जिसके शब्दों ने आजादी के मतवालों के सीने में आग भर दिए थे, ऐसे वीर स्वतंत्रता सेनानी प्रयाग नारायण शुक्ल की सौंवीं जयंती पर कोटि कोटि नमन

लेख समाचार

विजय यादव
वर्ष
1938 जब देश के भीतर स्वतंत्रता के मतवाले एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे थे। ब्रिटिश सरकार को सिर्फ देश छोड़ने के लिए मजबूर करना भर नही था, बल्कि देश की नई युवा पीढ़ी को साक्षर करने के साथ – साथ अंग्रेजी हुकूमत की ज्यादती के खिलाफ मजदूरों, श्रमिकों के अधिकार को दिलाने की जद्दोजहद चल रही थी।
स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस उस दौरान भारत मां के ऐसे ही वीरों की हौसला अफजाई के लिए देश का भ्रमण कर रहे थे, जो अंग्रेजी हुकूमत के अलावा एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे थे। ऐसे ही एक वीर कवि, साहित्यकार और समाज सुधारक स्वतंत्रता सेनानियों के हौसले को बढ़ाने के साथ नई पीढ़ी को साक्षर करने में जुटे थे।
यह नाम है प्रयाग नारायण शुक्ल का। 1 दिसंबर वर्ष 1922 को उत्तर प्रदेश के उस उन्नाव जिले की भूमि पर जन्मे जहां की मिट्टी को आज भी चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली होने का गर्व है। उन्नाव की इसी पवित्र भूमि से निकले स्व. प्रयाग नारायण शुक्ल अपनी वीर रस की कविताओं से रणबांकुरों का हौसला बुलंद कर रहे थे। इनकी कविताओं और शब्दों में वह ऊर्जा थी , जो अंग्रजी हुकूमत की नींव हिला दी थी।
इसी प्रयाग नारायण शुक्ल की प्रशंसा में भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने मुंबई के मारवाड़ी कमर्शियल हाई स्कूल में एक प्रशंसा पत्र लिखा, जो आज भी इतिहास की गवाही के तौर पर शुक्ला परिवार के पास मौजूद है। उन दिनों प्रयाग नारायण शुक्ल मारवाड़ी कमर्शियल हाई स्कूल की मासिक पत्रिका “निर्झर” का संपादन कर रहे थे। निर्झर का मतलब किसी ऊंचे स्थान से लगातार बहते और निकलते पानी की धारा है। अर्थात झरना, जिसकी हर बूंद खुद पत्थरों, पहाड़ों से टकराते हुए अनगिनत चोटों को सहते हुए लोगों की प्यास बुझाने का काम करती है। इसी तरह प्रयाग नारायण शुक्ल उस समय युवा पीढ़ी को नव चेतना देने का कार्य कर रहे थे।
प्रयाग नारायण शुक्ल के इसी त्याग और तपस्या को देखते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें एक और नाम दिया कवि निर्झर शुक्ल, जिनकी लिखी कविताएं आज भी देश भक्ति के मतवालों के लिए ऊर्जा का वाहक हैं।
प्रयाग नारायण शुक्ल उर्फ निर्झर शुक्ल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से इतने प्रभावित थे कि, उन्होंने अपना पूरा जीवन मां भारती को समर्पित कर दिया।
मजदूरों, श्रमिकों के अधिकारों के लिए उन्होंने यूनियन का निर्माण किया। इसके साथ ही न जाने कितने ऐसे अनगिनत कार्य किए जो गरीबों, कमजोरों की ताकत बनी।
आज इनके पांच पुत्रों प्रकाश, मधुकांत, यशकांत, जयकांत एवं श्रीकांत में दो पुत्र मधुकांत और जयकांत राजनीतिक विरासत को अपने सेवा कार्यों से आगे बढ़ा रहे हैं।
आज स्वर्गीय प्रयाग नारायण शुक्ल की सौंवीं जयंती है, इस अवसर पर मां भारती के वीर सपूत और प्रखर ज्ञाता को कोटि कोटि नमन।

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