32 एड्स पीड़ित बच्चों के माँ-बाप हैं रेजी–मिन्नी

फीचर मुंबई

अजय भट्टाचार्य
नवी मुंबई
के पास पनवेल के एक घर में करीब तीन दर्जन बच्चे रहते हैं। वे कोई सामान्य बच्चे नहीं हैं। वे लड़ाके हैं। अगर आप उनसे पूछेंगे कि उनके माता-पिता कौन हैं तो वे कहेंगे पापा रेजी और मिनी मम्मी। पिछले 36 वर्षों से मुंबई में बसे पादरी रेजी थॉमस 2009 से 32 एचआईवी पॉजिटिव बच्चों के मार्गदर्शक और अभिभावक हैं। उनका घर, जिसे ब्लेस फाउंडेशन कहा जाता है, उनका भी है। एक दैवीय प्रेरणा मिलने के बाद, रेजी ने मुंबई की सड़कों पर परित्यक्त बच्चों के साथ काम करना शुरू कर दिया। एचआईवी पॉजिटिव बच्चों के साथ उनकी यात्रा 2008 में नवी मुंबई के डीवाई पाटिल अस्पताल में एक दुखद घटना के बाद शुरू हुई। वे उस समय एक संगठन के तहत समाज सेवा करते थे। एक दिन, मेडिकल कॉलेज ने उन्हें अस्पताल जाने और नेपाल की एक 12 साल की बच्ची के लिए प्रार्थना करने को कहा। वह बच्ची हड्डियों के बैग की तरह लग रही थी। रेजी को लगा कि वह तपेदिक से जूझ रही है। लेकिन बाद में पता चला कि उसे एड्स है और वह मौत के शैय्या पर थी। 12 साल की बच्ची का पादरी से एक अनुरोध था – वह नूडल्स का स्वाद लेना चाहती थी। आस-पास की दुकानों में नूडल्स न मिलने पर रेजी ने उससे वादा किया कि वे अगले दिन कुछ लाएगा। लेकिन अगले दिन उसके निधन की खबर के साथ सुबह हुई। रेजी ने उसी दिन एचआईवी संक्रमित बच्चों के लिए हर संभव कोशिश करने का फैसला किया। रेजी ने देश में ऐसे बच्चों के जीवन को समझने के लिए पर्याप्त आधार जानकारी के बाद पाया कि वृद्ध रोगियों के लिए कई देखभाल गृह हैं, लेकिन बच्चों के लिए नहीं है।
2009 में रेजी ने अपनी पत्नी मिनी रेजी थॉमस के साथ ब्लेस फाउंडेशन की शुरुआत की। उस समय उनके साथ उनके केवल चार बच्चे रह रहे थे, तीन लड़के और एक लड़की। बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया था और बुजुर्ग एचआईवी रोगियों की देखभाल करने वाले एक संगठन द्वारा उन्हें पादरी को सौंप दिया गया। पादरी, उनकी पत्नी और उनके जैविक बच्चे-जस्टिन और जेनी – एक ही छत के नीचे रहते थे। उस समय उनके पास एक चटाई और कुछ चादरें थीं। उन्होंने बच्चों को चटाई दी, और चारों अगले दो महीनों तक फर्श पर चादरों पर ही सोए। उनके दोस्तों और कुछ अच्छे लोगों उनके इस उद्देश्य की सराहना की और भोजन, बिस्तर व अन्य आवश्यक चीजों का योगदान देना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे बच्चों की संख्या बढ़ती गई, रेजी ने केवल लड़कों को ही लेने का फैसला किया। लड़कियां दूसरे संगठनों में जाती हैं। 2012 तक, ब्लेस फाउंडेशन ने दैनिक परिचालन खर्चों को पूरा करने के लिए संघर्ष किया। आर्थिक तंगी के कारण रेजी केवल तीन छात्रों को ही स्कूल भेज सका। लेकिन तब से जीवन ने उन्हें कई चमत्कार उपहार में दिए हैं। बकौल रेजी उस समय, अगर मेरे पास 15,000 रुपये होते, तो मैं उन सभी को स्कूल भेज सकता था। हालाँकि मैंने कई दरवाजे खटखटाए, लेकिन मुझे शायद ही कोई प्रतिक्रिया मिली। 2012 में, स्कूल के फिर से खुलने से एक दिन पहले, मनु पुन्नूज़ ने भोजन और आवश्यक वस्तुओं की पेशकश के साथ ब्लेस फाउंडेशन का दौरा किया। उन्होंने 21 हजार रुपये का चेक भी सौंपा। रेजी कहते हैं मैं उसके सामने टूट गया। यह वाकई चमत्कार था। वह अभी भी ब्लेस फाउंडेशन के एक महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। चार से 18 साल के 32 बच्चे अब स्कूल जाते हैं। उनके 18 साल के होने के बाद, ब्लेस फाउंडेशन के बच्चों को कहीं और भेज दिया जाता है, या फाउंडेशन उन्हें नौकरी दिलाने में मदद करता है। उनमें से अधिकांश ने अपने माता-पिता को एचआईवी से खो दिया है। कुछ बच्चों की मां जिंदा हैं। आठ बच्चे अब कार्यरत हैं। हालांकि रेजी ने पहले एचआईवी पॉजिटिव वयस्कों के साथ काम किया था, लेकिन बच्चों के साथ काम करना एक अलग अनुभव रहा है।

(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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