अठारह साल पहले भी चौंका था महाराष्ट्र

मुंबई राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
महाराष्ट्र
की राजनीति में अचानक धूमकेतु बनकर उभरे एकनाथ शिंदे इस समय सूबे की राजनीति के शिखर पर हैं। बगावत के बाद भाजपा के साथ सरकार बनाने तक किसी भी राजनीतिक पंडित को शक नहीं था क्योंकि सारे घटनाक्रम के पीछे नग्नसत्य सब जान और समझ रहे थे। बुधवार की रात निवर्तमान मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का इस्तीफ़ा और गुरुवार की शाम एकनाथ शिंदे की ताजपोशी ने राजनीतिक विश्लेषकों जरुर चौंकाया। क्योंकि यह माना जा रहा था कि बागी शिवसेना गुट समर्थित भाजपा सरकार बनेगी और देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री तथा शिंदे उपमुख्यमंत्री बनेंगे। हुआ बिलकुल उल्टा, भाजपा समर्थित शिवसेना बागी गुट की सरकार बनी और शिंदे उसके मुखिया बने। फड़नवीस उपमुख्यमंत्री बने अथवा उनको जबरदस्ती शिंदे का डिप्टी बनाया गया है इस पर सियासी बहस मुबाहिसा चल ही रहा है।
कहते हैं राजनीति बहते पानी की तरह है। इसमें कब बहाव का रूख किस तरफ हो जाए कहा नहीं जा सकता। ये अचानच के किसी को फर्श से अर्श पर पहुंचा देता है तो किसी को फर्श से अर्श पर। उद्धव सरकार के अस्त से शिंदे सरकार के उदय तक की कहानी के मुख्य किरदार देवेंद्र फडनवीस की वर्तमान नियुक्ति ने हर किसी को चौंका दिया। उनका उपमुख्यमंत्री बनना उनके साथ ही उनके समर्थकों को भी असहज कर रहा है। होना भी लाजिमी है। 2014 से 2019 तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में काम कर चुके फडनवीस के नेतृत्व में ही 2019 का विधानसभा चुनाव लड़ा गया था। राज्य में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भी थी। लेकिन ऐन वक्त पर शिवसेना ने सत्ता में शीर्ष पद पर ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले की बात पर गठबंधन तोड़ लिया और कांग्रेस-राकांपा के साथ महाविकास अघाड़ी बनाकर सरकार बना ली। ठीक ढ़ाई साल बाद शिवसेना में बगावत के चलते अघाड़ी सरकार का पतन हो गया। जिसके बाद से ही 2019 में मुख्यमंत्री बनते-बनते रह जाने वाले फडनवीस के नाम पर किसी को संशय नहीं था। अख़बारों और चैनलों में उनके मुख्यमंत्री बनने और राजनीतिक सफर को लेकर प्रोफाइल स्टोरी तैयार कर रखी जा चुकी थी। शिंदे की ताजपोशी के बाद यह प्रोफाइल स्टोरी ठंडे बस्ते में चली गई है। वैसे महाराष्ट्र की राजनीति में यह पहली घटना नहीं है। 18 साल पहले भी 2004 में महाराष्ट्र की सियासत में ऐसा ही कुछ नजारा देखने को मिला था। उस वक्त इस घटनाक्रम केंद्र में कांग्रेस के दो दिग्गज नेता सुशील कुमार शिंदे और विलास राव देशमुख थे।
कांग्रेस के नेता विलास राव देशमुख को 1999 के चुनावों में पार्टी की जीत के बाद पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिली। लेकिन अंतर्कलह के कारण विलासराव को मुख्यमंत्री की कुर्सी बीच में ही छोड़नी पड़ी थी। उनकी जगह सुशील कुमार शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया। शिंदे के नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव लड़ा और कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा। मुख्यमंत्री के रूप में सुशील कुमार शिंदे की ताजपोशी को लेकर किसी के मन में कोई शक या सवाल नहीं थे। मीडिया में भी शिंदे समर्थकों की तरफ से दावे किए जाने लगे थे। लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी विलासराव देशमुख को मिली। उस वक्त कांग्रेस के इस फैसले ने हर किसी को चौंका दिया था। जिसके बाद महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया था। इस घटना से जुड़ा एक किस्सा भी महाराष्ट्र की राजनीति में चटकारे लेकर सुनाया जाता रहा। बताते हैं कि 18 अक्टूबर 1999 को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने के लगभग तीन साल बाद सूबे की राजनीति बदली और 17 जनवरी 2003 को उन्हें पद छोड़ना पड़ा। बताते है उनके साथ उस समय कांग्रेस के एक बड़े उत्तर भारतीय नेता विमान में उनका बैग लेकर दिल्ली गये थे। जैसे ही उनको अपदस्थ कर सुशील कुमार शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला हुआ, वे नेताजी देशमुख को छोड़कर दिल्ली एअरपोर्ट पर सुशील कुमार शिंदे के साथ लटक लिए। 2004 में विधानसभा चुनाव होने के बाद एक नवंबर 2004 को जब विलासराव देशमुख फिर मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने उस उत्तर भारतीय नेता को अपने पास नहीं फटकने दिया। अब वह नेता भाजपा में है।

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