ऑपरेशन लोटस और गुजरात कनेक्शन

मुंबई राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
महाराष्ट्र
की राजनीति विशेषकर शिवसेना में भूचाल ला देने वाले एकनाथ शिंदे अपने समर्थक विधायकों के साथ भले ही सूरत से गुवाहाटी पहुँच गये हों मगर इस बगावत का बीजारोपण गुजरात के नाम ही रहेगा। दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार की मानें तो हर बागी विधायक को 35-35 करोड़ रूपये और सीबीआई/ईडी/आयकर से अभयदान दिया गया है। दिलचस्प बात यह है कि सूरत के होटल के कमरे 20 जून की शाम को ही बुक किए गए थे, जिस दिन विधान परिषद चुनाव हुआ था। इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा पर्दे के पीछे से सक्रिय थी, है और रहेगी। यदि ऐसा नहीं है सूरत के ला मेरेडियन होटल में गुजरात पुलिस किसके कहने पर तैनात थी। रात को जिस चार्टर्ड विमान से सभी बागी विधायकों को गुवाहाटी ले जाया गया तो वहां कमरे किसने बुक किये और सुबह होटल में विधायकों की सुरक्षा आदि की निगरानी करने खुद असम के मुख्यमंत्री वहां क्या कर रहे थे?

गुजरात से छनकर आ रही खबरों में मुताबिक उद्धव ठाकरे के खिलाफ शिंदे की बगावत के पीछे गुजरात भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटिल का हाथ है। पाटिल लंबे समय से महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन लोटस’ को अंजाम देने के लिए शिंदे के संपर्क में हैं। जलगांव के रहने वाले पाटिल शिवसेना के कुछ विधायकों के भी संपर्क में हैं। इन विधायकों में परोला से चिमनराव पाटिल और मराठा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले पचोरा से किशोर पाटिल शामिल हैं। इस कड़ी ने पाटिल को शिंदे और शिवसेना के अन्य असंतुष्ट विधायकों से जुड़ने में मदद की। यह राज्यसभा चुनाव और महाराष्ट्र राज्य विधान परिषद चुनावों से पहले शिवसेना के वोटों को भाजपा को हस्तांतरित करने की योजना बनाई गई थी। दिलचस्प बात यह है कि शिंदे और उनके समर्थक विधायकों के आने के बाद पाटिल ने अपनी सभी निर्धारित बैठकें रद्द कर दीं। वह अहमदाबाद में थे और फिर वे सूरत के लिए रवाना हो गए। इसके अलावा, गुजरात पुलिस ने उस होटल में भी भारी सुरक्षा तैनात की जहां शिवसेना के विधायक डेरा डाले हुए थे।

शिवसेना के बागी विधायकों में से एक ने कहा कि उन्हें नई सरकार में कैबिनेट पद का वादा किया गया है। उन्होंने कहा कि ठाकरे सरकार में वह सबसे वरिष्ठ थे लेकिन फिर भी उनकी उपेक्षा की गई। शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार केंद्रीय एजेंसियों की जांच के घेरे में आए पार्टी नेताओं और विधायकों ने शिंदे को शिवसेना नेतृत्व के खिलाफ यह कदम उठाने और भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। शिवसेना विधायक प्रताप सरनाइक और बीएमसी की स्थायी समिति के पूर्व अध्यक्ष यशवंत जाधव भाजपा नेताओं और शिंदे के साथ समन्वय करने के लिए दिल्ली में थे।

विद्रोह के पीछे एक अहम कारण यह भी है कि शिवसेना के ग्रामीण विधायकों और शहरी विधायकों के बीच संवाद की खाई बढ़ गई। सत्ता शहरी चेहरों के साथ केंद्रित थी जिसने ग्रामीण शिवसेना विधायकों को नाराज कर दिया। इसके अलावा, उद्धव ठाकरे आसानी से सुलभ नहीं थे। फंड आवंटन के दौरान, राकांपा नेता अजीत पवार निर्णय लेने में हावी रहे, जो शिवसेना के विधायकों के साथ अच्छा नहीं रहा।

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