रबीउलअव्वल खास
ख़ून के प्यासे कबीलों के लिए नबी – ए – रहमत

इस्लाम के पन्ने से

आपकी उम्र 14-15 वर्ष की थी कि कुरैश और क़बीला कैस के बीच हर्बल फिजार की लड़ाई शुरू हो गई। आपने इस लड़ाई को करीब से देखा बल्कि आप दुश्मन के प्रयोग में लाए गए तीरों को कुरैश तक पहुंचाते थे। इस मौके पर आपको लड़ाई का व्यवहारिक अनुभव हुआ तथा घुड़सवारी व सिपाहगरी से परिचय हुआ। जब आप कुछ और बड़े हुए तो आपने रोजी रोटी कमाने की तरफ ध्यान देना जरूरी समझा और बकरियां चराने का पेशा अपनाया। जो उस दौर में एक शरीफाना पेशा होने के साथ साथ मनोवैज्ञानिक दीक्षा , कमज़ोरों व दीन दुखियों पर दया की भावना पैदा करने तथा साफ व ताज़ा हवा का आनन्द लेने के साथ – साथ शारीरिक अभ्यास का मौका प्रदान करता था। इसके अलावा वह नबियों की सुन्नत है । अतः नुबूवत के बाद आपने फरमाया कि कोई नबी ऐसा नहीं गुज़रा जिसने बकरियां न चराई हों। पूछा गया कि आप ने भी ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ? फरमाया ! हां मैंने भी। आपने पहले भी बनी साद में अपने रजाई भाई ( दूध शरीक भाई ) के साथ बकरियां चराई थीं इस लिए आप इस काम को जानते थे। हदीस से साबित है कि आप मक्का में कुछ ‘ कीरात ‘ जो आप बकरियों के मालिक से लेते थे के बदले बकरियां चराते थे।

हज़रत ख़दीजा से शादी

जब आप पचीस वर्ष के हुए तो खुवैलिद की लड़की ख़दीजा के साथ आपने शादी की ख़दीजा कुरैश की बहुत ही प्रभावशाली और पहुंच वाली औरत थीं । अपनी सूझ – बूझ , सदाचरण और धन दौलत के लिए भी वह बहुत मशहूर थीं । ख़दीजा विधवा थीं और उनके पति अबुहाला का निधन हो चुका था । उस समय ख़दीजा की उम्र 40 वर्ष थी और आप सल्ल० 25 वर्ष के थे। ख़दीजा व्यापार भी करती थीं। रूपया उनका होता था और दूसरे लोग मेहनत करते थे और अपनी मेहनत का मेहनताना पाते थे ख़दीजा को आपकी सच्चाई , सदाचारण तथा परोपकार की भावना का ज्ञान उस समय अच्छी तरह हो चुका था जब आप शाम के सफर पर गए थे । उस सफर में आप ख़दीजा का सामान लेकर शाम व्यापार करने गए थे । उस सफर में , जो अनोखी घटनाएं घटी थीं उनकी खदीजा को जानकारी थी अतः उन्होंने आपसे रिश्ते की इच्छा जताई। हालांकि वह इससे पहले कुरैश के बड़े – बड़े सरदारों की याचना को ठुकरा चुकी थीं आपके चचा सैय्यदना हमज़ा ने यह पैगाम आप तक पहुंचाया । अबुतालिब ने निकाह का खुत्बा पढ़ा और आपके वैवाहिक जिंदगी की शुरुआत हुई । आपके लड़के इब्राहीम को छोड़कर ( जिनका निधन बचपन में हो गया था ) आपकी सारी औलादें उन्हीं से हुयीं ।

काबा का नव निर्माण

जब आपकी उम्र 35 वर्ष की हुई तो कुरैश ने काबा के नव निर्माण डालने का प्रस्ताव रखा । इससे पहले का इरादा किया और उस पर काबा के निर्माण में मिट्टी और गारे से जोड़े बिना भारी पत्थर तले ऊपर रख दिए थे , जो इंसान की ऊंचाई से कुछ अधिक ऊंचे थे । अब इसे गिराकर नए सिरे से निर्माण किया जाना था जब दीवारों की ऊंचाई ” हज असवद ” ( काला पत्थर ) तक पहुंची तो हज अवसद को उसकी सही जगह लगाने में लोगों में बड़ा मतभेद खड़ा हो गया । हर कबीला चाहता था कि हज असवद को उठाकर उसकी सही जगह लगाना उसकी किस्मत में आए । नौबत लड़ाई और मार – पीट तक पहुंची । उस दौर में इससे भी मामूली बात पर लड़ाईयां होती रही हैं , यह तो एक बड़ी बात थी।

बनु अब्दुल्दार ने खून से भरी हुई एक लगन तैयार की । अब्दुल्दार और बनूअदी ने ख़ून की लगन में अपना हाथ डालकर मरते दम तक लड़ते रहने की कसम खाई । कुरैश कई दिन तक इसी उलझन में रहे । फिर इस बात पर वह सब एक मत हो गए कि जो व्यक्ति मस्जिदे हराम ( काबा हरम परिसर ) में सबसे पहले दाखिल होगा वह इस बात का फैसला करेगा कि हज अवसद को कौन उठाकर उसकी जगह रखे । दूसरे दिन सबसे पहले आप सल्ल 0 मस्जिदे हराम में दाखिल हुए । अतः आप पर यह फैसला रखा गया । आपने एक चादर मंगाई और हज्र असवद को स्वयं उठाकर उस चादर में रखा । फिर कहा कि हर कबीले का एक व्यक्ति चादर का एक कोना पकड़ कर उठाए । सबने ऐसा ही किया जब चादर में पत्थर उस जगह के पास आया जहां उसे लगाया जाना था तो आपने अपने हाथ से उठाकर उसको उस जगह रख दिया। इसके बाद बाक़ी इमारत बनाई गई । इस तरह आपने कुरैश को बड़ी लड़ाई से बचा लिया । इस मौके पर आपने जिस समझदारी व सूझ – बूझ से काम लिया उससे बढ़कर कोई हिकमत नहीं हो सकती थी। नुबूवत के बाद आपने तमाम इन्सानों और दुनिया की क़ौमों को जिस तरह जंगों की भट्टी से छुटकारा दिलाया , यह घटना वास्तव में उसकी शुरुआत थी । यह घटना आपकी सूझ – बूझ , बेहतरीन शिक्षा , हमदर्दी और आपकी समझौता कराने की परिचायक थी। यह वह बात थी जिसने आपको रहमतुल्ल लिल आल्मीन ( सारे जहानों के लिए रहमत ) की उच्च पदवी दी , और आप उस सादा और अनपढ़ कौम के उन लड़ाकू तथा एक दूसरे के ख़ून के प्यासे कबीलों के लिए नबी – ए – रहमत साबित हुए।

प्रस्तुतकर्ता- रईस खान
क़ौमी फरमान, मुंबई

किताब- नबी ए रहमत
( हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहि वसल्लम की जीवनी)
लेखक- मौलाना अबुल हसन अली नदवी

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