खिराज_ए_अक़ीदत 22: रबीउलअव्वल मजहब की इस्लाह और धर्म सुधार के आन्दोलनकारी शाह फ़ज़ले रहमान रह०

इस्लाम के पन्ने से

सूरह फातिहा
पहले ही पहल नाम लेता हूँ मनमोहन का जो बड़ी मया मोह का महरवाला है ।

सब सराहत मनमोहन को है जो सारे संसार का पालनहार ।
बड़ी मयामोह का महरवाला है ।
जिस के बस में चुकौती का दिन है ।
हम तुझी को पूजते हैं और तेरा ही आसरा चाहते हैं । चला हम को सीधी राह । डगमग नहीं , उन लोगों की जिन पर तेरी दया हुई ।
न उन की जिन पर तेरी झुंझलाहट हुई , और न राह क़ुराहों की । [ आमीन ]
( मनमोहन की बातें किताब से,अनुवादक – शाह फ़ज़ले रहमान रह०)

प्रो ० नजीब अशरफ़ नदवी ने शाह फ़ज़ले रहमान रह० का परिचय इस प्रकार कराया था कि अठारहवीं सदी की आखरी चौथाई से उन्नीसवीं सदी की पहली तिहाई तक न सिर्फ़ हिन्दुस्तान बल्कि एशिया के दूसरे देशों में भी मजहब की इस्लाह और धर्म के सुधार के आन्दोलन पैदा हुए ।

हमारे देश में यह तहरीक हिन्दू और मुसलमान दो जमाअतों में फैली । राजा राममोहन राय , स्वामी दयानन्द सरस्वती जी वग़ैरह एक तरफ़ और शाह वली उल्लाह का खानदान दूसरी तरफ़ इस काम के लिए बढ़ा । मुसलमानों में विद्वानों ने ही इस काम को हाथ में नहीं लिया बल्कि सूफ़ियों ने भी इसकी तरफ़ तवज्जह की ।

सूफ़ी संत सदा से जनता से नज़दीक और इनके ख्यालों और विचारों की जानकारी रखने वाले होते हैं । वह इन की मांग और ज़रूरत को अच्छी तरह समझते हैं । इन्हीं जनता प्रेमी सूफ़ियों में हज़रत शाह फ़ज़ले रहमान रह० हुए हैं।

शाह साहब उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के एक गांव मल्लावाँ में 1208 हिजरी ( सन् 1762 ) में पैदा हुए । उनका खानदान अपने पढ़ने लिखने और धार्मिक कामों के लिए बहुत मशहूर था । उनके पिता का नाम शाह अहलुल्लाह और उनका नाता बड़े सूफ़ी हज़रत मिसबाहुल आशिक़ीन मुहम्मदी सिद्दीकी चिश्ती तक पहुँचता है और वह हजरत अबूबक्र की औलाद में हैं । यह ख़ानदान सिकन्दर लोदी के ज़माने में हिन्दुस्तान आया अपने इल्म और ज्ञान ध्यान के कारण बड़ी इज्जत और आदर से देखा जाता था ।

होनहार बिरवे के अपने बर्ताव और चाल चिकने चिकने पात , शाह चलन से यह बता दिया कि साहब में लड़कपन ही से उन में बड़े होने के सब गुण छुपे हुए हैं , इसलिए बड़े लोग भी उनकी इज्जत करते ।

शाह साहब की पहली शादी अपने गांव में ही हो गई थी । उनसे उनके दो लड़के भी हुए लेकिन वह बहुत जल्द चल बसे । अब उनका दिल भी गांव से उचाट हो गया इस लिए वह अपने गांव को छोड़ कर एक दूसरे गांव गंज मुरादाबाद चले आये । यहां एक पुराना मकबरा था और उस मक़बरे के अहाते में एक मसजिद भी उजाड़ पड़ी थी । उन्होंने मक़बरे को अपने रहने के लिए चुना । उस समय उनका कुल सामान एक मूज की खाट , एक चौकी नमाज के लिये , मिट्टी का घड़ा और दो लोटा था ।

उनकी आत्मिक शक्ति और ज्ञान ध्यान का चर्चा सारे देश में फैल गया और लोग दूर – दूर से उनके दर्शन के लिए आने लगे । उनके मुरीदों और चेलों में हर धर्म और दर्जे के लोग थे , बड़े – बड़े नवाब , सरकारी अफ़सर , बॅरिस्टर , वकील , आलिम से लेकर मामूली मजदूर और किसान भी थे । चूंकि उन्होंने दुनिया छोड़ दी थी इस लिए उनके पास जो कुछ भी आता था वह सब ईश्वर की राह में खर्च कर देते । वह खाना मिट्टी के बरतन में खाते ।

उसी जमाने में उन्होंने यह बताने के लिये कि इस्लाम दुनिया को छोड़ने का नाम नहीं बल्कि दुनिया में रहकर ईश्वर को भजने का नाम है , दूसरी शादी गंज मुरादाबाद के एक ऊँचे खानदान की महिला से की और यह बीवी बहुत दिनों तक न सिर्फ उन की सेवा करती रहीं बल्कि शाह साहब के पास जितने लोग आते उनके खाने पीने का इन्तजाम करतीं ।

शाह साहब दिन भर में सिर्फ़ एक मरतबा खाते थे और वह भी सादी खिचड़ी , कभी कभी तो घर में कुछ भी नहीं रहता था , लेकिन उनको उसकी भी परवाह नहीं होती थी। उन्होंने लगभग एक सौ पांच बरस की उम्र पाई और जुमा 22 रबीउल अव्वल 1313 हिजरी नवम्बर 1895 में उन्होंने फ़ानी दुनिया से विदा ली।

उस वक्त तक सारे देश में उनके मानने वाले फैल चुके थे उनमें सारे धर्म के लोग थे सारे देश ने उनका शोक मनाया । लोगों ने लेख लिखे कविताएँ बनाई और उनकी वफ़ात की तारीखे बनाई । इन लेखों और कविताओं का इससे अंदाजा हो सकता है कि वह कई जिल्दों में हैं और कई साल तक बराबर छपती रहीं ।

उनके बाद उनके बहुत से ख़लीफ़ा हुए लेकिन उनमें सबसे ज्यादा मशहूर मौलाना मुहम्मद अली मरहम कानपुरी थे । यह वही मौलाना मुहम्मद अली हैं जो नदवतुल उलमा के पहले नाज़िम और उसके दारुल उलूम के बड़ी हद तक बानी थे ।

शाह साहब ने मदरसा की पढ़ाई पूरी करली लेकिन उन के दिल को शान्ति और आनन्द नहीं मिला , इसलिए वह इसको ढूंढने निकले । जो खोजता है वह पाता है , उन को भी हजरत शाह मुहम्मद आफ़ाक़ जैसे गुरु मिल गये । उन्होंने अपना सब कुछ ज्ञान ध्यान देकर जनता को सीधे मार्ग पर चलाने का काम उनके सुपुर्द किया ।

मदरसा की पढ़ाई उन्होंने मोलवी नूरसाहब लखनवी और हजरत शाह अब्दुल अजीज़ देहलवी से पूरी की थी । उसी का नतीजा था कि शाह वलीउल्लाह के ख़ानदान और हजरत शाह आफ़ाक़ के सिलसिले की तमाम चीजें उनमें जमा हो गई थीं ।

उन्होंने कहा है कि जनता का सुधार और अवाम की इस्लाह तभी ठीक तौर से हो सकती है जब कि वह क़ुरान शरीफ़ को खुद पढ़े और समझें । शाह वली उल्लाह और उनके बेटों ने उस जमाने में नये सिरे से क़ुरान का फ़ारसी और हिन्दी में तरजुमा कर दिया था लेकिन जो भी हिन्दी उन्होंने इस्तेमाल की थी वह पढ़े लिखों की हिन्दुस्तानी थी । गांव के लोग जो भाषा बोलते थे वह उससे अलग थी । इसलिये शाह साहब ने सोचा कि क्यों न ऐसे देहातियों के लिए उन्हीं की बोली में क़ुरान का अर्थ प्रस्तुत किया जाए इसलिये उन्होंने तजरबे के लिये क़ुरान के थोड़े से भाग का अनुवाद किया , मगर इसके बाद ही वह दुनिया से परदा कर गये और उनका यह अनुवाद ‘ मनमोहन की बातें ‘ उनके बाद छपा और बहुत पसंद किया गया ।

इस अनुवाद का सबसे बड़ा गुण और भेद यह है कि इस में हर अरबी शब्द का अर्थ ऐसे ठेठ और ऐसे सादे देहाती शब्दों में किया गया है जिस से केवल मतलब ही समझ में नहीं आ जाता बल्कि अरबी में इस का जो जोर , फैलाव और गहराई है वह भी समझ में आ जाती है , जैसे ” अल्लाह ” के लिये ‘ मनमोहन ‘ ” रहमान उर रहीम ” के लिये ‘ बड़ी मयामोह का महरवाला ‘ । ” अलहम्दो लिल्लाह रब्बिल आलमीन ” के लिये ‘ सब सराहत मोहन को है जो संसार का पालनहार है ” ” योमिद्दीन ( क़यामत ) ” के लिये ‘ चुकौती का दिन ‘ इसी तरह ” मन कान लिल्लाहे कानल्लाहलहू ” का तरजुमा “ जो हरि को भजे सो हरि का होय । ” कितना सरस है ।

मुसलमान हर नमाज में दरूद पढ़ता है । इस का अर्थ भी देखिये , ” ऐ मनमोहन तू मुहम्मद नबी और उनके बाल बच्चों पर ऐसा मयामोह रख जैसा तूने इब्राहीम नबी और इब्राहीम नबी के बाल बच्चों पर मयामोह रखा है । सच तू सराहा हुआ महा धनी है । “

ऐसी बहुत सी चीजें आपके सामने रखी जा सकती हैं , लेकिन अब सारा अर्थ आप पढ़ने वाले हैं इसलिए इन थोड़े से नमूनों पर बस करता हूँ । यह अनुवाद हमको यही नहीं बताता कि शाह साहब अरबी और ब्रज भाषा पर कितना क़ाबू रखते थे बल्कि यह भी बताता है कि वह अपने विचार में कहां तक पहुँचते थे । दूसरे लोगों की राय के विरुद्ध वह धर्म को सारी दुनिया की चीज़ ही नहीं समझते थे बल्कि उनका विश्वास तो यह था कि मनुष्य जिस भाषा में चाहे सत्य और हक़ की शिक्षा ले सकता है इस के लिये किसी एक भाषा ही तक अटक कर रह जाने की जरुरत नहीं । इतना ही नहीं यह देख कर बड़ा आश्चर्य होता है कि वह धर्म के कामों में कितने आजाद और इंसाफ़ प्रेमी थे ।

वह सब धर्मो को एक सा समझते थे उन का कहना था कि खुदावंद तआला ने हर देश और हर जाति को सीधा रास्ता बताने और सच्चा धर्म सिखाने के लिए अपने पैग़म्बर भेजे हैं और हिंदुस्तान मे भी बहुत से ऐसे नबी आए हैं । वो श्री रामचन्द्र , श्री कृष्ण वग़ैरह को ऐसे हो सच्चे रहबर समझते थे । अलबत्ता उन का कहना था कि समय बीतने से उनकी असली तालीम बिलकुल बदल गई है । ईश्वर करे उनका यह अनुवाद सत्य के खोजियों के लिए चिराग़ का काम करे और वे उसकी जोत में ठीक राह देख सके ।

प्रस्तुतकर्ता- रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

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