Samajwadi party: नरेश ही उत्तम

राजनीति लेख

अजय भट्टाचार्य
उत्तर प्रदेश
में समाजवादी पार्टी (Samajwadi party) ने एक बार फिर नरेश उत्तम पटेल (Naresh Uttam Patel) राज्य का मुखिया बनाया है, जबकि पटेल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से सपा दो बार विधानसभा व एक लोकसभा चुनाव हार चुकी है। सवाल उठता है कि लगातार हार के बाद भी नरेश उत्तम अपने पद पर कैसे बरकार हैं?
यह सवाल सपाइयों के साथ ही अन्य सियासी जानकारों के दिमाग में भी गूंज रहा है। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के भरोसेमंद नरेश उत्तम पटेल सपा प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के भी करीबी हो गए हैं। पार्टी स्थापना से ही सपा में ही बने हए हैं। वह कुर्मी जाति से आते हैं. यूपी में कुर्मी वोटर्स की आबादी करीब 07 फीसद है। यह वोट सपा को नहीं दिला पाते। इस साल हुए विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल (Anupriya Patel) की बहन पल्लवी पटेल (Pallavi Patel) और मां कृष्णा पटेल (Krishna Patel) को अपने साथ लाकर चुनाव लड़ाया था। इसका उन्हें फायदा भी मिला. पल्लवी ने सिराथू से डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य (Keshav Prasad Maurya) को मात दे दी थी। यही कारण है कि नरेश उत्तम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर रखने से अखिलेश को फायदा दिख रहा है। अखिलेश का मानना है कि ‘नरेश की पकड़ कुर्मी के अलावा अन्य ओबीसी जातियों में भी है. इसलिए सपा इसका फायदा उठाना चाहती है।
शांत स्वभाव के नरेश उत्तम जमीन से जुड़े नेता हैं। परिवारवाद के आरोपों से घिरी सपा अखिलेश परिवार के किसी सदस्य को ये पद देकर इस ठप्पे को और मजबूत नहीं करना चाहते थे। अन्य पिछड़े वर्ग में कोई ऐसा नेता नहीं है, जो अखिलेश का विश्वसनीय हो। स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya), रामअचल राजभर (ramachal rajbhar) जैसे नेता कई पार्टियां बदल चुके हैं। नरेश ने फतेहपुर के जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र से 1989 में पहली बार चुनाव जीता था। वह तीन बार विधायक रहे। 2006 में उन्हें सपा ने विधान परिषद का सदस्य बनाया। 2017 में जब अखिलेश और शिवपाल यादव (Shivpal Yadav) के बीच विवाद हुआ, तो नरेश को इसका फायदा मिल गया। अखिलेश ने अपने चाचा को अध्यक्ष पद से हटाकर नरेश को कुर्सी सौंप दी। राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे अखिलेश यादव की एक मजबूरी मानते हैं। उनका तर्क है कि अखिलेश यादव ने बाहर से आए हुए किसी नेता को यह जिम्मेदारी इसलिए नहीं सौंपी कि वह उस पर भरोसा नहीं कर सकते थे। आज नेता उनके साथ है, कल अगर किसी और के साथ चला जाए तो पार्टी के लिए फिर से दिक्कत खड़ी हो सकती है। इसलिए मजबूरी में नरेश पर ही भरोसा जताना पड़ा। विधानसभा के बाद लोकसभा उप चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद सपा में प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ संग्राम छिड़ गया था। सोशल मीडिया पर प्रदेश अध्यक्ष के अपना बूथ तक न बचा पान के आरोप के साथ ही उनको हटाने की मांग भी काफी तेज थी।

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