तेदेपा जैसा है महा(राष्ट्र)संग्राम…!

मुंबई राजनीति

अजय भट्टाचार्य
महाराष्ट्र
की सत्ता के महासंग्राम में शिवसेना जिस अंतर्द्वद्व से जूझ रही है उसकी कहानी 1995 में मेगास्टार एनटी रामा राव की तेलुगु देसम पार्टी के विभाजन के समान दिखती प्रतीत होती है। जिस एन टी रामा राव ने तेदेपा को खड़ा किया था, उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने न सिर्फ उन्हें सरकार के प्रमुख के तौर पर बेदखल कर दिया, बल्कि पार्टी से भी निकाल दिया।
26 अगस्त, 1995 को, आंध्र के मुख्यमंत्री के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल के नौ महीने बाद उनके दामाद और भरोसेमंद सिहहसालार चंद्रबाबू नायडू ने उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया। नायडू ने अपने तख्तापलट का बचाव करते हुए कहा कि एनटीआर की दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती पार्टी मामलों और राज्य सरकार में बढ़ते प्रभाव के कारण वे अपने ससुर के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मजबूर हो गए। उस दिन, हैदराबाद ने 72 वर्षीय पूर्व अभिनेता को शहर की सड़कों पर अपनी पीठ में एक लाक्षणिक खंजर के साथ भागते हुए देखा, यह दिखाने के लिए कि उनके साथ विश्वासघात किया गया था और पीठ में छुरा घोंपा गया था। उनका पतन उतना ही नाटकीय है जितना कि उनका उभार शानदार था। 29 मार्च 1982 को हैदराबाद में उन्होंने तेलुगू देसम पार्टी (टीडीपी) की शुरुआत की। उनका फिल्मी करियर समाप्त हो गया था और वह पूरी तरह से राजनीति में आ चुके थे। पार्टी खड़ी करने के महज 9 महीने के अंदर रामाराव ने 2 तिहाई बहुमत हासिल कर लिया। लगा कि आंध्र प्रदेश की जनता का मिजाज भी तमिलनाडु की तरह फिल्म स्टार के ग्लैमर से प्रभावित होने लगा है। 1983 में वह पहली बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और लगातार तीन बार कुर्सी पर काबिज रहे। 1985 में उनकी पहली पत्नी का कैंसर से निधन हो गया और फिर उनकी जिंदगी में आईं लक्ष्मी पार्वती। उनकी मुलाकात एन टी रामा राव से उनकी जीवनी लिखने के सिलसिले में हुई थी और फिर देखते ही देखते दोनों में प्यार हो गया और बात शादी तक जा पहुंची। इसके बाद 1993 में 38 साल की लक्ष्मी पार्वती और 70 साल से अधिक की उम्र के एन टी रामाराव ने शादी कर ली और यहीं से रामाराव परिवार में उथल-पुथल शुरू हुई। जैसे-जैसे लक्ष्मी का पार्टी में दखल बढ़ना शुरू हुआ, उनको ‘अम्मा’ कहने वाले पार्टी के विधायक और सांसद भी उनके ही खिलाफ खड़े हो गए। जहां एक ओर रामाराव हमेशा अपनी पत्नी लक्ष्मीपार्वती के साथ खड़े रहते थे, वहीं उनके बेटे, बेटी और दामाद ने बगावत कर दी। इस बगावत की अगुवाई की थी चंद्रबाबू नायडू ने, जो उस दौरान रामाराव सरकार में मंत्री थे। शिवसेना के मामले में महाराष्ट्र के पीडब्ल्यूडी और शहरी विकास मंत्री एकनाथ शिंदे और कभी उद्धव ठाकरे के करीबी सहयोगी, विद्रोही खेमे का नेतृत्व कर रहे हैं। शिवसेना में बगावत 20 जून को शुरू हुई। जब एकनाथ ने शिंदे ने दावा किया कि उन्हें शिवसेना के 11 विधायकों का समर्थन हासिल है, हालांकि अब यह संख्या 50 से ज्यादा हो गई है। शिंदे गुट की तरफ से नई पार्टी शिवसेना बाला साहेब बनाने के दावे भी किए जा रहे हैं। वहीं आंध्र प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही वाक्या देखने को मिला था। सियासी विद्रोह 23 अगस्त 1995 को शुरू हुआ था। इस दौरान बागी विधायकों को होटल वायसराय में ठहराया गया था और बाद में इनकी संख्या बढ़ती गई। तब हालात ऐसे थे कि कुल 214 विधायकों में से मुश्किल से दो दर्जन विधायक ही एन टी रामाराव के साथ थे। आखिरकार एन टी रामाराव ने अपने परिवार से सार्वजनिक रूप से सारे संबंध तोड़ लिए और चंद्रबाबू नायडू को ‘पीठ में छुरा घोंपने वाला धोखेबाज’ और ‘औरंगजेब’ कहने लगे।
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायकों की तरफ से शिवसेना को कांग्रेस और एनसीपी के सामने बंधक होने के साथ कहा जा रहा है कि पार्टी को बालासाहेब ठाकरे के आदर्शों पर वापस ले जाने के लिए अब विद्रोह ही एकमात्र रास्ता है। वहीं चंद्रबाबू नायडू ने भी बगावत पर कहा था कि “मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं एनटीआर के खिलाफ विद्रोह करूंगा। मेरे लिए एनटीआर सिर्फ ससुर नहीं थे, बल्कि एक भगवान थे जिनकी मैं पूजा करता था। लेकिन उन्हें ‘दुष्ट शक्ति’ के प्रभाव में आने के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था और इसलिए हमारे पास तेदेपा को बचाने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था।

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