Manipur election: मणिपुर में एनपीपी बन रही भाजपा की चुनौती

फीचर राजनीति

अजय भट्टाचार्य
मणिपुर
एक ऐसा राज्य कहा जा सकता है जहाँ सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगी एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं। सरकार में शामिल नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) इस बार राज्य की 70 फीसदी सीटों पर चुनाव लड़ रही है और गठबंधन की मुख्य घटक भारतीय जनता पार्टी पूरी 60 सीटों पर चुनाव मैदान में है। उपमुख्यमंत्री युमनाम जॉय कुमार सिंह एनपीपी से हैं और उनकी चुनावी रैलियों में भाजपा ही सबसे ज्यादा निशाने पर रहती है, जो गठबंधन सरकार का नेतृत्व करती है और सिंह जिसमें शामिल हैं। इसलिये एक राज्य के मुख्यमंत्री का दूसरे राज्य में प्रचार करना भले ही एक नया विचार न लगे, लेकिन मेघालय के मुख्‍यमंत्री कॉनराड संगमा का मामला काफी अनोखा है। मेघालय के मुख्यमंत्री भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के खिलाफ प्रचार करने के लिए मणिपुर के चार दिवसीय दौरे पर हैं, जिसमें उनकी पार्टी एनपीपी भी शामिल है। मणिपुर में एनपीपी ने 2017 में केवल नौ सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें उसने चार सीटें जीतीं थीं। यह सभी दलों के बीच सबसे अच्छा स्ट्राइक रेट था और पार्टी किंगमेकर के रूप में उभरी थी। एनपीपी के समर्थन के बिना भाजपा गठबंधन सरकार नहीं बना पाती। एनपीपी इस बार 60 सीटों वाली विधानसभा के लिए 42 सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है, जो पिछली बार की तुलना में करीब पांच गुना ज्यादा है। इनमें से 19 भाजपा नेता हैं, जिन्होंने टिकट न मिलने के बाद पाला बदल लिया। भाजपा प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद भाजपा में उठा बवंडर थमता भी नही नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री व भाजपा नेता एन. बीरेन सिंह एक सप्ताह से असंतुष्टों को मनाने करने के लिए काम कर रहे हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि भाजपा को 16 सीटों पर गंभीर असंतोष का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा में शामिल 16 विधायकों में से कम से कम 10 पूर्व कांग्रेस नेताओं को मणिपुर में टिकट मिला है। इसलिये एक सप्ताह के अन्तराल के बाद बीरेन सिंह जब चुनाव प्रचार में वापस लौटे तब कांग्रेस पर बरस पड़े। राज्‍य में तीन हफ्ते में होने वाले मतदान को देखते हुए उनका एक सप्‍ताह का ब्रेक बेहद असामान्य है। उन्होंने नामांकन दाखिल करने के बाद खुराई निर्वाचन क्षेत्र से अपने चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए कहा कि कांग्रेस के प्रचार के सभी वादे प्रोपेगेंडा हैं। भाजपा निश्चित रूप से वापसी करेगी। कांग्रेस के घोषणा पत्र पर मुख्यमंत्री ने कहा, “घोषणापत्र व्यावहारिक होना चाहिए, लेकिन उनका घोषणापत्र प्रोपेगेंडा है। हमारा घोषणापत्र व्यावहारिक होगा। इसे आसानी से लागू किया जा सकता है अन्यथा वे सिर्फ झांसा दे रहे हैं।” इस बीच, कांग्रेस ने सरकार पर अपने तीखे हमलों में कोई कसर नहीं छोड़ी। मणिपुर के कांग्रेस प्रभारी भक्त चरण दास ने कहा कि 12 विधायकों को लाभ के पद के आरोप में अयोग्य ठहराए जाने के बावजूद उन्होंने सत्ता का दुरुपयोग किया और पांच साल तक सरकार में बने रहे।
बीते सप्ताह में अधिकांश 61 वर्षीय बीरेन सिंह जनता की नज़रों से दूर ही रहे। उनकी लड़ाई सिर्फ कांग्रेस के साथ नहीं रही है। पिछले हफ्ते भाजपा ने मणिपुर के लिए सभी 60 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा की थी, जिसके बाद टिकट पाने की उम्मीद करने वालों के समर्थकों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध ने पार्टी के लिए संकट पैदा कर दिया। तीन मौजूदा विधायकों समेत कई नेताओं ने पाला बदल लिया है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि संगमा मणिपुर में अपनी पार्टी के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। sकांग्रेस 2017 में 28 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, लेकिन बाद में कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ), नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी), लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) और निर्दलीय उम्मीदवार के साथ चुनाव के बाद गठबंधन के चलते भाजपा सरकार बनाने में सफल रही। मणिपुर में दो चरणों में 27 फरवरी और 3 मार्च को मतदान होगा। परिणाम 10 मार्च को आएंगे।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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