ममता की साख पर सवाल

समाचार

अजय भट्टाचार्य
पश्चिम
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की शुक्रवार से शुरू चार दिवसीय दिल्ली परिक्रमा से विपक्ष की राजनीति में हलचल बढ़ गई है। कांग्रेस और वाम दल ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात को लेकर ‘मैच फिक्सिंग’ जैसे दावे कर रहे हैं। पार्टियां तृणमूल कांग्रेस पार्टी सुप्रीमो के इस दौरे को प्रवर्तन निदेशालय की हालिया कार्रवाई से जोड़ रही हैं। प्रधानमंत्री आवास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी की मुलाकात करीब एक घंटे तक चली। तृणमूल की तरफ से इस मुलाकात को लेकर कहा जा रहा है कि इस मुलाकात के ममता बनर्जी ने मोदी से राज्य के वस्तु एवं सेवा कर के बकाये सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। ममता रविवार 7 अगस्त को नीति आयोग की बैठक में भी शामिल होंगी। प्रधानमंत्री मोदी इस दिन नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक की अध्यक्षता करेंगे, जिसमें कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। मोदी से मुलाकात से पहले ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के सांसदों से दिल्ली में मुलाकात की। इसमें संसद के मौजूदा सत्र और 2024 के लोकसभा चुनावों को लेकर चर्चा की। ममता और मोदी की मुलाकात को बंगाल कांग्रेस के प्रवक्ता रित्जू घोषाल ने मैच फिक्सिंग करार दिया है और कहा कि यह मैच फिक्सिंग 2016 बंगाल विधानसभा चुनाव से जारी है। ईडी ने कोयला घोटाला मामले में अभिषेक बनर्जी से केवल दो बार पूछताछ की है। जबकि, सोनिया गांधी और राहुल से बगैर किसी आधार के नेशनल हेराल्ड मामले में हर रोज परेशान किया जा रहा है। कांग्रेस को कमजोर करने के लिए भाजपा तृणमूल जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को मजबूत कर रही है। तृणमूल ने गोवा और त्रिपुरा में चुनाव केवल विपक्षी दलों को बांटने के लिए लड़े थे। जबकि माकपा के बंगाल सचिव मोहम्मद सलीम के अनुसार यह मीटिंग मैच फिक्सिंग व्यवस्था का हिस्सा है, जो सालों से चल रही है। यह कहा जा रहा है कि बनर्जी, मोदी से राज्य की मांगों को लेकर चर्चा करना चाहती हैं। इस मामले में आमने-सामने की बैठक क्यों? नौकरशाहों को मौजूद रहना चाहिए। इससे पहले सचिव स्तरीय बैठक होनी चाहिए। यह सभी सैटिंग का हिस्सा है। जनता को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। मजा यह है कि जिस भाजपा के साथ ममता की पर्दे के पीछे से मैच फिक्सिंग की बात की जा रही है उस भाजपा के ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं कि बनर्जी हमेशा प्रधानमंत्री के साथ बैठक का फायदा उठाती हैं। वह लोगों को बताती हैं कि उन्होंने सभी परेशानियों को ठीक कर दिया है। हम उम्मीद करते हैं केंद्र उनकी योजनाओं में मदद नहीं करेगा। भाजपा के बंगाल प्रमुख सुकांत मजूमदार ने कहा कि यह बैठक बनर्जी के लिए किसी तरह से मददगार नहीं होगी। दरअसल ममता बनर्जी ने जब से खुद और खुद की पार्टी को भाजपा के खिलाफ देशव्यापी मंच बनाने की घोषणा की है तभी से यह सवाल उठ रहा है कि क्या बिना कांग्रेस के ऐसा कोई प्रयोग भाजपा के खिलाफ सफल हो सकता है! राष्ट्रपति चुनाव से लेकर उपराष्ट्रपति चुनाव तक ममता के व्यवहार ने सभी राजनीतिक विश्लेषकों को अचंभित ही किया है। एक तरफ वे समूचे विपक्ष को एक साथ लाने की कवायद करती दीखती हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस सहित अन्य दलों जैसे आम आदमी पार्टी आदि से ध्न्ग्का समन्वय भी नहीं कर पातीं। ऐसे में केन्द्रीय सत्ता प्रतिष्ठान के विरुद्ध मजबूत विपक्षी गठबंधन की अवधारणा की ही भ्रूण हत्या हो जाती है। दक्षिणी राज्य तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर अपने स्तर पर लगे हैं। मायावती की पार्टी अपना अलग सुर बरकरार रखे हुए है। मतलब साफ है कि विपक्षी एकता की कोशिश में जुटी ममता खुद शक के घेरे में हैं कि वे भी भाजपा की ही मदद कर रही हैं। किसी भी राजनेता के व्यवहार और चरित्र पर जब अविश्वास का ठप्पा चस्पां हो जाता है तो उसकी सफलता भी संदिग्ध हो जाती है। ममता की साख पर उठते सवाल यही संकेत देते हैं।

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