सरसय्यदडे: खिराज_ए_अक़ीदत, मैंने इस शिक्षण संस्थान को क्यों स्थापित किया ?

इस्लाम के पन्ने से

रईस खान
मेरे
मित्रों ! आप लोगों ने अभी अभी अपने सम्बोधन में मोहम्मडन एन्ग्लो ऑरियन्टल कॉलेज की चर्चा की है । अगर कोई यह समझता है कि इस कॉलेज की स्थापना हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच भेदभाव करने के लिए किया गया है तो मुझे दुख होगा ।

इस कॉलेज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जैसा कि आप सब जानते हैं यह था कि दिन प्रतिदिन मुसलमानों की स्थिति कमजोर होती जा रही है, जिसके कारण वे अन्य लोगों पर निर्भर रहते हैं । उनकी धार्मिक अन्धता ने उन्हें सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा ग्रहण नहीं करने दिया और इसलिए आवश्यक था कि उनके लिए अलग से पृथक शिक्षा का बन्दोबस्त किया जाए ।

विचार करें कि दो भाई हैं जिनमें एक स्वस्थ और समृद्ध है जब कि दूसरा अस्वस्थ है तब सभी भाईयों का कर्तव्य है कि वे अपने उस अस्वस्थ और कमजोर भाई का हाथ थामे । यही वह विचार था जिसके कारण मैंने मोहम्मडन एन्ग्लो ओरियन्टल कॉलेज की स्थापना की ।

लेकिन मुझे यह कहने में बहुत प्रसन्नता है कि दोनों भाईयों को इस शिक्षण संस्थान में एक समान शिक्षा दी जायेगी इस कॉलेज में मुसलमानों और हिन्दुओं के अधिकार बराबर होगें और उनके बीच किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा जो छात्र भी परिश्रम करेगा उसे ही इनाम मिलेगा । कॉलेज मे हिन्दू और मुसलमान दोनों छात्रों को एक समान रूप से छात्रवृत्ति प्रदान की जायेगी और दोनों को भाईयों की तरह माना जायेगा । हिन्दू और मुसलमान मेरी दो आंखों की तरह है 03 फरवरी 1884 को लाहौर मे दिए गए भाषण का अंश / लैक्चरस पेज़ 198

(।।)

इसमें कोई शक नहीं है कि मदरसातुल उलूम राष्ट्रीय विकास का एक महत्वपूर्ण अंग है । मैं राष्ट्र के मायने केवल मुसलमानों को नहीं बल्कि हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को मानता हूँ । हाँलाकि इस शिक्षण संस्थान की स्थापना मुसलमानों को उनकी गिरती हुई आर्थिक और सामाजिक स्थिति से उबरने के लिए की गई ताकि कि वे यूरोप के विज्ञान और साहित्य से परिचित हो सके । परन्तु दोनों ( हिन्दू और मुसलमान ) को हिन्दुस्तान की आवश्यक्ताओं के अनुसार यहाँ पर शिक्षा प्रदान की जायेगी और प्रशिशित किया जायेगा ।

हम यहाँ हिन्दुस्तान में अपने आपको हिन्दू और मुसलमान अवश्य कहते हैं परन्तु विदेश मे हमें केवल हिन्दुस्तानी के रूप में जाना जाता है और इसीलिए यदि किसी हिन्दू का अपमान होता है तो वह मुसलमान के लिए शर्म की बात है और यदि किसी मुसलमान का अपमान होता है तो वह हिन्दू के लिए शर्म की बात है । हमें कभी भी इज्जत नहीं मिल सकती जब तक दोनों भाईयों को एक समान शिक्षा नहीं मिलेगी और उन्हें एक समान प्रगति का अवसर मिलेगा ।

मैंने इस शैक्षिक संस्थान मदरसातुल उलूम को केवल इसी उद्देश्य से स्थापित किया है । मैं अकेला शायद ही इसी कार्य को कर पाता लेकिन मैं उन लोगों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने इस कार्य में मेरी सहायता की । इस सम्बन्ध में मुसलमानों का इतना एहसानमन्द मैं नहीं हूँ जितना हिन्दुओं का जिन्होंने अपने मुस्लिम भाईयों की शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में दान दिया । कॉलेज की दीवारों पर बड़ी संख्या में उन हिन्दुओं के नाम अंक़ित है जिन्होंने इस कॉलेज के लिए दान दिया जो हमेशा यह याद दिलाते रहेगें कि उन्हें अपने मुसलमान भाईयों को शिक्षित करने की कितनी चिन्ता थी ।

26 जनवरी 1884 को अमृतसर मे दिए भाषण का अंश , लैक्चर पेज़ 167

( गोल्डन थाट्स आफ सर सैयद- डा जसीम मोहम्मद)

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