स्वदेश आने तरसे नेताजी के अवशेष

समाचार

अजय भट्टाचार्य
इस
वर्ष 15 अगस्त को भारत अपनी आजादी के 75 साल पूरे कर चुका है। इस मौके पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधन में प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी ने स्वभावतः या जानबुझकर पं. जवाहरलाल नेहरु का तो नाम नहीं लिया अलबत्ता नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जिक्र किया। विडंबना यह है कि आजाद भारत अब तक आजादी की सशस्त्र जंग के सबसे बड़े नेता के अवशेषों को भारत नहीं ला सका है या लाने की कोशिश भी नहीं की है। नेता जी के अवशेष टोक्यो के रेनकोजी मंदिर में रखे हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस फाफ के अनुसार उनके पिता के अवशेषों को भारत वापस लाने का समय आ गया है। एक बयान में उन्होंने ये सुझाव दिया है कि नेताजी के अवशेषों का डीएनए परीक्षण उन लोगों को जवाब दे सकता है जिन्हें 18 अगस्त, 1945 को उनकी मृत्यु के बारे में अभी भी संदेह है। जर्मनी में रहनी वाली ऑस्ट्रियाई मूल की अर्थशास्त्री अनीता बोस फाफ नेताजी की इकलौती संतान हैं। टोक्यो के रेनकोजी मंदिर में रखे गए अवशेष नेताजी के हैं और जापानी सरकार इस तरह की प्रक्रिया के लिए सहमत हो गई है, उनका कहना है कि चूंकि उनके पिता आजादी की खुशी का अनुभव करने के लिए जीवित नहीं थे, इसलिए समय आ गया है कि कम से कम उनके अवशेष भारतीय धरती पर लौट सकें। मंदिर के पुजारी और जापानी सरकार इस तरह के परीक्षण के लिए सहमत हुए, जैसा कि नेताजी की मौत (न्यायमूर्ति मुखर्जी जांच आयोग) की अंतिम सरकारी भारतीय जांच के दस्तावेजों में दिखाया गया है, तो हम अंत में उन्हें घर लाने की तैयारी करें! नेताजी के लिए उनके जीवन में उनके देश की आजादी से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं था। विदेशी शासन से मुक्त भारत में रहने से ज्यादा कुछ भी नहीं था! अब समय आ गया है कि कम से कम उनके अवशेष भारत की धरती पर लौट सकें।” नेताजी की मृत्यु आज भी लोगों के लिए किसी रहस्य से कम नहीं, माना जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी। जबकि दो जांच आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि 18 अगस्त, 1945 को ताइपे में एक विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई थी। जबकि न्यायमूर्ति एम के मुखर्जी की अध्यक्षता वाले तीसरे जांच पैनल ने इसका विरोध किया था और ये दावा किया था कि बोस उसके बाद भी जीवित थे। फाफ कहती हैं, “नेताजी की इकलौती संतान के रूप में मैं यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हूं कि उनकी सबसे प्रिय इच्छा, अपने स्वतंत्रत देश में लौटने की, आखिरकार इस रूप में पूरी हो और उन्हें सम्मानित करने के लिए उचित समारोह किया जाएगा।” देशवासियों ने उनके समर्पण और उनके बलिदान के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। उन्होंने उनके लिए कई स्मारकों का निर्माण किया, इस प्रकार उनकी स्मृति को आज तक जीवित रखा। भारत में कुछ पुरुषों और महिलाओं ने नेताजी के प्रति उनकी प्रशंसा और प्रेम से प्रेरित होकर न केवल उन्हें याद किया बल्कि आशा व्यक्त की कि उनकी मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को नहीं हुई थी। जापान ने टोक्यो के रेनकोजी मंदिर में उनके अवशेषों को एक ‘अस्थायी’ घर प्रदान किया है, जिनकी देखभाल की जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.