Singhu Border Murder: कुंडली कांड: कौम को बदनाम करने का षड्यंत्र

फीचर राष्ट्रीय

अजय भट्टाचार्य
हरियाणा
के सिंघु बॉर्डर पर किसानों के प्रदर्शन स्‍थल के पास दशहरे की अल सुबह जो कुछ घटित हुआ वह घोर निंदनीय, शर्मनाक, बर्बर और पूरी तरह धर्म विरुद्ध है। जो लोग इसे धार्मिक ग्रन्थ के अनादर की एवज में दी गई सजा बता रहे हैं उन्होंने पूरी सिख कौम को बदनाम करने का काम किया है। चूँकि यह वारदात किसान आंदोलन स्थल के आस-पास हुई है इसलिये किसान आंदोलन के प्रणेता भी सवालों के घेरे में हैं। यद्यपि सारे मामले से किसान संगठन ने खुद को अलग कर लिया है मगर यह सवाल तो बना ही रहेगा कि आखिर निहंग वहां क्या कर रहे थे? अगर वे भी आन्दोलन का हिस्सा थे/हैं तो इस बर्बर कांड को वहीं अंजाम देने की जरुरत क्या थी? वैसे एक सच है यह भी है कि पीड़ित व्यक्ति लखबीर पर जिस सरबलोह ग्रंथ को अपवित्र करने के प्रयास का आरोप लगाया गया उस सरबलोह ग्रंथ को मुख्यधारा का सिख समुदाय मान्यता नहीं देता है, हालांकि निहंग इसका बहुत सम्मान करते हैं। बताया जाता है कि इस ग्रंथ की रचना 18वीं शताब्दी में की गयी है।
जिस लखबीर सिंह की बर्बर तरीके से हत्‍या की गई, उसके गांव चीमा खुर्द के लोगों का कहना है कि उसे (लखबीर को) नशे की लत थी और ऐसा करने के लिए उसे प्रलोभन दिया गया था। तरनतारण जिले के एक रिटायर सेना कर्मी हरभजन सिंह के अनुसार, ‘वह (लखबीर) नशे का आदी था और उसे लालच देकर सिंघु बॉर्डर ले जाया गया होगा।’ अब सवाल फिर खड़ा होता है कि लखबीर को लालच देने वाले कौन तत्व हैं? बकौल हरभजन सिंह लखबीर सिंह चार-पांच दिन पहले गांव में ही था और उसकी निर्ममतापूर्वक हत्‍या का वीडियो देखकर हर किसी को धक्‍का लगा है। वह बेरोजगार था और परिवार का भरणपोषण सही से नहीं कर पाता था, उसके पिता की भी मौत हो चुकी है। चीमा खुर्द गांव के अन्‍य लोगों ने भी इस बात को दोहराया कि पीड़ित (लखबीर) को नशे की लत थी और वह कुछ दिन पहले तक गांव में था। एक अन्‍य शख्‍स ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, ‘वह (लखबीर) अपने परिवार के साथ रहता था और उसकी पत्‍नी अलग रहती थी। लखबीर धर्मग्रंथ अपवित्र करने में शामिल नहीं हो सकता। गांव के एक अन्‍य निवासी मासा सिंह के मुताबिक लखबीर पर पवित्र ग्रंथ को’अपवित्र’ के आरोप गलत हैं। वह ऐसा नहीं कर सकता, वह इस तरह का व्‍यक्ति नहीं था। लखबीर की बहन राज कौर द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक वह चार-पांच दिन पहले 50 रुपये लेकर घर से यह कहकर निकला था कि वह छबर में काम करने जा रहा है और एक हफ्ते में वापस आएगा। राज कौर का भी मानना है कि उनका भाई पवित्र ग्रंथ का अपमान नहीं कर सकता है। उसके हत्यारों को सजा मिलनी चाहिए। 35 वर्ष का लखबीर एक मजदूर था और उसके परिवार में एक बहन, पत्नी और तीन बेटियां हैं, जिनमें से सबसे बड़ी 12 साल की है और सबसे छोटी आठ साल की है। सिंघु बॉर्डर पर लखबीर सिंह को शुक्रवार सुबह पीट-पीटकर मार डाला गया और उसका बायां हाथ और दाहिना पैर काट दिया गया. हत्यारों ने शव को पुलिस के बैरिकेड्स से बांध दिया और उसे वहीं छोड़ दिया।
तो अब महत्वपूर्ण यह है कि जब हम तालिबानी हिंसा की लानत-मलानत करते हैं तब कुंडली में घटी यह घटना देशी तालिबान के चेहरे भी उजागर करती है। ये देशी तालिबान इंदौर के गरबा में लव जिहाद देखते है और राजस्थान के हनुमानगढ़ में दलित की पीट-पीटकर हत्या कर देते हैं। यह तालिबानी सोच गाँधी की हत्या को ‘वध’ कहकर महिमामंडित करने में गर्व महसूस करती है। और यही सोच लखीमपुर में गाड़ियों से किसानों को कुचलवा देती है। किसान आन्दोलन पहले से ही सरकार और सरकारी दल के निशाने पर है। शुरू से ही इसे खालिस्तान से जोडकर देखने और दिखाने की होड़ लगी हुई है। ऐसे में किसान मोर्चा को इतनी सावधानी तो बरतनी ही होगी जिससे फिर किसी लखबीर की जान न जाये। जिस तरह किसान मोर्चा ने राजनीति से जुड़े लोगों को अपने मंच से दूर रखा है ठीक उसी तरह प्रदर्शन के शामिल या समर्थन दे रहे निहंग गुटों से भी दूरी बनाकर रखना चाहिये। वरना इस तरह की घटनाएँ और होंगी। लखबीर के गाँव वालों ने जिस लालच का जिक्र किया है वह कौन दे सकता है, यह समझना बहुत आसान है। लखबीर ने ग्रंथ की बेअदबी की या उससे कराई गई,यह सच भी सामने आना चाहिये। वैसे भाजपा की आईटी सेल में मुखिया अमित मालवीय ने किसान नेता राकेश टिकैत और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव पर निशाना साधते हुए एक ट्वीट में कहा है कि अगर टिकैत ने लखीमपुर में भीड़ द्वार हत्या किए जाने को ज़ायज नहीं ठहराया होता, जब यादव उनके बगल में खामोश बैठे थे तो कुंडली बॉर्डर पर युवक की हत्या नहीं हुई होती। लेकिन मजाल है कि अमित मालवीय ने एक भी ट्वीट लखीमपुर कांड के खलनायक और उसकी करतूत की निंदा में किया हो। मालवीय और उनकी पूरी मंडली किसान आंदोलन को खालिस्तानी संगठनों से जोड़ने में कोई कसर बाकि नहीं छोड़ रही है। लखबीर की हत्या के राज का पर्दाफाश ईमानदारी से किया जाये तो कई सफेद लिबास खून से सने नजर आएंगे।
(लेखक देश के जाने – माने पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
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