Shivsena : दांव पर नाम और निशान, जाने अब तक कितने निशान पर चुनाव लड़ चुकी है शिवसेना

मुंबई राजनीति

अजय भट्टाचार्य
‘तलवार और ढाल’
, ‘नारियल का पेड़, रेलवे इंजन, कप और प्लेट के बाद 1989 से ‘धनुष बाण’ के चुनाव चिह्न पर चुनाव लडती रही शिवसेना अब नये चुनाव चिह्न और नाम की तलाश में है। चूँकि उद्धव ठाकरे (Uddhav Thakare) और एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) खेमे में शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने शिवसेना नाम और उसके चुनाव चिह्न ‘तीर-कमान’ को जब्त कर लिया है इसके बाद शिवसेना के उद्धव ठाकरे धड़े ने मुंबई के अंधेरी पूर्व में आगामी उपचुनाव के लिए तीन नामों और चुनाव चिह्न की सूची दी है।
उद्धव गुट पार्टी के नाम के तौर पर ‘शिवसेना बालासाहेब ठाकरे’ (Shivsena Balasaheb Thackeray) नाम को प्राथमिकता दे रहा है। अन्य विकल्प के तौर पर ‘शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे’ (shivsena uddhav Balasaheb Thackeray) और ‘शिवसेना बालासाहेब प्रबोधंकर ठाकरे’ (Shivsena Balasaheb prabodhankar Thackeray) जैसे नामों के साथ ‘त्रिशूल’ (Trishul), ‘उगता सूरज’ (Ugata Suraj) और ‘मशाल’ (Mashal) में किसी एक को चुनाव चिह्न देने की मांग आयोग से की गई है। उद्धव के नेतृत्व वाली शिवसेना ने अपने नये नाम में बाला साहेब ठाकरे को विशेष महत्व दिया है। शिवसेना को 1989 में स्थाई चुनावी चिह्न ‘धनुष और बाण’ (Dhanush baan) मिला था। पार्टी के दोनों गुटों द्वारा नाम और चुनाव चिह्न पर दावा किए जाने की पृष्ठभूमि में एक अंतरिम आदेश जारी करके निर्वाचन आयोग ने दोनों से कहा है कि वे सोमवार तक अपनी-अपनी पार्टी के लिए तीन-तीन नये नाम और चुनाव चिह्न सुझाएं। आयोग दोनों गुटों द्वारा सुझाए गए नामों और चुनाव चिह्नों में से उन्हें किसी एक का उपयोग करने की अनुमति देगा। शिवसेना और ‘तीर-कमान’ (Teer kaman) कि जब्ती वाले चुनाव आयोग के फैसले को ठाकरे गुट ने ‘अन्याय’ बताया। अंधेरी पूर्व विधानसभा (Andheri East constituency) सीट पर उपचुनाव नजदीक आने की स्थिति में शिंदे गुट द्वारा अनुरोध किए जाने पर आयोग ने अंतरिम आदेश जारी किया है। जहां एक ओर शिंदे खेमा शिवसेना पर दावा कर रहा है, तो वहीं दूसरी ओर उद्धव ठाकरे खेमा भी इस पर दावा ठोक रहा है। चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश के मुताबिक, दोनों खेमों को अब नए नामों का चयन करना होगा। उन्हें अलग-अलग चुनाव चिह्न आवंटित किए जाएंगे। इससे पहले आयोग ने दोनों गुटों से कहा था कि वे अपने-अपने दावों के समर्थन में आठ अगस्त तक सभी दस्तावेज और विधायी तथा संगठन के समर्थन का साक्ष्य जमा कराएं। बाद में ठाकरे गुट के अनुरोध पर इस अवधि को बढ़ाकर सात अक्टूबर कर दिया गया था।
यह अलग बात है कि अँधेरी पूर्व विधानसभा चुनाव में शिंदे गुट अपना प्रत्याशी नहीं उतार रहा है। सवाल यह है जब शिंदे शिवसेना को बचाने का दावा करते हुए भाजपा (BJP) के साथ जाने की अपनी करतूत को सही ठहराते हैं तब अँधेरी पूर्व की सीट पर भाजपा क्यों उपचुनाव (Andheri by-election) लड़ रही है? असलियत यह है कि इस उपचुनाव का उम्मीदवार तय करते समय भाजपा ने शिंदे से चर्चा तक नहीं की। इस तरह शिंदे शिवसेना को मजबूत कर रहे हैं या भाजपा की गोद में बैठकर राजनीतिक अपंगता की तरफ बढ़ रहे हैं! हर हाल में अगर फायदे ने कोई है तो भाजपा है। शिंदे और उद्धव की कमजोर शिवसेना में भाजपा अपना भविष्य देख रही है।
(लेखक देश के जाने माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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