुर

राजनीति लेख

अजय भट्टाचार्य
समाजवादी
पार्टी में नेतृत्व के खिलाफ उठी मुस्लिम आवाज के मायने तलाशे जा रहे हैं। पार्टी के भीतर से ही बगावत के बुलंद होते सुरों की सरगम का इशारा साफ है कि सत्ता नहीं मिली मगर मलाई चाहिए। ये सुर अनायास नहीं उठे हैं। चाचाश्री भी जिस अंदाज में नजर आ रहे हैं उसके भी गूढ़ार्थ हैं। ठीक इसी तरह महाराष्ट्र कांग्रेस के एक बड़े उत्तर भारतीय नेता को 2019 विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली से एक फ़ोन आया था कि आप विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। यह फोन आने के बाद नेताजी के भीतर राष्ट्रवाद ने अंगड़ाई ली और धारा 370 के मुद्दे पर पार्टी लाइन से अलग होकर मोदी मंत्र का जाप करने लगे। ऐन विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी से इस्तीफ़ा भी दे दिया। मतलब कांग्रेस के उत्तर भारतीय मतदाताओं का जितना नुकसान कर सकते थे, किया। कहते हैं उस फ़ोन में नेताजी से एक लाइन कही गई थी कि कोयला खदान घोटाला से जुडी फाइल फिर खुल सकती है। खबर है कि चाचाश्री और चचा जान के पास भी कुछ इसी तरह के फोन घनघनाये हैं और तभी से दोनों के सुर बेसुरे हो गये हैं।
दरअसल विधानसभा चुनावों में जीत के बाद भी भाजपा की बेचैनी इस बात को लेकर है कि उत्तर प्रदेश में जिस मकसद से ओवैसी को लेकर खेल खेल गया उसका कोई फायदा भाजपा को नहीं मिला अलबत्ता बसपा से जुड़ा मुस्लिम वोटर भी सपा के साथ चला गया। चूँकि अजम खान विधानसभा चुनाव जीत गये हैं मगर जेल में हैं, लिहाजा फोन पर कह दिया गया कि मियां पाला बदलो और जेल से रिहा हो जाओ। आजम की मुश्किल यह है कि वे ओवैसी के साथ जायें या कांग्रेस के साथ। जहाँ तक ओवैसी की बात है, इस चुनाव में उसके एक उम्मीदवार को छोडकर बाकी सभी उम्मीदवारों कि जमानत जब्त हुई है। इस बीच आल इंडिया तंजीम उलेमा ए इस्लाम के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना शहाबुद्दीन रिज़वी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मुसलामानों को समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ देना चाहिए और दो राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस या फिर भाजपा को विकल्प के रूप में देखना चाहिए। एक निजी चैनल से बातचीत में मौलाना शाहबुद्दीन ने कहा कि अब क्षेत्रीय पार्टियों का भविष्य नजर नहीं आ रहा है। धीरे-धीरे क्षेत्रीय पार्टियां हाशिए पर जा रही हैं। ऐसे में अब मुसलमानों को देश की दो राष्ट्रीय पार्टियों में से ही एक को विकल्प चुनना चाहिए। भाजपा अगर बड़ा दिल दिखाए तो मुसलमान उनके बारे में भी सोच सकते हैं।
समाजवादी पार्टी, जिसे मुसलमानों ने सामूहिक रूप से वोट दिया है, वह भी सत्ता खो चुकी है। पार्टी ने अपनी सीटों में इजाफा किया है, लेकिन उसे इतनी सीटें नहीं मिल पाई हैं, जिससे उनकी सरकार बन सके। इसका मुख्य कारण यह है कि अखिलेश यादव अपने स्वयं के समुदाय को पूरी तरह से एकीकृत नहीं कर पाए हैं। इसके बावजूद भी मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी को मिला, लेकिन कई जगहों पर अखिलेश यादव के समुदाय के लोगों ने समाजवादी पार्टी को वोट नहीं दिया. जिसका सबूत है कि यादव बाहुल्य क्षेत्रों में भाजपा ने 43 सीटों पर जीत हासिल की। भाजपा को एक ऐसा यादव चेहरा चाहिए जो इस 43 के आंकड़े को आगे बढ़ा सके। शिवपाल भाजपा की इस इच्छा को पूरा कर सकते है क्योंकि शिवपाल की महत्वाकांक्षा भी किसी से छिपी नहीं है। लंबे समय से सत्ता से बाहर हैं इसलिये सत्ता का आनंद फ़िलहाल भाजपा के सिवा नहीं मिल सकता, लिहाजा तेवर बदले हुए हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार मानते हैं कि आजम खान और शिवपाल सत्ता के बिना रह ही नहीं सकते। इसलिये अपने सही होने के लिए कुछ कारण भी जरुरी हैं। आजम खान का खेमा सपा विशेषकर अखिलेश यादव पर मुसलमानों की अनदेखी का आरोप लगा रहा है और शिवपाल का धड़ा उपेक्षा का कि विधायक दल की बैठक तक में नहीं बुलाया। भीतर की खबर यह है कि शिवपाल अगर पाला बदलते हैं तो उन्हें विधानसभा का उपाध्यक्ष पद दिया जा सकता है। बहरहाल इंतजार कीजिये कि सौदेबाजी कब तक पूरी होती है तभी मालूम पड़ेगा कि आजम और शिवपाल किस खेमे में किस भूमिका में नजर आयेंगे।

मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि मुसलमानों को अब धर्मनिरपेक्षता का ठेका लेना बंद कर देना चाहिए और अपनी राजनीति और अपनी भागीदारी के बारे में नये सिरे से बात करनी चाहिए. जब तक कि वे किसी एक खास पार्टी के सहारे जीते हैं, उन्हें कुछ नहीं मिलेगा. बल्कि मुसलमानों को अब नई रणनीति बनानी चाहिए. मौलाना ने मुसलमानों को मशवरा दिया है कि अब नए हालात हैं और नए तकाज़े है इसके पेशेनज़र समाजवादी पार्टी के अलावा दूसरे विकल्पों पर विचार करना चाहिए और किसी भी पार्टी के खिलाफ मुखर होकर दुश्मनी मोल नहीं लेनी चाहिए. मैंने चुनाव के दरमियान मुसलमानों को अगाह करते हुए बताया था कि अखिलेश यादव मुसलमानों के हितैषी नहीं है. उन्होंने हर जगह मुस्लिम बडे़ चेहरो को पीछे रखने की कोशिश की और अकेले चुनाव प्रचार करते रहे. मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में ज़मीन और आसमान का फ़र्क है. इसलिये मुसलमान विकल्पों पर विचार विमर्श करें. मौलाना ने आगे कहा कि चुनाव के दरमियान मेरे द्वारा कहीं गई बातों का समाजवादी पार्टी के नेताओं ने विरोध किया था, मगर अब मेरी ही बातें उनको अच्छी लगने लगी है. उदाहरण के तौर पर आज़म खान और डॉ शफीकुर्रहमान बर्क़ के द्वारा दिए गए बयानों से ज़ाहिर है. मुसलमानों या सपा के वरिष्ठ लीडरों को मेरा मशवरा है कि जितनी जल्दी मुमकिन हो समाजवादी पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दें, इसी में उनकी भलाई है.
मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही राज्य के मुसलमान मायूस हैं. इन तमाम उपायों के बावजूद धर्मनिरपेक्ष दल, कही जाने वाली फिराकापरस्त ताकतों को सत्ता से हटाने में नाकाम रहे हैं और तब से यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि मुसलमानों का भविष्य क्या होगा? मुसलमानों में एक तरह का डर और निराशा है. लेकिन परिस्थितियां कैसी भी हों, मुसलमानों को निराश या भयभीत होने की जरूरत नहीं है. कोई समस्या है तो उसका समाधान भी है. यह भविष्य के लिए एक सबक है. हमें एक नई रणनीति के साथ आने की जरूरत है.न्होंने कहा कि आज जो स्थिति पैदा हुई है, उससे कई मुस्लिम भाई निराश नजर आ रहे हैं. यहां तक कि अच्छे लोग और धार्मिक समुदाय के लोग भी कह रहे हैं कि मुसलमानों का भविष्य बहुत अंधकारमय है. जबकि हमारे लिए यह सोचना उचित नहीं है, बल्कि हमें यह विश्लेषण करने की जरूरत है कि हम किसके साथ खड़े हैं और कहां जा रहे हैं. जिस तरह से मुसलमानों ने आजादी के बाद से देश भर में धर्मनिरपेक्ष वैचारिक दलों को साथ दिया है. लेकिन उन्हें आज तक कुछ नहीं मिला है. इसके विपरीत, कई दल अक्सर अपनी हार का ठीकरा मुसलमानों के सिर पर फोड़ते हैं, जैसा कि बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने हाल ही में अप्रत्यक्ष रूप से कि मुसलमानों ने हमें वोट नहीं दिया है, जबकि वह सच में कहना चाहती हैं कि मुसलमानों की वजह से उन्हें सीट नहीं मिली.

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