वैचारिक युद्ध में दांव पर राष्ट्रीय नायक

फीचर राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
अतिवादी
शक्तियां जब सत्ता में आती हैं तब पूर्व सत्ता के निशान मिटाना उनका पहला लक्ष्य होता है। भारत में 2014 के बाद आजादी देखने वाली सोच और उसके प्रणेता पिछले सात सालों से यही कर रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के स्थापित चेहरों और उनसे जुड़े प्रतीकों को हटाने के क्रम में गाँधी से लेकर नेहरु तक दांव पर लगे हैं। इन्हें ख़ारिज करने का सबसे आसान तरीका इतिहास के सहारे किसी को बड़ा बनाकर दिखाना भी है। इसलिये नेहरु के बरक्स सरदार पटेल और गाँधी का कद छांटने की कवायद में भगतसिंह से लेकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ इतिहास ने न्याय नही किया जैसा जुमला हवा में तैरने लगता है। हर साल 29 जनवरी की शाम को दिल्ली के विजय चौक पर आयोजित होने वाला बीटिंग रिट्रीट समारोह, गणतंत्र दिवस उत्सव के समापन का प्रतीक होता है। लेकिन इस बार बीटिंग रिट्रीट समारोह के समापन का संकेत देने वाले गीत ‘एबाइड विद मी’ की धुन नहीं सुनाई पड़ेगी। सेना में यह गीत सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है जिसे युद्ध में के दौरान दिन के लिए लड़ाई के अंत को चिह्नित करने के लिए बजाया जाता था, जिसमें सैनिक हथियार रखकर युद्ध के मैदान से पीछे हट जाते हैं।
इस लोकप्रिय गीत को हटाने का निर्णय सरकार द्वारा इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति से ‘शाश्वत ज्वाला’ को पास के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में ‘स्थानांतरित’ करने के एक दिन बाद आया है। हालांकि यह माना जाता है कि इंडिया गेट पर मूल लौ बनी रहेगी, जो ‘अज्ञात सैनिक’ का सम्मान करती है, सरकारी सूत्रों ने कहा, “वहां केवल कुछ शहीदों के ही नाम गुदे हैं जो प्रथम विश्व युद्ध और एंग्लो-अफगान युद्ध में अंग्रेजों के लिए लड़े थे और इस प्रकार यह हमारे औपनिवेशिक अतीत का प्रतीक है।.” गौरतलब है कि 74,000 से अधिक भारतीय सैनिक प्रथम विश्व युद्ध में लड़ते हुए मारे गए थे। लेकिन क्या वास्तव में यही सच है? सच यह है वे शहीद उस समय की ब्रिटिश आधारित भारत देश की सेना में थे और इडिया गेट उनके शौर्य का प्रतिक है। बीटिंग रिट्रीट समारोह अपनी औपनिवेशिक विरासत के बावजूद बनी हुई है, लेकिन वह हर पश्चिमी गीत जो इसका हिस्सा रहा उसे आधुनिक भारतीय मार्शल धुनों के लिए हटा दिया गया है। इससे इस समारोह के मूल स्वरूप में बदलाव हो रहा है। अब इस गीत को हटाने के पीछे पाश्चात्य सोच को खत्म करना बताया जा रहा है। तर्क है कि देश में विदेशी कवि के गीत की धुन क्यों बजाई जाये। सच्चाई यह है कि महात्मा गांधी का पसंदीदा गीत ‘एबाइड विद मी’, ईश्वर से जीवन और मृत्यु के दौरान वक्ता के साथ बने रहने की प्रार्थना है। यह गीत 1847 में स्कॉटिश लेखक एंग्लिकन हेनरी फ्रांसिस लाइट ने लिखा था। जब उन्होंने यह गीत लिखा था तब वे ट्यूबरकुलोसिस के चलते मौत के बेहद करीब थे। इस साल, छह बैंड के 44 बिगुलर, 16 तुरही और 75 ड्रमर 25 धुनों के साथ ‘सारे जहां से अच्छा’ गीत बतौर समारोह का आखिरी गीत बजाएंगे। बैंड में सेना, नौसेना, वायु सेना के साथ ही केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, और पाइप व ड्रम बैंड शामिल हैं, जो सभी एक सामूहिक बैंड के रूप में भी एक साथ बजाएंगे। यह राष्ट्रपिता की विरासत को मिटाने का एक और प्रयास है। गाँधीजी के खिलाफ टिप्पणी करने वाली साध्वी प्रज्ञा ठाकुर आज सत्ताधारी दल की सांसद हैं। दरअसल इस समय गांधी जी और उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे के विचारों को माननों वालों के बीच ‘वैचारिक युद्ध’ चल रहा है। जिसमें हमारे राष्ट्रीय नायकों का व्यक्तित्व दांव पर लगा है।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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