अन्धेरे में उजाला फैलाने का मंसब मिला पैगंबर ए इस्लाम को

इस्लाम के पन्ने से

मक्का में बीवी खदीजा एक बड़ी अमीर औरत थीं । लोग उनकी बड़ी इज्ज़त किया करते थे , उनका बड़ा व्यापार था । अपने रुपये से लोगों को तिजारती सफर पर भेजतीं । मुनाफ़ा में उनको भी साझी बनाती ।

प्यारे नबी की सच्चाई की मक्के में बड़ी चर्चा थी । लोग आपको अमीन कह कर पुकारते थे । आपकी सच्चाई और ईमानदारी की चर्चा सुनी तो बीवी खदीजा ने ख़्वाहिश की कि आप उनका तिजारती माल लेकर सफ़र करें । पचीस साल के थे जब आप बीबी ख़दीजा के गुलाम ‘ मैसरा ‘ के साथ सन् 565 में शाम के सफ़र पर रवाना हुए । आपने ऐसी मेहनत , सूझबूझ और ईमानदारी से काम किया कि पहले से कहीं ज़्यादा मुनाफ़ा हुआ । बीबी खदीज़ा पर इसका बड़ा असर पड़ा । वह बहुत खुश हुईं । जितना तय हुआ था उससे ज्यादा आपको दिया । शाम के सफ़र से लौटे । ‘मैसरा’ ने आपकी ईमानदारी , कारोबार में होशियारी , सच्चाई , हर एक के साथ हमदर्दी , प्रेम और इनसानियत का आंखों देखा हाल बयान किया ।

बीबी खदीजा ने विवाह का सन्देश भेजा । आप राज़ी हो गये । दिन और वक्त तय हुआ । आप बीबी खदीजा के घर पहुंचे । चचा अबू तालिब भी साथ थे । सादगी के साथ शादी हो गयी । क़ुरैश के बड़े – बड़े सरदार मौजूद थे । हज़रत अबूबक्र भी उसमें शामिल थे । शादी के वक्त आपकी उम्र पचीस साल थी । और बीबी खदीजा की चालीस साल । उनकी दो शादियां पहले भी हो चुकी थीं । दोनों शौहर फौत चुके थे ।

आपकी अच्छी आदतों की मक्के में चर्चा थी । आप सदा सच बोलते थे । लोग अपनी अमानत आपके पास रख जाते , आप उन की अमानत ज्यों की त्यों लौटाते । आप ने कभी शराब न पी । बुतों की पूजा न की । मेलों – ठेलों और त्योहारों में न गए । गए तो बुरी बातों के पास न फटके । वालिद ने थोड़ी पूंजी जोड़ी थी । बकरियां चराई , तिजारत की । अपनी रोज़ी मेहनत और मशक़्क़त से कमाई । खुदा का शुक्र अदा किया ।

मक्के के नजदीक ‘ हिरा ‘ नाम की एक पहाड़ी है । आप घर से सत्तू पानी लेते । उसी पहाड़ी की एक गुफा में चले जाते । कई – कई दिन तक वहां रहते । अल्लाह की इबादत करते । फिर घर आते , सत्तू – पानी लेते और लौट जाते । एक दिन उसी गुफा में थे । अल्लाह ने अपना फ़रिश्ता भेजा , उस फ़रिश्ते का नाम जिब्रील है । जिब्रील अल्लाह का संदेशा लाए । यह सन्देशा क्या था , अल्लाह का कलाम | रमज़ान की सत्तरह तारीख थी , अंग्रेज़ी हिसाब से छ : अगस्त सन् 610 ईस्वी । आपकी उम्र उस वक्त चालीस साल की थी । पहले वह सूरः उतरी जिसका पहला लफ़्ज़ ‘इकरा’ है और जिसका नाम सूरःअलक़ है ।

क़ुरआन पाक क्या है , एक रोशनी है , सीधा रास्ता दिखाने के लिए , अच्छाई – बुराई पहचानने के लिये , दुनिया के सुधार का सामान करने के लिए , इंसानों को ज़िंदगी गुज़ारने का पूरा क़ानून देने के लिए ।

इस तरह आपको नुबूवत मिली । आप भटके हुओं को राह दिखाने लगे , अन्धेरे में उजाला फैलाने लगे । यह उजाला घर वालों के लिए भी था , बाहर वालों के लिए भी , अपने खानदान , अपने ही देश नहीं , सारे संसार के लिए था , सब इंसानों के लिए था।

प्रस्तुतकर्ता – रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब का नाम- क़ससुल अंबिया

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