महात्मा रावण, शहीद महिषासुर: यहां रावण की वजह से शांति और खुशहाली है

लेख समाचार

अजय भट्टाचार्य
विविधताओं
से भरे देश भारत में ही संभव है कि राम के साथ रावण की भी पूजा हो और दुर्गा के साथ महिषासुर की भी। महाराष्ट्र से सांगली जिला स्थित सांगोला गांव में दशहरा थोड़ा अलग अंदाज में होता है और वहां राक्षस राज की आरती की जाती है। गांव के कई निवासियों का मानना है कि वे रावण के आशीर्वाद के कारण नौकरी करते हैं और अपनी आजीविका चलाने में सक्षम हैं। उनके गांव में शांति व खुशी राक्षस राज की वजह से है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि रावण को उसकी ‘बुद्धि और तपस्वी गुणों’ के लिए पूजे जाने की परंपरा पिछले 300 वर्षों से गांव में चल रही है। गांव के बीचोबीच रावण की दसशीश वाले रावण की लंबी काले पत्थर की मूर्ति है। स्थानीय निवासी भिवाजी ढाकरे के मुताबिक दशहरे के अवसर पर बताया कि ग्रामीण भगवान राम में विश्वास करते हैं, लेकिन उनका रावण में भी विश्वास है और उसका पुतला नहीं जलाया जाता है। देश भर से लोग हर साल दशहरे पर लंका नरेश की प्रतिमा देखने इस छोटे से गांव में आते हैं और कुछ तो पूजा भी करते हैं। गाँव के लोग कहते हैं कि संमहात्मा रावण के आशीर्वाद से आज गांव में कई लोग कार्यरत हैं। दशहरे के दिन वे महा-आरती के साथ रावण की मूर्ति की पूजा करते हैं। कुछ ग्रामीण रावण को “विद्वान” मानते हैं और उन्हें लगता है कि उसने राजनीतिक कारणों से सीता का अपहरण किया और उनकी पवित्रता को बनाए रखा। स्थानीय मंदिर के पुजारी हरिभाऊ लखड़े के अनुसार जहां देश के बाकी हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले जलाए जाते हैं, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, संगोला के निवासी “बुद्धि और तपस्वी गुणों” के लिए लंका के राजा की पूजा करते हैं। उनका परिवार लंबे समय से रावण की पूजा कर रहा है और दावा किया कि गांव में सुख, शांति और संतोष लंका के राजा की वजह से है।
हुदुड़ दुर्गा
इसी तरह हुदुड़ पश्चिम बंगाल दुर्गा में मिदनापुर जिले के एक सुदूर जंगल से आच्छादित गांव केंदाशोल समेत आसपास के कई गांव के लोग दुर्गापूजा के मौके पर महिषासुर को याद करते हैं। वहां पर हुदुड़ दुर्गा की पूजा कर उत्साह के साथ दुर्गोत्सव मनाते हैं। संथालीक कुडमाली समाज के लोगों के लिए महिषासुर की याद कर उसकी पूजा की जाती है। कहा जाता है कि एक समय आर्य राजाओं ने दुर्गा की मदद से धोखा देकर महिषासुर का वध किया था और इसलिए जब आम लोग दुर्गोत्सव मना रहे हैं। गांव के लोग असुर की मूर्ति को सामने रखकर शहीदों को याद करते हैं। सप्तमी की शाम से दशमी तक यहां के लोग असुर के रुप जिसे हुदुड़ दुर्गा कहा जाता है की मूर्ति को सामने रखकर स्मरण करते हैं। इसके अलावा आसपास के लगभग 10 गांवों में कोई दुर्गा उत्सव नहीं है। उनके लिए दुर्गोत्सव का अर्थ हुदुड़ दुर्गा का स्मरण है। यह समारोह 2016 से शुरू हुआ है, लेकिन कोरोना काल में वित्तीय संकट के कारण इस साल इतना बड़ा उत्सव नही मना। हुदुड़ दुर्गा खेरवाल संथाल समुदाय के देवता हैं, जिन्हें संथाल समुदाय के लोग हिंदू धर्म में महिषासुर होने का दावा करते हैं। संथाल हिंदू देवी दुर्गा को खलनायक मानते हैं और इसके बजाय महिषासुर की पूजा करते हैं।

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