Punjab Election 2022 : चतुष्कोण में पांचवां कोण

फीचर राजनीति

अजय भट्टाचार्य
अगले
साल 2022 में होने वाला पंजाब विधानसभा चुनाव चतुष्कोणीय होने के पूरे आसार है। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की इंट्री ने इस संभावना को मूर्त रूप दे दिया है। कैप्टन ने आखिरकार भाजपा का दामन थाम लिया है। उनकी पंजाब लोक कांग्रेस सुखदेव सिंह ढ़ीढसा को भी साथ लेकर मैदान में उतरेगी। ढींढसा की पार्टी का नाम शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) है। इस तरह से पंजाब में पहली बार चुनाव चौतरफा लडा जाएगा। एक तरफ कांग्रेस तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी, तीसरी तरफ शिरोमणि अकाली दल और बसपा तो चौथी तरफ होगी भाजपा, कैप्टन और ढ़ीढसा की तिकड़ी। पिछले चुनाव में 117 सीटों वाली पंजाब विधान सभा में कांग्रेस 77 सीटों के साथ 38.64 फीसदी वोट लेकर सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। लोक इंसाफ पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लड़ने वाली ‘आप’ 23.80 फीसदी वोट लेकर 2+20 सीटों पर जीती थी जिसमे लोक इंसाफ पार्टी को 2 सीट औरि 1.2 फीसदी वोट मिले थे। जबकि शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन को 18 सीटें मिली थी जिसमें से अकाली दल को 15 सीट और 25.2 फीसदी तो भाजपा को 3 सीट और 5.4 फीसदी वोट मिले थे। अब ताजा हालत में चुनावी परिस्थिति काफी बदल गई है। कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी के रूप में एक दलित को मुख्यमंत्री की कमान सौंपी है। अकाली और भाजपा अलग हो चुके हैं और अब अकाली दल अब बसपा के साथ है। जिसने सत्ता में आने पर दलित उपमुख्यमंत्री बनाने की बात कही है पंजाब में 2017 में बसपा को 1.5 फीसदी वोट मिले थे। यह पहली बार होगा जब राज्य में भाजपा बड़े की भूमिका में होगी और कैप्टन-ढींढसा उसके पिछलग्गू। अभी तक भाजपा पंजाब में 25 सीटों के आसपास ही लड़ती रही है।

2017 में अकाली दल ने भाजपा को 23 सीटें दी थी जिसमें से 3 सीट पठानकोट,फजिल्का और कपूरथला ही जीत पाई थी। यानि भाजपा के लिए पंजाब चुनाव पहाड चढने जैसा है। भले ही सरकार ने कृषि कानून वापिस ले लिया है लेकिन साल भर चले आंदोलन और उसमें जान गवांए किसानों की टीस पंजाब भूला नहीं है। दूसरी ओर पंजाब की मौजूदा कांग्रेस सरकार ने 400 के करीब किसानों को मुआवजा दे दिया है। कांग्रेस अपनी भीतरी जंग से जूझ रही है। पंजाब की चुनावी बिसात पर एक खिलाड़ी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी हैं। 2017 में उनकी आम आदमी पार्टी को 20 सीटों के साथ 23.80 फीसदी वोट मिले थे जो की अकाली दल से 2 फीसदी ही कम है। यही वजह है कि अरविंद केजरीवाल हर तीसरे दिन पंजाब में गुजार रहे हैं। घोषणाओं की बरसात कर रहे हैं।

केजरीवाल को लगता है कि यह चुनाव आम आदमी पार्टीके लिए जीवन मरण का प्रश्न हैं क्योंकि उनके कई विधायक छोड़ चुके हैं। भगवंत मान खुद को मुख्यमंत्री पद के दावेदार ना घोषित किए जाने से नाराज बताए जा रहे हैं। अकाली दल खुद को सबसे पहले कृषि कानून को लेकर एनडीए छोड़ने की बात जनता को बता रही है साथ ही पंजाब की पार्टी होने का भी दांव खेलती रही है। इस चौखाने में पांचवां कोना किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने अपनी ‘संयुक्त संघर्ष पार्टी’ बनाकर खोल दिया है जिससे पंजाब का चुनावी खेल फ़िलहाल विश्लेषकों की समझ से बाहर है। कैप्टन का खेमा निश्चित ही कांग्रेस का नुकसान करेगा मगर इससे भाजपा को लाभ हो, यह भी निश्चित नहीं है। अथवा कैप्टन अकाली दल या आप के वोट में सेंध लगाऐगें। मतलब साफ है कैप्टन और भाजपा के वोट प्रतिशत पर बाकी दलों का भविष्य तय होगा।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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