औरंगाबाद में कठपुतली नाद

फीचर राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
परसों
औरंगाबाद में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना अध्यक्ष राज ठाकरे की लाउडस्पीकर सभा को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि उनके इस बदले हुए तेवर के निहितार्थ क्या हैं? पिछले विधानसभा और मनपा चुनाव में लगभग सिमट चुकी पार्टी में नई जान फूंकने के लिए ही क्या यह लाउड स्पीकर ब्रांड राजनीति उनके लिए जरूरी है! दरअसल महाराष्ट्र में जल्द ही 15 नगर निगमों और 27 नगर पालिकाओं के चुनाव होने हैं। इन चुनावों को 2024 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव से पहले का पूर्वाभ्यास माना जा रहा है। इनमें शिवसेना को सबक सिखाने के लिए भारतीय जनता पार्टी कमर कस रही है। क्योंकि शिवसेना ने पिछला चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ा था। लेकिन सरकार कांग्रेस-एनसीपी के साथ बनाई। लिहाजा शिवसेना के खिलाफ मनसे को खड़ा करने में भाजपा अपनी ताकत लगा रही है। बीते महीने महाराष्ट्र के कद्दावर भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने राज ठाकरे से उनके शिवाजी पार्क, मुंबई स्थित घर पर जाकर मुलाकात की थी। पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उनकी पत्नी अमृता भी राज ठाकरे से मुलाकात कर चुके हैं। यह नजदीकियां अचानक नहीं बढ़ी हैं। मुंबई महानगर पालिका पर कब्जा करने का मंसूबा पाले भाजपा हर तरह की जुगाड़ में लगी है। एक तरफ मुम्बई में भाजपा की पूरी मशीनरी पोल-खोल कार्यक्रम के बहाने शिवसेना पर हमलावर है दूसरी तरफ कथित हिंदुत्व के लिए राज ठाकरे के कंधों पर सवार होकर शिवसेना की हिंदुत्व संबंधी छवि को भी निशाने पर लेना चाहती है।
यहां राज ठाकरे की औरंगाबाद रैली से कुछ खास बातें और गौर करने लायक हैं। रैली के लिए औरंगाबाद का चुनाव यही दर्शाता है कि मुंबई, ठाणे के बाहर यह शहर शिवसेना के सर्वाधिक प्रभाव वाले इलाकों में गिना जाता है। इस शहर का नामकरण मुगल शासक औरंगजेब के नाम पर हुआ है। राज ठाकरे कहते हैं कि शिवाजी के सबसे बड़े पुत्र संभाजी के नाम पर इस शहर को संभाजीनगर कहा जाए। यह मांग उठाने से पहले राज ठाकरे या तो भूल गये या जान बुझकर इस सत्य को छिपा गये कि उनसे पहले शिवसेना वर्षों से औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने की मांग करती आ रही है। यहाँ तक कि शिवसेना के मुखपत्र सामना में औरंगाबाद को संभाजीनगर ही लिखा जाता है। इस रैली की दूसरी खास बात यह थी कि राज ठाकरे अपने चाचा और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के अंदाज में नजर आए। उन्हीं की तरह कंधे पर भगवा शॉल और भाषण शैली भी वैसी ही। इसका जवाब रैली से पहले ही वर्तमान शिवसेना अध्यक्ष व राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे यह कहकर दे चुके हैं कि बाला साहेब की नकल करके कोई (अर्थात राज ठाकरे) शिवसेनाप्रमुख नही बन सकता। सच भी यही है कि बालासाहब ठाकरे होना और बालासाहेब ठाकरे जैसा दिखना दो अलग-अलग ध्रुव सत्य हैं। राज ठाकरे गलतफहमी में हैं कि भाजपा की बैसाखी के बूते वे बालासाहब का रुतबा हासिल कर लेंगे। इसको इसी बात से समझा जा सकता है कि राज ठाकरे को छोडकर राजनीति के हर सामान्य जानकार को यह पता है कि उनकी वर्तमान राजनीति की दशा-दिशा कहाँ, कौन, कब, कैसे और क्यों तय कर रहा है। जबकि बालासाहेब जो बोलते, करते, सोचते थे महाराष्ट्र सहित देश की राजनीति उस पर बहस करती थी। इसी रैली के आसपास मुंबई में शिवसेना भवन के सामने राज ठाकरे की पार्टी के लोगों ने एक बड़ा सा बैनर लगाया था जिसमे बाला साहेब ठाकरे को संबोधित करते हुए लिखा, ‘देखिए आपका बेटा क्या कर रहा है। हिंदू होकर हिंदुओं के लाऊडस्पीकर हटवा रहा है। उन्हें हनुमान चालीसा बजाने से रोक रहा है। इस बैनर की भाषा राज ठाकरे से ज्यादा भाजपा के आईटी सेल की भाषा से मेल खाती है। मुंबई और महाराष्ट्र की जनता इतनी भोली नहीं है कि इस चालाकी को न समझ रही हो। भाजपा चाहकर भी बालासाहेब की नीति-रीति पर सवाल खड़ा करने से अगर बचती है तो उसका एक मात्र कारण यह है कि अब भी बालासाहेब के प्रति महाराष्ट्र की जनता में आदर की भावना जस की तस है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि बालासाहेब को लक्ष्य कर शिवसेना पर हमला उसे और पीछे धकेल देगा। इसलिए राज ठाकरे हों या राणा दंपति, एक कठपुतली के सिवा अन्य कुछ भी नहीं हैं।

( लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। दोपहर का सामना समाचार पत्र के नियमित स्तंभकार हैं।)

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