कभी जिसके अध्यक्ष स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस रहे अब उसी कांग्रेस की अध्यक्षता मल्लिकार्जुन खड़गे करेंगे

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नई दिल्ली। आज देश की 137 साल पुरानी पार्टी कांग्रेस का नेतृत्व किसी गैर गांधी परिवार ने संभाल लिया। मल्लिकार्जुन खड़गे की आज कांग्रेस अध्यक्ष पद पर ताजपोशी हो गई। कभी इसी पार्टी के अध्यक्ष देश के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस रहे। देश की आजादी में अपनी अग्रणी भूमिका निभाने वाली पार्टी को 24 साल बाद गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष मिला है।
कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड पर बुधवार सुबह आयोजित कार्यक्रम में पार्टी चुनाव प्राधिकरण के प्रमुख मधुसूदन मिस्त्री ने कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में जीत का प्रमाणपत्र मल्लिकार्जुन खड़गे को सौंपा। इसके बाद कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी औपचारिक तौर पर पार्टी अध्यक्ष की कमान खड़गे को सौंप दी।


मल्लिकार्जुन खड़गे की यह राह बहुत आसान नहीं है। अध्यक्ष बनने के साथ ही कई चुनौतियां भी उनके सामने खड़ी हैं। खड़गे ऐसे समय में अध्यक्ष चुने गए हैं जब देश के कई राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव सामने हैं। कांग्रेस कई राज्यों में अपना जनाधार खो चुकी है, ऐसे में उनके सामने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दोबारा अपने जनाधार को पाना होगा और कांग्रेस को एकजुट करने का चैलेंज है।
भारत जोड़ो यात्रा के तीन दिन के दीवाली ब्रेक में 48 दिनों बाद पहली बार दिल्ली आए पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए। अध्यक्ष पद संभालने से पहले खड़गे ने राजघाट पर महात्मा गांधी, शांति वन में जवाहरलाल नेहरु व शक्ति स्थल पर इंदिरा गांधी तथा वीर भूमि पर जाकर राजीव गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की।
कर्नाटक के दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले 80 वर्षीय खड़गे ने 17 अक्टूबर को हुए ऐतिहासिक चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी 66 वर्षीय थरूर को मात दी थी। पार्टी के 137 साल के इतिहास में छठी बार अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ था।

सुभाष चन्द्र बोस और कांग्रेस

1938 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हरिपुरा में होना तय हुआ। इस अधिवेशन से पहले गांधी जी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष चन्द्र बोस को चुना। यह कांग्रेस का 51 वाँ अधिवेशन था। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत 51 बैलों द्वारा खींचे हुए रथ में किया गया।

इस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का अध्यक्षीय भाषण बहुत ही प्रभावी हुआ। किसी भी भारतीय राजनीतिक व्यक्ति ने शायद ही इतना प्रभावी भाषण कभी दिया हो। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में सुभाष ने योजना आयोग की स्थापना की। जवाहरलाल नेहरू इसके पहले अध्यक्ष बनाये गये। सुभाष चन्द्र बोस ने बंगलौर में मशहूर वैज्ञानिक सर विश्वेश्वरय्या की अध्यक्षता में एक विज्ञान परिषद की स्थापना भी की।

1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण कर दिया। सुभाष की अध्यक्षता में कांग्रेस ने चीनी जनता की सहायता के लिये डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस के नेतृत्व में चिकित्सकीय दल भेजने का निर्णय लिया। आगे चलकर जब सुभाष ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में जापान से सहयोग किया तब कई लोग उन्हे जापान की कठपुतली और फासिस्ट कहने लगे। मगर इस घटना से यह सिद्ध होता हैं कि सुभाष न तो जापान की कठपुतली थे और न ही वे फासिस्ट विचारधारा से सहमत थे।
इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे। नेताजी चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत का स्वतन्त्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाये। उन्होंने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में इस ओर कदम उठाना भी शुरू कर दिया था परन्तु गांधीजी इससे सहमत नहीं थे।

1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का समय आया तब सुभाष चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बनाया जाये जो इस मामले में किसी दबाव के आगे बिल्कुल न झुके। ऐसा किसी दूसरे व्यक्ति के सामने न आने पर सुभाष ने स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष बने रहना चाहा। लेकिन महात्मा गांधी उन्हें अध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे। गांधी जी ने अध्यक्ष पद के लिये पट्टाभि सीतारमैया को चुना। कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गान्धी को पत्र लिखकर सुभाष को ही अध्यक्ष बनाने का निवेदन किया। प्रफुल्लचन्द्र राय और मेघनाद साहा जैसे वैज्ञानिक भी सुभाष चन्द्र बोस को ही फिर से अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते थे। लेकिन गांधी जी ने इस मामले में किसी की बात नहीं मानी। कोई समझौता न हो पाने पर बहुत बरसों बाद कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद के लिये चुनाव हुआ।

सब समझते थे कि जब महात्मा गान्धी ने पट्टाभि सीतारमैय्या का साथ दिया है तब वे चुनाव आसानी से जीत जायेंगे। लेकिन वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को चुनाव में 1580 मत और सीतारमैय्या को 1377 मत मिले। गांधी जी के विरोध के बावजूद सुभाषबाबू 203 मतों से चुनाव जीत गये। मगर चुनाव के नतीजे के साथ बात खत्म नहीं हुई। ने पट्टाभि सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वें सुभाष के तरीकों से सहमत नहीं हैं तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया।
1939 का वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ। इस अधिवेशन के समय सुभाषबाबू तेज बुखार से इतने बीमार हो गये थे कि उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाकर अधिवेशन में लाना पड़ा। गांधी जी स्वयं भी इस अधिवेशन में उपस्थित नहीं रहे और उनके साथियों ने भी सुभाष को कोई सहयोग नहीं दिया। अधिवेशन के बाद सुभाष ने समझौते के लिए बहुत कोशिश की लेकिन गान्धीजी और उनके साथियों ने उनकी एक न मानी। परिस्थिति ऐसी बन गयी कि सुभाष कुछ काम ही न कर पाये। आखिर में तंग आकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

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