Rashtrapati Election: भाजपा की चाल, ममता बेहाल

राजनीति राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
राष्ट्रपति
चुनाव में आदिवासी नेता और झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को अपना उम्मीदवार बनाने के सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले राजग के कदम ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ममता बनर्जी को मुश्किल में डाल दिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और पार्टी के नेता यशवंत सिन्हा को विपक्षी खेमे के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में नामित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद, बनर्जी ने यह कहकर हलचल मचा दी कि अगर भाजपा ने विपक्ष से सलाह मशविरा किया होता तो मुर्मू एक “आम सहमति की उम्मीदवार” हो सकती थीं। आदिवासियों महिलाओं के लिए हमारे मन में बहुत सम्मान है।
जुलाई 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में, जब प्रणब मुखर्जी तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के उम्मीदवार थे, बनर्जी ने अपना रुख बदल दिया था और अंतिम समय में मुखर्जी का समर्थन करने का फैसला किया था। ममता की यह टिप्पणी, “हूल दिवस” के एक दिन बाद आई थी। 1855 के संथाल विद्रोह की स्मृति में मनाये जाने वाले हूल दिवस पर शायद उन्हें अहसास हुआ हो कि राष्ट्रपति चुनाव में मुर्मू का विरोध करने से उनकी पार्टी का आदिवासी वोट बैंक खिसक सकता है, जिसे उन्होंने 2021 के राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा से हासिल किया था। बंगाल में जनजातीय मतदाता कुल मतदाताओं का 7 से 8 फीसदी है। जंगलमहल क्षेत्र में चार संसदीय क्षेत्रों में बांकुरा, पुरुलिया, झारग्राम और पश्चिम मिदनापुर जिले शामिल हैं जबकि उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, उत्तर और दक्षिण दिनाजपीर और मालदा में फैले आठ क्षेत्री में आदिवासी आबादी बढ़कर 25 फीसदी तक हो जाती है।
संथाल बंगाल की जनजातीय आबादी का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बनाते हैं। मुर्मू भी संथाली समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में, जब भाजपा ने तृणमूल की 22 सीटों के मुकाबले 18 सीटें जीतीं, तब भाजपा ने जंगलमहल की सभी सीटों और उत्तर बंगाल की छह सीटों पर जीत हासिल की। यह अलग बात है 2021 के विधानसभा चुनावों में भारी जीत हासिल करने वाली तृणमूल का प्रदर्शन जंगलमहल में भाजपा से बेहतर था। संयुक्त विपक्ष के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चयन करने के लिए पहल करते हुए, बनर्जी ने 22 विपक्षी नेताओं और मुख्यमंत्रियों को 15 जून को दिल्ली में एक बैठक में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जिसके कारण अंततः सिन्हा का नामांकन हुआ, जिन्होंने तब विपक्ष के उम्मीदवार बनने के लिए तृणमूल के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। बहरहाल ये टिप्पणी करके ममता ने राज्य के आदिवासियों तक यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह मुर्मू की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के खिलाफ नहीं हैं। ममता की टिप्पणी पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि ममता बनर्जी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी वे राष्ट्रपति चुनाव से पहले अपना विचार बदल चुकी हैं। माकपा के मुताबिक ममता बनर्जी ने हमेशा दोहरे मापदंड बना रखे हैं। अपने नेतृत्व को साबित करने के लिए, उन्होंने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का फैसला करने के लिए जल्दी से विपक्षी दलों की बैठक बुलाई अब वह भाजपा को आश्वस्त कर रही हैं कि वह उनके साथ हैं ताकि उन्हें कोई खतरा न हो।

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