इस्लाम लाने वालों पर कुरैश के अत्याचार बढ़ते गए

इस्लाम के पन्ने से

इस तरह कुरैश के यह दो मौकिफ ( दृष्टि कोण ) हो गए थे कि एक तरफ तो बाज़ लोग आहिस्ता आहिस्ता इस्लाम कुबूल करते जाते थे , दूसरी तरफ वह लोग थे जो अपनी बड़ाई या खानदानी उत्तमता के एहसास से काम लेते थे , इनकार करते थे और बिला सोचे गौर किये मुसलमान होने वालों पर गुस्सा करते और उन पर हर तरह दबाव डालते , तकलीफ पहुंचाते कि वह खानदान के राएज तरीके की तरफ लौट आएं , और मक्का में जो कुरैशी न थे बल्कि बाहर के होने की वजह से कमज़ोर हैसियत के थे , उनको तो सख़्त जुल्म का निशाना बनाया जाता था यहां तक कि बाज़ बाज़ की उस जुल्म की वजह से मौत भी हो गई ।

हज़रत बिलाल रज़िअल्लाहु अन्हु हबशी थे , उमय्या बिन ख़लफ़ के गुलाम थे , जब उमय्या ने सुना कि बिलाल मुसलमान हो गए हैं भांति भांति के अज़ाब उनके लिये ईजाद किये गए , गर्दन में रस्सी डाल कर लड़कों के हाथ में दी जाती और वह मक्के की पहाड़ियों में उन्हें लिये फिरते , रस्सी का निशान गर्दन में नुमायां हो जाता , मक्का घाटी की तप्ती हुई रेत पर उनको लिटा दिया जाता और गरम गरम पत्थर उनकी छाती पर रखवा दिया जाता , मुश्कें बांध कर लकड़ियों से पीटा जाता , धूप में बिठाया जाता , भूखा रखा जाता , हज़रत बिलाल रजिअल्लाह अन्हु इन सब हालतों में ” अहद ” ” अहद ” के नारे लगाते रहते कि खुदा एक , खुदा एक इस हालत में एक मरतबा हज़रत अबू बक्र सिद्दीक रजिअल्लाह अन्हु उनके पास से गुज़रे और उमय्या हज़रत बिलाल के बदले में एक उनसे ज्यादा मज़बूत व तवाना और सियाह फाम ( काला कलूटा ) गुलाम देकर हज़रत बिलाल को आज़ाद करा दिया ।

अम्मार और उनके वालिद यासिर , उनकी वालिदा सुमय्या मुसलमान हो गए थे , बनी मखजूम उनको बाहर लाते और उनको मक्के की सख़्त गर्मी और तपिश में तरह तरह की तकलीफें पहुंचाते , रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का उधर से गुज़र होता तो आपको रंज और अफसोस होता , लेकिन आप उस वक़्त और कुछ नहीं कर सकते थे , सिवाए उस तलकीन के कि ” आले यासिर ज़रा सब्र रखो ! तुम्हारी मन्ज़िल जन्नत है ” उन पर जुल्म इस कदर बढ़ा कि कमबख़्त अबू जहल ने बीबी सुमय्या की शर्मगाह में नेज़ा मारा जिसके असर से वह शहीद हो गईं ।

अबू फकीह जिनका नाम “ अफलह ” था , के पावों में रस्सी बांध कर उन्हें पथरीली ज़मीन पर घसीटा जाता । खब्बाब बिन अरत के सर के बाल खींचे जाते , गर्दन मिरोड़ी जाती , बारहा आग के अंगारों पर लिटाया गया ।

कुरैश का यह सुलूक गुलामों और कमज़ोरों के ही साथ न था , बल्कि अपने बेटों और अज़ीज़ो के साथ भी वह ऐसी ही संगदिली का बरताव किया करते । हज़रत उस्मान बिन अफ्फान के इस्लाम लाने की खबर उनके चचा हकम बिन अबिल आस बिन उमय्या को तो वह हज़रत उस्मान को खजूर में बांध देता और नीचे से धुवां दिया करता । हज़रत मुसअब बिन उमैर को उनकी मां ने उनको घर से निकाल दिया था , इसी जुर्म में कि वह इस्लाम ले आए थे ।

बाज़ सहाबा को कुरैश गाय , ऊँट के कच्चे चमड़े में लपेट कर धूप में फेंक देते थे , बाज़ को लोहे की ज़िरह ( कवच ) पहना कर जलते जलते पत्थरों पर लिटा दिया करते । दूसरी तरफ मुसलमान हो जाने वालों को उनके नबी का हुक्म था कि तकलीफों पर सत्र ही करें , कोई जवाबी कार्यवाई न करें , क्योंकि अल्लाह तआला की तरफ से फरमा दिया गया था : ( कुफ्फू ऐदियाकुम व अकीमुस्सलात ) “ अपने हाथ रोके रखो और नमाज़ को कायम करो ” ।

इस तरह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़रिये इस बात की तरफ तवज्जुह दिलाई गई कि चूंकि अस्ल मकसद ( उद्देश्य ) लोगों को समझाना और उनको दीने हक मानने वाला बनाना है , अगर उनकी मुखालिफत ( विरोध ) का जवाब इन्तिकामी अन्दाज़ ( बदले की भावना ) में दिया जाएगा तो उनमें दीने हक ( सत्यधर्म ) से इन्कार में ज़्यादा सख्ती बढ़ेगी , और ज़िद में इजाफा होगा , फिर मुसलमानों को उस वक्त तक ऐसी ताकत भी हासिल नहीं थी , कि कुफ्फार की ताकत का अपनी ताकत से मुकाबिला कर सकें , और वह उस जुल्म का जवाब ताकत से देते तो उस वक्त की कमज़ोर दावत का काम जो कि जब से नहीं बल्कि समझा बुझा कर करना था पीछे रह जाता , एक दूसरे के दरमियान गुस्सा और दुशमनी की ताकत आज़माई होने लगती , लिहाज़ा अस्ल मकसद ( उद्देश्य ) को सामने रखते हुवे सब्र व बर्दाश्त से काम करना था , उस वक्त की कमज़ोर पोज़ीशन में सब्र और इन्तिज़ार और परवरदिगार से नुसरत ( मदद ) की तलब व दुआ पर इक्तिफा ( सन्तोष ) करना था । बहरहाल इन्सानों की इस्लाह ( सुधार ) और उनके अकीदे व इबादत की दुरूस्तगी की कोशिश अस्ल काम था ।

प्रस्तुतकर्ता- रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब- रहबरे इंसानियत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम

लेखक- सय्यद मुहम्मद राबे हसन नदवी

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