शिवसेना ने दिया राजनीति को नया हाइवे

राजनीति राष्ट्रीय

धनंजय कुमार
शिवसेना
और बीजेपी के राजनीतिक गठबंधन के बाद पहले चुनाव में यानी 1990 में शिवसेना को विधानसभा की 52 सीटें मिली थीं, जबकि बीजेपी को 42 सीटें। उसके बाद 1995 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने 73 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी को 65 सीटें और महाराष्ट्र में पहली बार दोनों के गठबंधन की सरकार बनी थी- मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि, मनोहर जोशी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और उन्हें हटाकर नारायण राणे को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था। यहाँ इस बात की चर्चा जरूरी है कि दोनों नेता, जो मुख्यमंत्री बने, बाला साहेब की दिली च्वाइस नहीं थे, वह सुधीर जोशी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे।
फिर 1999 के चुनाव में शिवसेना को 69 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी को 56 सीटें, पिछले चुनाव की तुलना में शिवसेना की 4 सीटें कम हुई थीं, जबकि बीजेपी को 9 सीट का नुकसान हुआ था। बहुमत से 20 सीटें कम थी, जो मैनेज की जा सकतीं थीं, लेकिन बीजेपी शिवसेना को मुख्य मंत्री पद देने के बजाय अपने नेता गोपीनाथ मुंडे को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी। कई दिनों तक दोनों में खींचतान चलती रही और खींचतान का अंत इस तरह हुआ कि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार बन गई। हालांकि स्पष्ट बहुमत काँग्रेस-एनसीपी के पास भी नहीं था।
फिर दोनों ने 2004 का चुनाव भी मिलकर लड़ा और शिवसेना को 62 सीटें आईं, जबकि बीजेपी को 54 सीटें मिलीं। इस बार शिवसेना को 7 सीटें का नुकसान हुआ, जबकि बीजेपी की 2 सीटें कम हुईं। लेकिन 2005 में नारायण राणे कुछ विधायकों को लेकर शिवसेना छोड़ कॉंग्रेस से जा मिले। विपक्ष के नेता के पद को लेकर शिवसेना-बीजेपी में झगड़ा हुआ। नारायण राणे के जाने से शिवसेना की सीटें बीजेपी से कम हो गई थीं, इसलिए बीजेपी चाहती थी विपक्ष के नेता का पद उसे मिलें। काफी रार हुआ लेकिन आखिरकार बाला साहब की हनक बीजेपी को माननी पड़ी। उसके बाद 2009 के चुनाव में शिवसेना को 45 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी को 46 सीटें। पहली बार बीजेपी को शिवसेना से एक सीट ज्यादा मिली थी, और विपक्ष के नेता का पद बिना खिच खिच के बीजेपी को दे दिया गया।
फिर 2014 का चुनाव आया और पहली बार गठबंधन चुनाव से पहले टूट गया। बीजेपी और शिवसेना ने अलग अलग चुनाव लड़ा। बीजेपी को 122 सीटें मिलीं, जबकि शिवसेना को 63 सीटें। यहाँ से बीजेपी ने शिवसेना को कम आँकना शुरू किया। हालांकि, दोनों ने गठबंधन की सरकार बनाई, लेकिन बाला साहेब अब बीजेपी के लिए जरूरी नेता नहीं रह गए थे, अब नरेंद्र मोदी काल शुरू हो चुका था। बीजेपी को लगा था अकेले दम पर चुनाव जीत लेंगे चूंकि केंद्र में मोदी सरकार बन चुकी थी। बीजेपी भले सहयोगियों के साथ सरकार में थी, लेकिन बीजेपी के पास अकेले बहुमत से ज्यादा सीटें थीं। लिहाजा कुछ दिनों की कच कच के बाद शिवसेना बड़े भाई से छोटे भाई की भूमिका में आ गई। दोनों के गठबंधन की सरकार बनी, लेकिन बीजेपी- शिवसेना के रिश्ते कभी ठीक नहीं रहे, लगातार बिगड़ते चले गए और हालत ये हो गई कि शिवसेना कांग्रेस-एनसीपी के साथ सरकार बनाने में जुट गई और बीजेपी के घनघोर ड्रामे के बाद भी उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए।

बीजेपी के लिए यह घनघोर अपमान का समय था। दोनों साथ लड़े लेकिन शिवसेना ने कांग्रेस-एनसीपी के साथ सरकार बना ली। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होकर भी विपक्ष में बैठने को मजबूर थी। बीजेपी के महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली के नेता शिवसेना को सबक सिखाने की योजना में लगे रहे और आखिरकार ईडी की मदद से शिवसेना को तोड़ने में कामयाब रहे। उद्धव ठाकरे को इस्तीफा देना पड़ा।
यह कोई छोटी घटना नहीं, महाराष्ट्र की राजनीति के लिए यह बहुत बड़ी घटना है। हिन्दुत्व के मुद्दे पर एक हुई शिवसेना और बीजेपी अब अलग अलग ध्रुव है। बीजेपी जिस शिवसेना की बांह पकड़ कर सत्ता तक पहुंची थी, उसी की बांह मरोड़ दी।

हालांकि इस पूरे प्रकरण में उद्धव एक मजबूत और संवेदनशील नेता के तौर पर उभरे। उनका ढाई साल का कार्यकाल भी कई मायने में सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, देश की राजनीति के लिए भी एक उदाहरण है। पूरे देश का सेंसिबल समाज उद्धव ठाकरे की प्रशंसा कर रहा है। इतिहासकार इस उद्धव सरकार और उद्धव ठाकरे की चर्चा किये बगैर आगे नहीं बढ़ सकते। शिवसेना सत्ता की राजनीति में बेशक फिलहाल कमजोर साबित हुई है लेकिन लोकतान्त्रिक राजनीति के धरातल पर पहले से कई गुना मजबूत हुई है। शिवसेना देश की केन्द्रीय राजनीति के विमर्श में सम्मान के साथ शामिल हुई है।

आज बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस के साथ सरकार बनाने को लेकर जो उद्धव की आलोचना कर रहे हैं, ये कोई और नहीं भाजपाई और संघी ही हैं। नहीं तो शिवसेना ने 1971 के विधानसभा चुनाव में ही पहली बार कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, तीन सीटों पर लड़ी थी शिवसेना, ये अलग बात थी कोई सीट जीत नहीं पाई थी। फिर 1975 में बाल साहेब ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया था और 77 के चुनाव में कांग्रेस का समर्थन किया था। इसी तरह 1980 के चुनाव में भी शिवसेना खुद चुनाव में नहीं उतरी और कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था। बीजेपी के साथ शिवसेना का मेल मिलाप 85 के चुनाव के बाद शुरू हुआ और पहली बार 89 में दोनों का गठबंधन बना।
तो जो लोग बयान दे रहे हैं, बाला साहेब सदा कांग्रेस के विरोधी से गलत प्रचार कर रहे हैं। शिवसेना की शुरुआत मराठी अस्मिता और मराठी समाज के कमजोर युवाओं के लिए रोजगार में प्राथमिकता मिले के मुद्दे के साथ शुरू हुई थी, हिन्दुत्व का मुद्दा जुड़ा रामजन्म भूमि- बाबरी मस्जिद विवाद का ताला खुलने के बाद। लेकिन बाला साहब का हिंदुवाद तब भी संघ से जुदा था। मुसलमनों के मुद्दे पर वह देश विरोधी कार्यों में लगे मुसलमानों के विरोध पर थे, न कि अंध मुस्लिम विरोध उनका एजेंडा रहा कभी, जैसा कि संघ और बीजेपी का है।

शिवसेना को अलग होना ही था, और बहुत सही मोड पर शिवसेना बीजेपी से अलग हुई है। अभी देश को संघ और सावरकर के हिंदुत्व और शिवाजी और गांधी के हिन्दुत्व पर विमर्श करना है। उद्धव ठाकरे ने अपने ढाई साल के शासनकाल में बड़े ही संजीदा तरीक़े से पटल पर रखा है। शिवसेना न तो कमजोर हुई है न खत्म होगी, शिवसेना ने देश की राजनीति को नया हाइवे दिया है।

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